पंचायत चुनाव में राजनीतिक दलों की भूमिका क्या हो,इस पर बिहार पंचायत चुनाव मे नये सिरे से बहस छिड़ गयी है। चुनाव आयोग ने नोटिस जारी कर प्रत्याशियों को आगाह किया है वे किसी दल के टिकट पर या उनके समर्थक के रूप मे चुनाव मे भागीदारी नहीं कर सकते। वहीं बिहार के प्रमुख राजनीतिक दलों में इस बात पर चर्चा जोरों पर है कि आगामी चुनाव दलिय आधार पर करायें जायें। दलगत आधार पर पंचायत चुनाव की मांग का दायरा बढ़ रहा है। ज्यादातर राजनीतिक दल आगामी पंचायत चुनाव को ग्रामीण क्षेत्रों में अपने जनाधार के विस्तार के लिए एक जरूरी आयाम के रूप में देख रहे हैं। सत्ताधारीजदयू के प्रदेष अध्यक्ष वशिष्ट नारायण सिंह ने इसका समर्थन किया है।भाकपा माले ने इसकी मांग उठाई और इसे लेकर सडक पर उतर गई है। दूसरी कम्यूनिस्ट पार्टियां भी पंचायत चुनावों में दलों के प्रवेश को गलत नहीं मानती।
पशिचम बंगाल, केरल और त्रिपुरा जैसे वाम वर्चस्व वाले राज्यों में काफी पहले से दलीय आधार पर पंचायत चुनाव होते रहे हैं। मुख्यतौर पर बिहार और उत्तरप्रदेश में पंचायत चुनाव पूरी तरह निर्दलीय आधार पर लडे जाते हैं। इसलिए समाजवादी वशिष्ट नारायण सिंह की मांग हैरान करती है। वे जेपी आंदोलन की उपज माने जाते हैं। पंचायतों को दलगत दलदल से मुक्त रखने की सलाह जेपी ने दी थी। उनका मानना था कि पंचायतों में दलीय राजनीति के प्रवेश से सामाजिक विभाजन बढेगा। कुल मिलाकर यह वैचारिक मामला है और इसके बारे में फैसला राजनीतिक दलों के चुनावी गणित के आधार पर होगा। पर बिहार की सभी राजनीतिक पार्टियां इन पंचायत चुनावों का उपयोग अपने सांगठनिक ढांचा को मजबूत बनाने में करना चाहती हैं। कांग्रेस तो इन चुनावों को अपने पुनरुत्थान का सुनहरा अवसर मान रही है। विधानसभा चुनावों के प्रदर्शन से पार्टी में उम्मीद का संचार हुआ है। पंचायत चुनावों के दौरान वह अपने खोए आधार पर फिर से प्राप्त करना चाहती है। इसके मद्देनजर जनवरी में राजीव गांधी पंचायती राज संगठन (आरजीपीआरओ ) की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का पटना में आयोजन किया गया। संगठन ने विभिन्न प्रदेश के 52 कांग्रेस नेताओं का चयन किया हैं । उन्हें पंचायती राज संस्थाओं के सsशक्तीकरण के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि ग्रामीण विकास के कार्यों में पंचायती राज संस्थाओं और उनके पदाधिकारियों की भूमिका अधिक कारगर एवं सार्थक हो बनाया जा सके। कार्यशाला का उदघाटन करते हुए बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चोधरी ने कहा कि सरकार ने पंचायतों का गठन तो कर दिया, पर संविधान के प्रावधानों के अनुसार अधिकार नहीं दिए। संगठन की अध्यक्ष जयंती नटराजन ने गुजरात और छत्तीसगढ के पंचायत चुनावों में पार्टी के बेहतरीन प्रदर्शन का उल्लेख करते हुए बिहार के ग्रामीण संस्थाओं में पार्टी की हिस्सेदारी बढाने का आहवान किया। जदयू का प्रयास भी यही है कि पंचायत चुनाव के पहले ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी संगठन को खडा कर दिया जाए। इसके लिए प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ट नारायण सिंह लगातार जिलों का दौरा कर रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि राज्य की सत्ताधारी पार्टी होने के बावजूद बिहार में जदयू का पार्टी संगठन सबसे कमजोर है। भाजपा का संगठन तो पंचायत के स्तर पर है, लोककसभा चुनावों में पार्टी ने मतदान केंन्द्र के स्तर तक पहुंचने का प्रयास किया था। पर विधानसभा चुनावों के नतीजों से लगता है कि वह तंत्र कमजोर हो गया है। पार्टी उसे फिर से जीवंत बनाने के प्रयास में है। पंचायत चुनावों को लेकर राजद और लालू यादव का रुख अभी स्पष्ट नहीं हुआ है। जबकि शोचालय की शर्त को स्थगित करने के फैसले के पीछे लालू यादव का हाथ रहा है। इसबीच भाकपा माले ने दलगत आधार पर पंचायत चुनाव की मांग लेकर प्रदेश भर में धरना प्रदर्शन किया। दलगत आधार के बारे में सरकार का फैसला चाहे जो हो, इतना तय है कि बिहार में पंचायतों का अगला चुनाव अधिक रोचक होने जा रहा है और इनमें तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियों की दिलचस्पी पहले से कहीं अधिक है।
