
आलोक रंजन, युवा पत्रकार
भोजपुरी सिनेमा के 50 वर्ष पूरे होने पर एक बार फिर उसकी पड़ताल शुरू हुई है कि भोजपुरी सिनेमा ने इन वर्षों में क्या वह मुकाम हासिल कर लिया है जिसकी उम्मीद पहली भोजपुरी फिल्म ‘गंगा मईया तोहे पीयरी चढ़इबो’ से की गई थी। लेकिन यह दुखद स्थिति है कि जैसे-जैसे भोजपुरी सिने यात्रा आगे बढ़ी वह कमजोर होती गई। शुरुआती 14 वर्षों में जो जमीन बनी थी उस उस पर भावी भवन न बनकर कच्चे कारीगरों के हाथों ऐसा मकान बनाया गया जिसकी दीवार बहुत कमजोर थी। आज अगर हम हिंदुस्तान के क्षेत्रीय सिनेमा की बात करें तो बात साफ हो जाएगी। मराठी, तमिल, उड़िया, कन्नड़, गुजराती, बांग्लाआदि क्षेत्रीय सिनेमा के सामने भोजपुरी सिनेमा कहाँ ठहरता है भले ही उक्त क्षेत्रीय सिनेमा की उम्र भोजपुरी सिनेमा से बड़ी हो पर यह सवाल महत्वपूर्ण है ।

अपने को जिस तरह प्रौढ़ किया उस प्रकार भोजपुरी सिनेमा अपने आप को प्रौढ़ क्यों नहीं कर पाया? क्षेत्रीय सिनेमा में बांग्ला,मराठी और तमिल सिनेमा अगर इतना समृद्ध है तो इसका कारण यह है कि उसे योग्य निर्देशक एवं आलोचक मिले, जबकि भोजपुरी सिनेमा के आरंभिक दौर को छोड़ दें तो न तो कोई ऐसा निर्देशक मिला जो भोजपुरिया समाज के यथार्थ को अपने फिल्म में उतार सके और न कोई फिल्म समीक्षक जो इस छूट रहे यथार्थ के लिए भोजपुरी फ़िल्मकारों को सतर्क करे।
पहली भोजपुरी फिल्म के निर्माण में जो जोश था वह बाद में व्यावसायिकता के दबाव में क्षीण होता चला गया। भोजपुरी अस्मिता तथा सामाजिक सरोकार के प्रश्न लगातार पीछे छूटते गए। ‘व्यावसायिकता’ किसी भी कला के लिए खतरनाक होती है। भोजपुरी सिनेमा में भी इस व्यावसायिकता ने संस्कृति और समाज के सवाल को कहीं दूर धकेल दिया है। भोजपुरी सिनेमा से भोजपुरी समाज की समस्याएँ गायब हैं।
आज भी अधिकांश फिल्में बने बनाये पुराने फार्मूले पर बनती हैं। आज के समय तथा सामाजिक सरोकार से उनका कोई नाता नहीं है। भोजपुरी समाज के सामने आज इतनी विकट चुनौतियाँ हैं लेकिन यह चुनौतियाँ भोजपुरी सिनेमा में कहीं नहीं दिखाई देती है। भोजपुरी समाज शोषण, छुआ-छूत तथा सामंती जकड़न से आज भी मुक्त नहीं हो पाया है। अगर विकास की बात करें तो यह देश का सबसे कम विकासित क्षेत्रों में गिना जाएगा। यहाँ के राजनेताओं ने इस क्षेत्र का उपयोग सिर्फ वोट बैंक के रूप में किया है।

