पंचायत खबर टोली
गाजीपुर: कृषि विज्ञान केन्द्र पी.जी. कालेज, गाजीपुर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा आर पी सिंह ने धान में लगने वाले रोगों से बचाव के लिए किसानों को जागरूक करते हुए कहा कि वर्तमान समय में धान की फसल में विभिन्न प्रकार के रोग से फसल ग्रसित हो जा रही है जिससे किसानों को काफी नुकसान हो रहा है, ऐसी स्थिति में किसान भाई धान की फसल में रोग लगने पर तुरन्त सम्पर्क करें और उन्होंने किसानों को लगने वाले रोग एवं उपचार की जानकारी दी।
शीथ झुलसा रोग- इस रोग के लक्षण मुख्यतः पत्तियों एवं पर्णच्छद पर हल्के भूरे, मटमैले या पुआल रंग की पट्टियों के रूप में दिखायी पड़ते हैं। उग्र अवस्था में तने के चारों और अनियमित आकार के गहरे भूरे, मटमैले धब्बे बनते हैं। रोगग्रस्त पौधों में दाने पूर्णरूप से नहीं भर पाते हैं जिससे पैदावार गम्भीर रूप से प्रभावित होती है।
नियंत्रण: रोग के लक्षण दिखायी देने पर (कल्ले निकलते समय आर्थिक हानि स्तर 5-6 मिमी. लम्बवत धब्बे और 2-3 प्रभावित पौध/मी प्रोपीकोनाजोल 25 प्रतिशत ई सी की 1 मिली पानी या विटरटेनाल 25 प्रतिशत डब्ल्यूपी 2 ग्राम/ली पानी या आइप्रोडियान 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी 2 प्रतिशत/ली0 पानी या क्लोरोथैलोनील 75 प्रतिशत डब्ल्यू पी 3 ग्राम/ली0 पानी या वैलिडामाईसिन 3 प्रतिशत एस.एल 2.5 मिली ली पानी हेक्साकोनाजोल 5 प्रतिशत ई.सी. 2 मिली.ली. पानी या टेबुकोनाजोल 25.9 प्रतिशत ई.सी 1 मिली ली पानी की दर से 2-3 छिड़काव 10-12 दिनों के अन्तराल पर करना चाहिए।
जीवाणु झुलसा रोग- इस रोग में सबसे पहले पत्तियों के किनारे ऊपरी भाग पीला सा होने लगता है तथा इसका प्रसार एक या दोनों किनारों के सिरों से प्रारम्भ होकर निचले हिस्से की ओर तेजी से होने लगता है। फलतः पत्तियां मटमैले, पीले रंग की होकर सीथ तक सूख जाती है। रोग ग्रसित पौध कमजोर हो जाते हैं उनमें कल्ले कम निकलते है। दाने पूरी तरह नहीं भरते हैं। इस रोग की दूसरी अवस्था म्लानि की है जिसे क्रिसक अवस्था भी कहा जाता है। इसमें ग्रसित पौधों की सबसे नयी पत्ती हल्के मटमैले रंग की होती है। पत्तियां आपस में लिपटकर तथा नीचे से झुलसकर पीली या भूरी हो जाती है और पूरा पौधा मर जाता है। इस रोग को पहचानने का आसान तरीका यह है कि तने को यदि काटकर अंगूठे व अंगुली के बीच दबाएं तो उससे मटमैले रंग का एक चिपचिपा द्रव निकलता है जो जीवाणुओं का समूह होता है।
नियंत्रण: सन्तुलित मात्रा में नत्रजन युक्त खादों का प्रयोग करना चाहिए। खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखायी देने पर (कल्ले निकलते समय आर्थिक क्षति स्तर 2-3 प्रभावित पत्तियां/मी2, 15 ग्राम स्ट्रेप्टोसाईक्लिन या 65 ग्राम एग्रीमाईसिन $ 500 ग्राम कापर आक्सीक्लोराईड $ 800 लीटर पानी/हेक्टेयर की दर से 2-3 छिड़काव 10-12 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए।
आभासी कंडः इस रोग के लक्षण बालियां निकलने के बाद उसके ऊपर स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ते हैं। रोगी बालियों के दाने पीले से लेकर संतरे रंग के बाद में जैतूनी हरे रंग के हो जाते हैं, रोगी धान के दाने दुगुने से बड़े हो जाते हैं। इस रोग के लक्षण खेत में कुछ ही स्थानों पर दिखायी पड़ते है। सामान्यतः धान की बाली में कुछ दाने ही रोगी होते हैं परन्तु रोग की आक्रमकता अधिक होने पर रोगग्रस्त दानों की संख्या अधिक भी हो सकती है।
नियंत्रण: खेत को साफ-सुथरा रखें, खरपतवारों तथा पूर्ववर्ती रोगग्रसित पौधों को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए। कल्ले निकलते समय कापर हाइड्राक्साईड 77 प्रतिशत डब्ल्यूपी की 1 ग्राम मात्रा/ली0 पानी की दर से तथा बालिया निकलने के समय प्रोपीकोनाजोल 25 प्रतिशत ई0सी0 की 1 मिली ली0 पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।


