पंंचायत खबर टोली
मऊ : धान खरीफ की मुख्य फसल है। किसानों के खेत में फसल लहलहा रही है। अगेती फसलों में धान की बालियां फूटने का समय हो गया है। कहीं—कहीं बालियां फूटती हुई दिख रही हैं। विशेष रूप से अगेती व मध्यम अवधि की प्रजातियों में बालियां निकल रही हैं। इन दिनों में हमारे किसान भाई फसल की बेहतरी को लेकर चिंतित है। उन्हें लग रहा है कि फूटती हुई बालियों को गंधी से नुकसान न हो। खरीफ की मुख्य फसल धान में बालियां निकलने के समय ही गंधी कीट का प्रभाव बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि अचानक मौसम का प्रतिकूल होने के दौरान किसानों को इस कीट के प्रबंधन पर पैनी नजर रखनी होगी। बालियों के निकलने के समय ही खेतों में नमी बनाए रखने के प्रति भी बहुत सचेत रहना होगा। पूर्वांचल में वर्षा पर आधारित इस फसल में बालियां निकलने के दौरान पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। इस तरह की परेशानियों पर खासा ध्यान न दिया जाए तो फसल की आवक प्रभावित होती है और उत्पादन में गिरावट की संभावना प्रबल हो जाती है। उत्पादन का 25 प्रतिशत प्रभावित होने का संकट बना रहता है। खेती किसानी के इन्हीं विषयों पर किसानों के प्रश्नों का जवाब दिया कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. वीके सिंह ने। प्रस्तुत है किसानों के सवाल और कृषि वैज्ञानिक के जवाब।
गंधी कीट का क्या प्रभाव है। यह फसल को कितना प्रभावित करता है?
-धान में रोपाई के समय पौधे से पौधे के दूरी 20 सेमी रखने की दशा में इस कीट के प्रभाव की संभावना बहुत ही कम हो जाती है। इस दिशा में व्यापक जागरुकता नहीं होने के कारण प्रतिवर्ष हजारों टन उपज गंधी कीट के कारण कम हो जाता है। फसल में बालियां निकलने के समय ही सक्रिय यह कीट उसके रस को चूस लेता है। यह बालियों के साथ निकलने वाले पैनकील या सफेद दिखने वाले पदार्थों को अप्रभावी बना देता है। इससे बालियों में दाने नहीं बन पाते हैं। परिणामस्वरूप पैदावार 25 प्रतिशत तक प्रभावित हो जाती है।
गंधी कीट से बचाव के क्या उपाय हैं?
-इससे बचाव के लिए किसानों को 2.5 क्रिगा मैलाथियान प्रति बीघा की दर से का छिड़काव करना चाहिए। सुबह में तेज धूप निकलने से पहले जब ओस की बूंद पत्तियों पर बनी हुई हो उसी दौरान इस दवा का छिड़काव फसल पर करना चाहिए। ओस की बूंदों के साथ दवा चिपककर देर तक प्रभावी बनी रहती है। दवा को खेत के मात्रा के अनुसार राख में मिलाकर पाउडर के रूप में छिड़काव कर इस कीट पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
यूरिया के घोल का करें छिड़काव
-पूर्वांचल में बालियां निकलने से पूर्व किसान 20 से 25 किग्रा प्रति बीघा की दर से यूरिया का छिड़काव करते हैं। इस परंपरागत उर्वरक छिड़काव प्रणाली को छोड़कर यूरिया का घोल बनाकर स्प्रे करने से फसल को ज्यादा लाभ मिलने के साथ ही आर्थिक बचत भी होती है। छह किग्रा यूरिया को 150 लीटर पानी में घोल बनाकर इस समय छिड़काव करना लाभकारी होगा। घोल चिपकाने वाला बाजार में मिलने वाला स्टीकर या डिटरजेंट पाउडर मिलना चाहिए। इससे तत्काल आर्थिक लाभ होने के साथ पौधों पर इसका सीधा असर पड़ेगा। छिड़काव के दौरान किसान फ्लैटपेन नाजिल का प्रयोग करें। फव्वारा के रूप में यूरिया का छिड़काव करने पर एक ही समय में पूरा पौधा इससे प्रभावित हो जाएगा।
किसान के प्रश्न..विशेषज्ञ के जवाब..
सवाल : जीवाणु झुलसा रोग से बचाव का उपाय क्या है। इसका प्रभाव फसल पर कितना होता है।
-हरेंद्र सिंह, पूर्व प्रधान, ताजोपुर, मऊ।
जवाब : पत्तियां मुहाने से पीला पड़ने लगती हैं। इनका रंग पुआल जैसा हो जाता है। यह रोग का प्राथमिक लक्षण है। इसे जीवाणु झुलसा रोग के नाम से भी जाना जाता है। यह धान के लिए कैंसर की तरह होता है। इससे बचाव के लिए 15 ग्राम स्टेप्टोसाइक्लीन व आधा क्रिगा कापर आक्सीक्लोराइट दवा को पांच सौ लीटर पानी में मिलाकर प्रति बीघा की दर से छिड़काव करना चाहिए। पत्तियों का मुहाना पीला होते ही तुरंत इसका छिड़काव करना चाहिए। इससे रोग का प्रसार बढ़ नहीं पाता है।
सवाल : वर्षा न होने की स्थिति में नमी प्रबंधन कैसे किया जाए?
-राकेश सिंह, प्रगतिशील किसान, रतनपुरा, मऊ।
जवाब : धान की फसल के लिए पानी का हर क्षण होना लाभदायक होता है। मौसम प्रतिकूल होने के दशा में भी बालियां निकलने के समय प्रक्षेत्र में नमी का होना अति आवश्यक है। नमी के अभाव में दाना बनने में कमी आने के साथ उपज की गुणवत्ता भी प्रभावित हो जाती है। ऐसे में इस समय वर्षा न होने के बाद भी निजी संसाधन से प्रक्षेत्र में एक बार गहरी भराई करने से एक सप्ताह तक नमी बनी रहती है। आवश्यक होने पर तत्काल दोबारा सिंचाई करने से नमी लंबे दिन तक बनी रहती है।
सवाल : धान में इस समय घास प्रबंधन कैसे किया जाए?
-प्रमोद साहनी, घोसी, मऊ।
जवाब : रोपाई से पूर्व तथा 35 दिन तक घास प्रबंधन का सर्वोत्तम समय होता है। जिन खेतों में बालियां निकल रही हैं अब उनमें घास प्रबंधन करना अनुपयोगी होगा। लंबी अवधि की प्रजातियों में घास समस्या का निस्तारण किया जा सकता है। खेत में लगभग दो माह की हो चुकी घास पर दवा का छिड़काव करने से अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे में मजदूरों द्वारा घास का नियंत्रण करना ज्यादा लाभप्रद होगा।
सवाल : सितंबर के पहले सप्ताह में खाली खेत का उपयोग कैसे करें?
-देवप्रकाश राय, सहरोज, मऊ।
जवाब : सितंबर के पहले पखवारे में खाली खेतों में तोरिया व राई की बुआई कर देना चाहिए। तोरिया में भवानी, पीटी-303, टाइट-9 व नरेद्र अगेती राई अच्छी प्रजातियां होती हैं। चार किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इसकी बुआई करना चाहिए। 80 किग्रा नाइट्रेजन, 40 किग्रा फास्फोरस तथा 40 किग्रा पोटाश प्रति बीघा की दर से छिड़काव करना चाहिए। तिलहन की फसल बुआई के दौरान सल्फर का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। इससे तेल उत्पादन के प्रतिशत में वृद्धि होती है।
