
- यूनिसेफ व एनएफडीसी ने लोकप्रिय फिल्मों में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हिंसा के चित्रण किये जाने से होने वाले प्रभाव पर ध्यान केंद्रित करने का किया आह्वान
गोवा:हर वर्ष की भांति इस वर्ष भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) चल रहा है। इस वर्ष फिल्म महोत्सव का 54वां संस्करण है। लेकिन यह संस्करण बाल अधिकारों और बच्चों के साथ होने वाली हिंसा और फिल्म माध्यमों के जरिए उसके चित्रण के लिहाज से खास है। क्योंकि यूनिसेफ और राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम (एनएफडीसी) ने फिल्म जगत और दर्शकों का ध्यान बच्चों के अधिकारों पर केंद्रित करने के लिए साझेदारी की है। इस वर्ष हुई साझेदारी के जरिये फिल्मों में बच्चों, किशोरों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के चित्रण पर ध्यान आकर्षित कराया गया है।

बच्चों से जुड़ी चार राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय चार फिल्मों का प्रदर्शन
एनएफडीसी और यूनिसेफ द्वारा तैयार की गई चार राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों का विशेष पैकेज तैयार किया गया है जो वास्तविक जीवन में बच्चों द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दों को दर्शाता है। बड़ी बात यह है कि भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव गोवा में सप्ताह भर चलने वाले महोत्सव के दौरान ये फिल्में विभिन्न सिनेमाघरों में ये प्रदर्शित भी की जा रही हैं।इन फिल्मों का प्रदर्शन फिल्म बाजार सेगमेंट में ज्ञान श्रृंखला के तहत किये जाने के साथ ही यूनिसेफ की पहल पर प्रसिद्ध अभिनेताओं, निर्देशकों और फिल्म निर्माताओं ने लोकप्रिय सिनेमा में बच्चों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के चित्रण/प्रदर्शन और इससे जुड़े मुद्दों को संबोधित करने की चुनौतियों पर एक घंटे की परिचर्चा का आयोजन भी हुआ।
परिचर्चा में शामिल पैनलिस्टों में सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव, नीरजा शेखर, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के सदस्य और अभिनेता – वाणी त्रिपाठी टिक्कू, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता अभिनेता – श्वेता बसु प्रसाद, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता, लेखक और निर्माता नलिन कुमार पंड्या के साथ, यूनिसेफ इंडिया की संचार, एड्वोकेसी और भागीदारी प्रमुख, ज़ाफ़रीन चौधरी ने सहभागिता की।
हिंसा दिखाने व बच्चों पर होने वाले प्रभाव पर हुई चर्चा
एंटरटेनमेंट और लाइफस्टाइल संपादक, पूजा तलवार द्वारा संचालित सत्र में, बच्चों द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अनुभव की जाने वाली हिंसात्मक गतिविधियों जुड़े मुद्दों और लोकप्रिय सिनेमा में उन्हें कैसे दर्शाया और समझा जाता है, विषय पर केंद्रित था। फिल्मों में हिंसा के विभिन्न आयामों – बच्चों और समाज पर होने वाले इसके प्रभाव, और स्क्रिप्ट से लेकर प्रोडक्शन और दर्शकों की अपेक्षाओं तक फिल्म जगत के परिप्रेक्ष्य पर चर्चा की गई।

फिल्म निर्माण से जुड़ी चुनौतियों पर हुई चर्चा
75 क्रिएटिव माइंड्स फॉर टुमॉरो, माननीय सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर की एक पहल है, जो भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में यूनिसेफ द्वारा समर्थित है। इसे मिशन लाइफ की थीम पर तैयार किया गया है जो फिल्म निर्माण से जुड़ी चुनौती (48 घंटे) में खुद को अभिव्यक्त करने के लिए युवा प्रतिभाओं को बढ़ावा देती है। इसके निर्मित पांच फिल्में इन शॉर्ट्स द्वारा विश्व स्तर पर प्रसारित की जाएंगी।
इस साझेदारी की सराहना करते हुए, माननीय सूचना और प्रसारण मंत्री, श्री अनुराग ठाकुर ने कहा, “सूचना और प्रसारण मंत्रालय का प्रयास उन फिल्मों को बढ़ावा देना और संरक्षित करना है जिनका समाज पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही, सरकार विभिन्न रचनात्मक प्रयासों के जरिये युवाओं की शक्ति को उजागर करने का भी प्रयास करती है और 75 क्रिएटिव माइंड्स ऑफ टुमॉरो (सीएमओटी) एक ऐसी पहल है जो देश भर से युवा सिनेमाई प्रतिभाओं को एक मंच पर लाती है और उन्हें मौका देती है, ताकि वे अपनी प्रतिभा को दुनिया के सामने प्रदर्शित करें। मुझे गर्व है कि इस पहल में, हमें यूनिसेफ और इन शॉर्ट्स का अटूट समर्थन मिला है, दोनों के जुड़ने से इस कार्यक्रम का मूल्यवर्धन होने के साथ ही 75CMOT के बारे में वैश्विक जागरूकता पैदा करके इसे काफी मजबूत किया है।”
यूनिसेफ इंडिया के संचार, एडवोकेसी और भागीदारी प्रमुख ज़फ़रिन चौधरी ने कहा, “ यूनिसेफ के लिए भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव फिल्म निर्माताओं, कला और संस्कृति जगत के लोगों, आलोचकों और दर्शकों तक व्यापक रूप से बच्चों के अधिकारों तक पहुंचने के लिए एक सक्षम मंच है, जिसके जरिए बच्चों और युवाओं पर इसके गंभीर प्रभाव को रोके जाने के साथ ही जबकि हिंसा को सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। 75 क्रिएटिव माइंड्स जैसी पहल युवा फिल्म निर्माताओं को चुनौती प्रस्तुत करने के साथ ही उनका समर्थन करती है क्योंकि वे वास्तविक जीवन से जुड़े मुद्दों पर संवेदनशीलता के साथ अपने स्वयं की दृष्टि के माध्यम से कहानी कहने के कौशल का पता लगाते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि “यूनिसेफ को भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दूसरे वर्ष के लिए एनएफडीसी का सहयोगी बनकर खुशी हो रही है, फिल्मों के क्यूरेटेड पैकेज के साथ हमें उम्मीद है कि यह लोकप्रिय फिल्मों में बाल अधिकारों को मान्यता देने पर सकारात्मक चर्चा करेगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा, हम बच्चों पर और उनके बारे में अनुकरणीय फिल्मों को बढ़ावा देने और उन्हें शामिल की दिशा में नेतृत्व प्रदान करने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की बहुत सराहना करते हैं।
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भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दिखाई गई चार बाल-केंद्रित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फिल्में बच्चों और महिलाओं के समक्ष आने वाली चुनौतियों के साथ-साथ साहस और लचीलेपन की कहानियों पर ध्यान आकर्षित करने के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।
ये फ़िल्में हैं:
• ईरान के अलीरेज़ा मोहम्मदी रौज़बहानी द्वारा निर्देशित सिंगो एक मजबूत इरादों वाली और दृढ़निश्चयी लड़की की मार्मिक कहानी है, जो गांव के नेता के साथ अपने परिवार द्वारा किये गये समझौते को चुनौती देते हुए, अपने पिता द्वारा बेचे जाने वाले हॉर्सशू केकड़ों को बचाने के लिए निकलती है।
• भारत के मनीष सैनी द्वारा गांधी एंड कंपनी, बच्चों के समान अवसरों और उनके अधिकारों के लिए खड़े होने से जुड़े विषय पर प्रकाश डालती है।
• संजीव पुष्पकुमारा द्वारा निर्देशित पीकॉक लैमेंट श्रीलंका में नवजात बच्चों की तस्करी पर आधारित एक कहानी है।
• ईरान में मोहसिन सेराजी द्वारा निर्देशित फॉर द सेक ऑफ अवा उन किशोरों के सामने आने वाली चुनौतियों पर प्रकाश डालती है जिनके पास औपचारिक पहचान का संकट है।


