धनपत राय श्रीवास्तव जो की मुंशी प्रेमचंद के नाम से जाने जाते हैं। हिंदी और उर्दू के सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यासकार, कहानीकार एवं विचारक थे। उनका जन्म 31 जुलाई 1880 मे लमही नामक स्थान जो कि ब्रिटिश राज में बनारस रियासत व वर्तमान में वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था।
प्रेमचंद जी के पिता का नाम मुंशी अजायबराय व माता का नाम आनंदी देवी था। 7 वर्ष की आयु में मुंशी जी की माता का स्वर्गवास हो गया था। 15 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह और अगले ही वर्ष उनके पिता जी का स्वर्गवास हुआ।
मुंशी प्रेमचंद अपनी शादी के फैसले पर पिताजी के बारे में लिखते हैं :-
“पिताजी ने जीवन के अंतिम वर्षों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे साथ में मुझे भी डुबो दिया”।
साहित्यक जीवन
उनका साहित्य जीवन का आरंभ 1901 से हुआ था। आरंभ में वे नवाब राय के नाम से उर्दू में लिखते थे।
प्रेमचंद की पहली रचना जो की अप्रकाशित रही। शायद एक नाटक था जो उन्होंने अपने मामा के प्रेम के फलस्वरूप चमारों द्वारा उनकी पिटाई पर लिखा था। इसका जिक्र उन्होंने ‘पहली रचना’ नामक अपने लेख में किया।
उनका पहला उपलब्ध लेख जो की उर्दू उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ (भगवान् के निवास का रहस्य) है जो धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ था, ऐसे ही उनका साहित्य रचनाओं का सिलसिला आगे बढ़ा।
आखिर प्रेमचंद नाम पड़ा कैसे?
सोजे वतन उनकी पहली कहानी संग्रह थी। इस संग्रह में पांच कहानियां हैं, जो देश-प्रेम और आजादी के दीवानों की शहादत का भावपूर्ण चित्रण करती है। सोजे वतन की लोकप्रियता से आशंकित होकर ब्रिटिश सरकार ने इसकी प्रतियाँ जब्त कर ली थीं। इसी वजह से नवाब राय से नाम बदलकर प्रेमचंद्र के नाम से लिखना शुरू किया। प्रेमचंद के नाम से पहले उनकी रचना कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ जमाना पत्रिका में दिसंबर 1910 के अंत में प्रकाशित हुई। यूं तो उनकी अनेकों रचनाएं हैं जहां उन्होंने डेढ़ दर्जन से ज्यादा उपन्यास, 300 से ज्यादा कहानियां व अनेकों कविताएं हिंदी व उर्दू में लिखी।
एक दौर था जब आज की तरह मनोरंजन के तमाम साधन नहीं थे। तब लोग कहानियों, कविताओं और उपन्यासों को पढ़ते थे। तब मुंशी प्रेमचंद लोगों की पहली पसंद हुआ करते थे। अपनी कहानियों में वे दीन-दुखियों और पिछड़े-वंचितों के संघर्ष भरे जीवन को यथावत उकेरते थे. उनकी कहानियों और उपन्यासों की अपनी एक अलग विशेषता थी. एक तरफ उनकी कहानी की भाषा अत्यंत सरल होती थी वहीँ दूसरी और उपन्यासों में उनके जटिल दार्शनिक दृष्टिकोण की भी झलक देखने को मिलती थी। अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने सामंतवाद की खामियों पर विशेष प्रकाश डाला।
गोदान, कर्मभूमि, गबन, निर्मला आदि उनकी कालजई रचनाएं हैं। उनकी प्रसिद्ध कहानियां जैसे ‘दो बैलों की कथा’, ‘बूढ़ी काकी’ आदि थी।
ऐसे ही उनकी अनेकों कविताएं थी जिनमें से एक प्रसिद्ध कविता है, ‘ख्वाहिश’ जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
‘एक अजीब सी
दौड़ है ये ज़िंदगी
जीत जाओ तो कई
अपने पीछे छूट जाते हैं
और हार जाओ तो
अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं’
प्रेमचंद जी ने अपने जीवन में अनेकों उतार-चढ़ाव देखे जो कि उनकी रचनाओं में साफ झलकते है, उनकी रचनाएं देशभक्ति, किसान व आम जीवन को समर्पित थी।
आधुनिक काल के मुन्शी जी की रचनाएं तत्कालिन समय के जीवन को दर्शाती थी, पर आज भी हम इन रचनाओं को अपने वर्तमान से जोड़कर देख सकते हैं।
उनके उपन्यासों, कहानियों और कविताओं का सिलसिला तो ऐसे ही चलता रहा।
लंबी बीमारी के कारण 8 अक्टूबर 1936 में 56 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया।
