लागी जईंहे मिजल्स रूबेला के टीका ललनवा होईंहे सुघर हो..

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संतोष कुमार ​सिंह

अब खसरा, रूबैला वायरस के उन्मूलन की पूरी तैयारी..दूसरा चरण आज से

चंडीगढ़: जुग जुग जियसु ललनवा, भवनवा के भाग जागल हो ललना लाल होइहे, कुलवा के दीपक मनवा में आस लागल हो..सभी मां बाप इसी आस के साथ..उम्मीद के साथ बच्चों को पालते हैं..जैसे—जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं मां—बाप बच्चे को देखकर खुश होते हैं..लेकिन क्या आपको पता है कि इसमें से कुछ बच्चे ऐसे भी होते है जो बधिर हो सकते हैं, अंधेपन का शिकार हों सकते हैं..या फिर उस बच्चे के दिल में छेद हो। कल्पना कीजिए जिस घर में ऐसा बच्चा है..उस मां—बाप की क्या स्थिती होगी। आप पहचान भी नहीं पाते कि आपका बच्चा क्योंकर इस बीमारी से ग्रसित हुआ।  चौंकिए नहीं वह ‘पैदाइशी रूबेला’ नामक अति खतरनाक माने जाने वाले सिंड्रोम (सीआरएम) से पीड़ित हो सकता है। बड़ी बात यह है कि गर्भवती माताओं में संक्रमण का खतरा भी होता है जिससे सीधे तौर पर बच्चे प्रभावित होते हैं। और ऐसे सभी बच्चों के जीवन को इस खतरनाक खसरा रूबेला वायरस से बचाने का एक ही रास्ता है टीकाकरण। यही कारण है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अपने देश के सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम ‘यूनीवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम (यूआईपी)’ में पहली बार रूबेला वैक्सीन को भी शामिल किया गया है जो कि आपके बच्चेे को इस बीमारी से बचायेगा। स्वास्थ्य विभाग ने 2020 तक खसरा और रूबेला को पुरी तरह से खत्म करने का लक्ष्य रखा है।

 टीकाकरण ही बचाव

रूबेला का संक्रमण छोटा ही होता है लेकिन यदि इसके चपेट में गर्भवती महिला आ जाए तो इसके गंभीर परिणाम दिखाई देते हैं। यदि कोई गर्भवती महिला गर्भधारण के शुरूआती सप्ताह में ही रूबेला संक्रमित हो जाती है तो इसके परिणाम स्वरूप गर्भपात या अपरिपक्व जन्म के साथ ही नवजात में कई तरह की गंभीर बीमारियां मसलन बहरापन,अंधापन या हृदय में परेशानी जैसी बीमारियां हो सकती हैं। इसे पैदाईशी रूबेला सिंड्रोम सीआरएस के नाम से जाना जाता है जिसका कोई इलाज नहीं है।

क्या कहते हैं आंकड़े

एमआर वैक्सिन खसरा से बचाव करता है, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में बच्चों की मृत्यू हो जाती है। खसरा में व्यापक संक्रमण होता है और यह कफ और छींकने के जरिए फैलता है। वर्ष 2015 में खसरे की वजह वैश्विक स्तर पर 134,200 बच्चों की मृत्यू हुई। केवल भारत में इसकी वजह से 49,200 मृत्यू हुई जो कि लगभग 36 फीसदी है। जो बच गये उनसे औरों के संक्रमण की चपेट में आने और डायरिया और निमोनिया जैसे गंभीर बीमारियों से ग्रस्त होने का जोखिम और भी बढ़ जाता है।

पहला चरण पूरा..दूसरे चरण की हुई शुरूआत

फरवरी 2017 से चलाये गये एमआर अभियान के पहले चरण के दौरान तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, पुडुचेरी और लक्षद्वीप में 3.3 करोड़ बच्चों को टीका लगाया गया था। खसरा रूबैला अभियान का दूसरा चरण एक अगस्त 2017 से शुरू होगा, जिसमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, केरल, उत्तराखंड, दमन और दीव, दादर और नगर हवेली राज्यों में 9 महीने से 15 साल तक के 3.4 करोड़ बच्चों के टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है।

विशेषज्ञों की राय

केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में टीकाकरण मामलों के डिप्टी कमीशनर डा. प्रदीप हल्दर कहते हैं कि रूबेला 15 साल तक के बच्चों में ज्यादा खतरनाक है। एक रूबेला संक्रमित बच्चा आसपास के 80-95 फीसद बच्चों तक ये वायरस पहुंचा सकता है। अभियान के तहत पांच वर्ष की आयु सीमा के करीब एक तिहाई बच्चों की मृत्यु को टीकाकरण के जरिए रोका जाएगा। देश में संभवत: सम्पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य को एक निर्धारित समय यानी 2020 तक पूर्ण करने के लिए यह अभियान है। सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम यूआईपी में पहली बार रूबेला वैक्सीन को भी शामिल किया गया है। अब तक इस टीके को लगवाने के लिए निजी डाक्टर शुल्क वसूलते थे।

वहीं यूनिसेफ इंडिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डाॅ सतीश गुप्ता ने भरोसा जताया कि पोलियो की तरह ही मिजल्स रूबेला को जड़ से मिटाने में कामयाबी मिलेगी। टीकाकरण न केवल बच्चों की जीवन की रक्षा करती है, बल्कि उनके स्वस्थ एवं उपयोगी भविष्य को भी सुनिश्चित करती है और यह सबसे अधिक लागत प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों में से एक है। हालां​कि साथ उन्होंने इसके लिए मीडिया का सहयोग भी मांगा  और कहा कि पोलियो के खिलाफ लड़ाई में मीडिया हमारे लंबे समय से चलने वाले सहयोगी रही है। अब हम सभी बच्चों, चाहे वो कहीं भी रहते हों, का टीकाकरण सुनिश्चित करने में मीडिया को सहयोग चाहते हैं।

 

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