मनोज कुमार
भभुआ: पहले गरीबी और बेकारी ने परदेस जाकर रोजी रोटी कमाने को मजबूर किया और अब कोरोना ने एक बार फिर कदम गांव घर की ओर मोड़ने को विवश कर दिया दिल्ली फरीदाबाद नोएडा गुडगाँव सूरत, और बेंगलूर से पैदल और साइकिल के जरिए काफी तादात में प्रवासी मजदूर पहुंचें और सडक पर ही आराम करने पसर(बैठ) गए। मजदूरों की माने तो चलते चलते इतना थक गए हैं की अब चला नहीं जाता। गनीमत है कि बिहार सीमा हमारे जिले तक ले जाने के लिए बसें खडी ।है दरअसल कोरोना की वजह से बड़े पैमाने पर इन दिहाड़ी मजदूरों का पलायन हो रहा है। कर्मनाशा बार्डर पर कोरोना संकट से उपजे इस पलायन ने मुल्क के बंटवारे के बाद बड़े पैमाने पर हुए पलायन जैसे ही दृश्य नजर आए।

बांका के महेश, नीरज, राजवीर, राम अवतार छोटे भाई के साथ मिस्त्री का काम करते है। रामऔतार बातचीत करते ही बिलख पड़े। उन्हें सबसे ज्यादा कष्ट अपने नन्हें-नन्हें बच्चों को पैदल चलते-चलते थक जाने पर उन मासूमों के चेहरों पर उभरे उस दर्द से हो रहा है जो बगैर बोले ही कह रहा है कि पापा अब नहीं चला जाता…। रमेश और उनके साथी पैदल ही दिल्ली से सीवान के लिए चले मदन अपनी टोली के साथ कंधे पर बैग, बोरी लादे जैसे ही कर्मनाशा बार्डर पहुंचे तो वहां से उनके जिले के लिए बस खडी थी भोजन में भेज बिरयानी और रायता खाने के बाद उसने राहत की सांस ली। पूछने पर मजदूर कहते हैं खाने के उन्हें लखनऊ में पुलिस वालों ने पैकेट दिया था। बाकी सफर बिस्कुट और पानी पी कर गुजरा। अब बिहार सीमा में भर पेट खाना मिला है थोडे आराम के बाद बस खुलने वाली है रविवार की सुबह हम अपने गांव होंगे पर पता नहीं गांव में घुसने भी देंगे या नहीं मन में एक सवाल बार-बार परेशान कर रहा है-वहां से चल तो दिए, पता नहीं गांव में घुसने दिया भी जाएगा या नहीं।
दरअसल बिहार के विकास में प्रवासी मजदूरों का योगदान किसी से कमतर नहीं है। जानकारी के मुताबिक बिहार के सरकारी खजाने को हर साल प्रवासी मजदूरों की वजह से 50 से 70 हजार करोड़ का इजाफा होता है। यही नहीं बिहार के मजदूर दूसरे प्रदेश में जाकर उसे भी समृद्ध करते हैं। 30 से 40 लाख प्रवासी मजदूर देश के कोने कोने में किसी न किसी रूप में कार्यरत हैं और अब लॉक डाउन की वजह से जब उनका पलायन शुरू हुआ है तो उद्योगपतियों के होश ठिकाने लगने शुरू हो गए हैं चुकी जब शहरों में मजदूर रहेंगे नहीं तो कंपनियां कंपनियों की चिमनी या धुंआ कैसे लेंगे। उद्योग का रफ्तार ठहर जाएगा। शहरों में प्रवासी मजदूर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप देश के विकास को गति देते हैं। औद्योगिक उत्पादन का मसला हो या फिर कंस्ट्रक्शन खेती किसानी बागवानी से लेकर छोटे बड़े सरकारी गैर सरकारी दफ्तरों में भी प्रवासी मजदूरों की वजह से ही रौनक बढ़ती है और यही कारण है कि शहरों से हो रहे मजदूरों के पलायन का असर वहां की सरकारों पूंजीपति और उद्योगपतियों को भी डराने लगी है।
एक बात और जितने प्रवासी मजदूर अपने गांव आ गए हैं और जितने शहरों में फंसे हैं जब ये भी अपने घर चले आएंगे तो शहर की आबादी तो कम हो जाएगी लेकिन उत्पादन और विकास भी जमीन पर पसर जाएगा और इसी की चिंता है कि शहरों में फंसे प्रवासी मजदूरों को रोकने की कवायद तेज हो गई है मालिक और मजदूर का कॉन्सेप्ट सरकार और उद्योगपतियों को अब पता चलेगा कल तक उनके मेहनत और मजदूरी का शोषण करने वाले उद्योगपति वैज्ञानिक युग में भी इंसान नहीं बना सकते हैं।


