संजीव कुमार
मिड-डे मील योजना भोजन के स्तर, सुरक्षा और स्वच्छता को लेकर हमेशा से चर्चा के केंद्र में रहा है, लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेख परीक्षक(कैग) ने पहली बार इस योजना के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मिड-डे मील बच्चों को स्कूल तक लाने में असफल है।
मिड-डे मील योजना के स्तर, सुरक्षा व स्वच्छता पर तो लगातार सवाल उठते रहे हैं, लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने पहली बार इसके उद्देश्य पर सवाल उठाया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने कहा है कि यह योजना बच्चों को स्कूलों तक लाने के लिए और स्कूलों में बच्चों के नामांकन में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में जिस तरह बच्चों के नामांकन दर में लगातार कमी आई है उससे लगता है कि यह योजना भी बच्चों को स्कूलों तक लाने में पर्याप्त साबित नहीं हो पा रही है।
मध्याह्न भोजन योजना के लेखा परीक्षा में कहा गया है कि 2009-10 से 2013-14 तक की अवधि में हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, लक्षद्वीप और पुडुचेरी के स्कूलों में बच्चों के नामांकन में गिरावट देखी गई है। अन्य राज्यों में नामांकन की अलग-अलग स्थिति थी।
गौरतलब है कि 2009-10 से 2013-14 तक सरकारी स्कूलों, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों, विशेष प्रशिक्षण केंद्रों, मदरसों में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर बच्चों के नामांकन में 2010-11 को छोड़कर लगातार कमी दर्ज की गई है। बताते चलें कि 2009-10 में एमडीएम युक्त स्कूलों में नामांकन 14.69 करोड़ था जो 2010-11 में मामूली रूप से बढ़कर 14.77 करोड़ दर्ज किया गया। हालांकि 2011-12 में यह दर घटकर 14.59 करोड़, 2012-13 में 14.21 करोड़ और 2013-14 में कम होकर 13.87 करोड़ हो गई।कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अवधि में हालांकि निजी स्कूलों में नामांकन 38 फीसद तक बढ़ी है जबकि सरकारी स्कूलों वाले स्कूलों में इसमें 5.58 फीसद तक कमी आई। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की लेखा परीक्षा में कहा गया है कि ‘इससे स्पष्ट है कि जनसंख्या का एक वर्ग मुफ्त खाने की अपेक्षा शिक्षा की गुणवत्ता को प्राथमिकता देता है। यह बताता है कि मुफ्त मिड-डे मील भी बच्चों को स्कूलों तक लाने में असऊल है। साथ ही यह योजना स्कूल में बच्चों को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। जब तक इसे अध्यापन या सीखने के परिणामों में सुधार के साथ नहीं जोड़ा जाता, तब तक स्कूलों में बच्चों के नामांकन में सुधार नहीं होगा।’ कहने की आवश्यकता नहीं है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की स्थिति दयनीय है। इस पर राज्य सरकार को विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
कैग ने अपनी लेखा परीक्षा रिपोर्ट में लिखा है कि, ‘यह समझने का उचित समय है कि खाना शिक्षा जैसे बड़े प्रयोजन की जरूरत को पूरा करने वाले साधनों का एक अंत है। खाने का अपना प्रयोजन तभी पूरा होगा जब अभिभावकों को अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के संबंध में उम्मीदें पूरी हों।’ इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि मध्याह्न भोजन योजना के उद्देश्यों में से एक उद्देश्य वंचित वर्गों से जुड़े बच्चों को स्कूल तक लाने और कक्षा में पढ़ाई और अन्य गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना है।’
लेकिन विडंबना यह है कि वंचित वर्गों से जुड़े बच्चों की पहचान के लिए कई राज्य सरकारों ने कोई पहल नहीं की है। अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, पंजाब, ओड़ीशा, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और दिल्ली की राज्य सरकारों ने वंचित वर्गों से जुड़े बच्चों की पहचान करने के लिए कोई मानदंड नहीं बनाए हैं। इतना ही नहीं ऐसे बच्चों का पता लगाने के लिए राज्य सरकारों ने अब तक कोई सर्वेक्षण भी नहीं किया है।’
कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे बच्चे जिनका स्कूलों में दाखिला नहीं हुआ है, उनके माता-पिता को इस योजना के बारे में जानकारी देने के लिए विशेष योजनाएं बनाने की परिकल्पना की गई थी। लेकिन कुछ राज्यों में इस योजना को लेकर कोई पहल ही नहीं की गई। लेखा परीक्षा में यह देखा गया कि अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, मणिपुर और पंजाब में इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई है।
दूसरी तरफ राजधानी दिल्ली में 2010-14 के दौरान मिड-डे मील के 89 फीसदी नमूने पोषण मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं। इसका खुलासा भी कैग ने अपने इस रिपोर्ट में किया है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की मिड-डे मील योजना की रिपोर्ट में कहा गया है कि एजेंसी के परीक्षण में ज्यादातर मिड डे मील के नमूने पोषण मानकों से कम पाए गए। कैग ने कहा कि कम से कम नौ राज्यों के मामलों में तय पोषण नहीं पाया गया। दिल्ली का उदाहरण देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रीराम इंस्टिट्यूट फॉर इंडस्ट्रियल रिसर्च द्वारा किए गए परीक्षण में 2,012 में 1,876 नमूने तय पोषण मानकों पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए।
वहीं नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने चंडीगढ़ औद्योगिक एवं पर्यटन विकास निगम (सिटको) द्वारा सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए बनाए जा रहे मिड-डे मील के स्तर, सुरक्षा व स्वच्छता पर सवाल खड़े किए हैं। और सिटको के खिलाफ कार्रवाई का सुझाव दिया है। बताते चलें कि चंडीगढ़ शहर में सरकारी स्कूलों के लगभग 2 लाख बच्चों को मिड-डे मील योजना के तहत दोपहर का भोजन दिया जाता है। इस बाबत सिटको से संबंधित चंडीगढ़ इंस्टीच्यूट ऑफ होटल मैनेजमैंट व अंबेडकर इंस्टीच्यूट ऑफ मैनेजमैंट की सेवाएं ली जा रही हैं। इस संबंध में गत वर्ष संसद में पेश वर्ष 2009 से 2014 तक की अवधि की कैग रिपोर्ट में कहा गया है कि चंडीगढ़ में मिड-डे मील बहुत गंदे हालत में बनाया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के दोपहर का भोजन टूटे व गंदे बर्तनों में बनाया जाता है।
वहीं उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में बच्चों को मिल रहे मिड-डे मील का पोषण स्तर भी तय मानक से कम पाया गया है। ऐसे में जरूरी इस बात की है कि बच्चों के भोजन में पोषण का ठीक हो। इसके लिए राज्य सरकारों को ध्यान देने की जरूरत है।
कैग की रिपोर्ट : नामांकन में गिरावट एक नजर में
वर्ष नामांकन
2009-10 14.69 करोड़
2010-11 14.77 करोड़
2011-12 14.59 करोड़
2012-13 14.21 करोड़
2013-14 13.87 करोड़
मिड-डे मील से बच्चों की सुरक्षा का सवाल
मिड-डे मील पर कैग रिपोर्ट आने के बाद भी मिड-डे मील के स्तर, सुरक्षा व स्वच्छता को लेकर स्कूल प्रशासन और मिड-डे मील से जुड़े लोग गंभीर नहीं दिखते। यही वजह है कि बीते 6-7 जनवरी को बिहार और मध्य प्रदेश में एक बार फिर विषाक्त भोजन खाने से बच्चे बीमार हो गए हैं। बताते चलें कि गत 6 जनवरी, 2016 को बिहार के पटना (दानापुर) के दियारा के हवासपुर डेरा के प्राथमिक विद्यालय के मिड डे मील का विषाक्त भोजन खाने से 73 बच्चे बीमार हो गए। सभी बीमार बच्चों को दानापुर अनुमंडल अस्पाताल में भर्ती कराया गया है। गांव वालों के मुताबिक मिड-डे मील में छिपकली मिली थी। खाना खाने के बाद सभी बच्चे घर चले गए। कुछ देर बाद कई बच्चों को उल्टियां होने लगीं। बच्चों को पहले दियारा में ही प्राथमिक इलाज शुरू कर दिया गया। बाद में उन्हें दानापुर अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ अशोक सिंह का कहना है कि सभी बच्चे अब बिल्कुल ठीक हैं। वहीं दानापुर के एसडीओ संजीव कुमार ने बच्चों के बारे में जानकारी लेने के बाद कहा कि घटना की जांच की जाएगी।
वहीं 7 जनवरी को मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के जलोदा गांव के प्राथमिक स्कूल में मिड-डे मील खाने से 14 बच्चे फूड प्वाइजनिंग का शिकार हो गए। खाना खाने के बाद जैसे ही बच्चे घर पहुंचे कि उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत होने लगी। बच्चों की हालत जब ज्यादा बिगड़ने लगी तो घबराकर परिजन उन्हें तुरंत जिला अस्पताल ले गए। बच्चों की स्थिति को देखते हुए तत्काल उनका इलाज शुरू किया गया। वहीं घटना की जानकारी मिलते ही एसडीएम केके मालवीय सहित कई अधिकारी अस्पताल पहुंचे और डॉक्टरों से बच्चों की हालत के बारे में जानकारी ली।
हालांकि, दोनों घटनाओं में पीडि़त सभी बच्चों की हालत अब खतरे से बाहर है। वहीं अधिकारियों का कहना है कि मिड-डे मील से जुड़े लोगों पर कार्रवाई होगी।

