पंचायत में चुनाव में शौचालय की शर्त के खिलाफ माकपा माले सड़क पर उतरने जा रही है। 24 जनवरी को पूरे बिहार में चक्काजाम किया जाएगा। माले पंचायत चुनाव दलीय आधार पर कराने की मांग भी कर रही है। चक्काजाम का असर तो पार्टी की सांगठनिक ताकत के मुताबिक होगा, पर शौचालय की षर्त रखकर लोक अधिकारों का अपहरण करने की कोषिषों के खिलाफ पहल करके उसने दूसरी वामपंथी पार्टियों के सामने चुनौती जरूर प्रस्तुत कर दी है।
माले ने कहा है कि शौचालय की शर्त लादकर पंचायत चुनावों से दलितों और गरीबों को बाहर करने की साजिष की जा रही है जबकि पंचायतों को अधिक जबाबदेह और समावेषी बनाने की जरूरत है।
उल्लेखनीय है कि पंचायत चुनाव अधिनियम-2015 में पंचायत चुनावों में उम्मीदवारी के लिए शौचालय की शर्त जोडने के लिए बीते साल अगस्त में विधानसभा से संषोधन प्रस्ताव पारित हुआ था। माकपा माले ने इस षर्त को गरीबों के लोतांत्रिक अधिकारों में कटौती की साचिष करार दिया है। क्योंकि गरीब और भूमिहीन ही शौचालय नहीं बनवा पाते। जिनके सामने पेट भरने की समस्या हो, वे शौचालय कैसे बनवा सकते हैं? इसलिए माले ने कहा है कि पंचायतों को राज्य प्रशासन की कठपुतली बनाने की कोशिष हो रही है जिसमें संपन्न लोग ही उम्मीदवार और पदाधिकारी बन सकेंगे। इसलिए पार्टी ने तय किया है कि इसे लेकर पंचायत स्तर पर राज्य व्यापी आंदोलन किया जाएगा। यह अभियान 19 जनवरी से आरंभ हुआ है। 24 जनवरी को राज्य का चक्काजाम किया जाएगा।
वैसे राज्य सरकार को पंचायत चुनाव में शौचालय की शर्त रखने के पहले राज्य में शौचालयों की अवस्था को देख लेना था। इस बारे में राज्य सरकार की अपनी रिपोर्ट है। उस रिपोर्ट के आधार पर गणना बैठती है कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 50 लाख शौचालय हैं जिनमें करीब 20 लाख खराब पडे हैं। चालू वर्ष में 27 लाख शौचालय बनवाने का लक्ष्य रखा गया था, बने महज एक लाख से कुछ अधिक। हालत तो यह है कि राजधानी पटना के शौचालयों की देखभाल की जिम्मेवारी सुलभ इंटरनेशनल को सौंपने के नगर विकास विभाग के निर्देश पर पटना नगरनिगम अमल करने जा रहा है।
राज्य को खुले में शौच से मुक्त बनाने के अभियान में पुराने खराब पड़े शौचालय बड़ी बाधा हैं। इन शौचालयों को फिर से बनाने या मरम्मत के लिए राज्य या केन्द्र सरकार की कोई योजना नहीं है। इनकी गिनती ग्रामीण क्षेत्रों में बनाए गए कुल शौचालयों में की जाती है। लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग ने 2012-13 में ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों कीअवस्था के बारे में सर्वेक्षण कराया था। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 2 करोड 13 लाख परिवार निवास करते हैं। इनके बीच 45 लाख 82 हजार शौचालय हैं जिसमें 17 लाख 54 हजार 253 शौचालय विभिन्न कारणों से खराब पाए गए जिनका प्रयोग संबंधित परिवार नहीं करता। सर्वे के अनुसार राज्य में कुल 28 लाख 27 हजार शौचालय ही उपयोग में थे। इस सर्वे के मुताबिक राज्य में एक करोड़ 68 लाख 17 हजार परिवारों के पास शौचालय नहीं थे। इस सर्वे के बाद अब तक करीब पांच लाख शौचालय बने हैं। पंचायती राज कानून में संषोधन करके उम्मीदवारी की पात्रता में घर में शौचालय होने की शर्त जोड़ने में एक अन्य पेंच भी है। सरकार ने स्वयं हर घर में शौचालय अभियान को पांच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा है। तो पंचायत की उम्मीदवारी में यह षर्त अभी क्यों? विभागीय पदाधिकारियों का कहना है कि शौचालय निर्माण के लक्ष्य को जागरुकता के जरीए पूरा करने की कोशिश की जा रही है।
फिर वर्षों से चल रहे निर्मल अभियान पर खर्च हुए करोड़ों रूपए कहां गए? इस प्रशन का जबाब मांगने या देने का कोई प्रशन नहीं है क्योंकि यह आमसमझ की बात है। वैसे खराब शौचालयों की मरम्मत कराने की कोई सरकारी योजना नहीं है। उन्हें चालू करने के लिए सिर्फ लोगों को प्रेरित किया जा सकता है।
