अंकित पाण्डेय
हिमाचल प्रदेश के बाबूराम अपनी पत्नी और बेटी के साथ मिलकर पत्तल बनाते हैं। वे अब इतने अभ्यस्त हो गए हैं की अब उन्हें पत्तल बनाने में देर नहीं लगती। यहां हर साल 13 हजार टन प्लास्टिक कचरा जमा हो जाता है। कूड़े के ढेरों को विघटित होने में दशकों लग जाते हैं। साल 2022 में राज्य सरकार ने सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगा दिया था तब से लोग तौर के पत्ते फिर से यूज करने लगे। घरेलू समारोहों में इसकी बड़ी मांग होती है। पहाड़ों पर 2 से 4000 फीट की ऊंचाई पर सामान्यतः पाए जाने वाले इस पेड़ के पत्ते चौड़े होते हैं जिससे पत्तल बनाना आसान होता है।
पत्तल बनाने के पारंपरिक तरीके में मेहनत बहुत लगती है। एक पत्तल के लिए 3 से 5 पत्ते चाहिए होते हैं। इन्हे बांस की तीलियों से बांधने में आसानी होती है।
बाबू राम अभी तक पारंपरिक तरीके से पत्तल बनाते थे लेकिन एक महिला स्वयं सहायता समूह ने बाबू राम के इस कार्य को और बल देने का निर्णय लिया और व्यापारियों से चंदा लेकर बाबूराम को पत्तल बनाने वाली मसीम उपलब्ध कराई। अब बाबूराम जैसे बीस परिवार पत्तल बना कर हर महीने करीब 4 लाख रूपये महीने कमा रहे हैं।
बाबूराम की तरह ही 35 साल की पद्मावती का परिवार पीढ़ियों से पत्तल बनाने का काम करता आ रहा है। अब उनका परिवार मसीन का इस्तेमाल करके करीब 1000 पत्तल बना लेता हैं।
सिंगल यूज प्लास्टिक बैन होने के बाद तौर के पत्तों की मांग बढ़ने लगी है। पहाड़ी इलाकों में खेती किसानी बहुत ही दुर्लभ है ऐसे में गरीब परिवारों के लिए पत्तल का काम वरदान साबित हुआ है।
बाबूराम खुश है कि उनके बनाए पत्तलों की की मांग बढ़ती ही जा रही हैं
