कुसहा त्रासदी के असली कारण को भूल गए हैं हम

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अमरनाथ झा,वरिष्ट पत्रकार

कुसहा-त्रासदी के आठ वर्ष हो गए। हम इसे भूल चूके है। लेकिन उसके असली कारणों पर आज तक ध्यान नहीं दिया जा सका है। हादसे का असली कारण कोशी के साथ आने वाली सिल्ट थी। कोशी बराज और तटबंधों की वजह से नदी में आने वाली सिल्ट नदी के तल में जमा है। नदी उथली हो गई है। बराज के उपरी बहाव क्षेत्र में यह उथलापन कहीं ज्यादा है। यही कारण है कि 18 अगस्त 2008 को बराज से आठ किलोमीटर उत्तर उपरी बहाव क्षेत्र में पूर्वी तटबंघ को तोडकर नदी बाहर निकल गई। तटबंध तोडकर बाहर निकला नदी का पानी जहां जहां गया, वहां सिल्ट व बालू की मोटी परत बिछ गई है।

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एक सरकारी आरंभिक सर्वेक्षण के अनुसार कुसहा त्रासदी के प्रभावित क्षेत्रों के करीब 20 प्रतिशत भूभाग में रेत या गाद का जमाव दो फीट से ज्यादा है। 30 प्रतिशत क्षेत्र में जमाव डेढ से दो फीट के बीच है। बाकी भूभाग में यह 6 से 10 इंच के बीच है। इस रेत के रहते उन खेतों में फसल नहीं हो सकती। समस्या यह है कि रेत को हटाया जाए तो उसे रखा कहां जाएगा। पुनर्वास और पुनर्निर्माण के दौर में इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई। पिछले दिनों पटना में एक कार्यशाला जरूर हुई जिसमें इस रेत के उपयोग पर चर्चा हुई।

इस काम में केन्द्र और राज्य सरकार की कई संस्थाएं लगी हैं। इस गाद से इंट, सेरामिक के सामान, चीनी मिट्टी के बरतन, टाइल्स आदि बनाने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। पहले चरण में सुपौल जिले के वीरपुर के आसपास जमा रेत पर परीक्षण किया जाना है। वीरपुर से करीब 50 किलोमीटर नीचे जमा रेत में भारी मात्रा में पोटास पाया गया है। वैज्ञानिक उस पोटास का उर्वरक के तौर पर इस्तेमाल करने की संभावना की तलास कर रहे हैं। इस मिटटी में हो सकने वाली फसल के बारे में भी प्रयोग किए जा रहे हैं। इस काम में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पटना केन्द्र और बिहार कृषि विष्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिक लगे हैं। रेत या गाद के लक्षणों के आधार पर आरंभिक शोध के आधार पर वैज्ञानिक टीके मुखोपाध्याय ने बताया कि इससे भवन निर्माण सामग्री-इंट, टाईल्स, सेनिटरी समान इत्यादि के अलावा सेरामिक के बरतन भी बन सकते हैं। कृषि आयुक्त विजय प्रकाष ने बताया कि कुछ नमूने आए हैं। उनका अनुकरण करके व्यावसायिक उत्पादन की संभावना तलाशने के लिए पटना पौलिटेक्निक को जिम्मा दिया गया है।

कुसहा में बराज के रक्षक तटबंध को तोड कर निकला पानी 20–25 किलोमीटर की चोराई में बहते हुए 160 किलोमीटर दूर कुरसेला जाकर गंगा में समाहित हुआ। सरकारी आंकडे के अनुसार, इस त्रासदी में नेपाल व भारत 3700 वर्ग किमी क्षेत्र तबाह हुआ। बिहार में 412 पंचायतों के 993 गाँव इसकी चपेट में आये। 362 राहत शिविरों में 440000 लोगों ने शरण लिया। 2,36632 घर ध्वस्त हुए। 1100 पुल एवं क्लवर्ट टूटे व 1800 किमी रोड क्षतिग्रस्त हुए। 38000 एकड़ धान, 15500 एकड़ मक्के, 6950 एकड़ अन्य फसलें बर्बाद हुई। 10000 दुधारू पशु 3000 अन्य पशु व 2500 छोटे जानवरों की मृत्यु हुई। इसमें 362 लोग की मृत्यु एवं 3500 लोग लापता दर्ज किये गये। यह तो सरकारी आकड़ा है। असल क्षति इन आकड़ों से कई गुना ज्यादा होगी।

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तटबंधों की देखभाल में भी कोताही हुई होगी। कोताही तो पीडितों के पुनर्वास और पुनर्निमाण में भी हो रही है। आज भी लाखों लोग पुनर्वास के लिए टकटकी लगाए हैं। लाखों एकड उपजाउ खेतों में बालू की मोटी परत बिछी है। हादसे के तत्काल बाद दोशारोपण का सिलसिला चल पड़ा। जिससे राहत व बचाव कार्यो में अव्यवस्था और अफरातफरी का माहौल रहा। राज्य और केन्द्र सरकार के अलावा भारत और नेपाल के बीच भी जिम्मेवार ठहराया गया। इस माहौल में छह महीने के भीतर पडताल करने के लिए गठित कोषी कटान न्यायिक जांच आयोग ने पांच वर्ष आठ महीनो के बाद 6 जून 2014 को अपनी रिर्पोट सौंपी। उसे रिपोर्ट सौंपे भी दो साल हो गए। पर कार्रवाई के नाम पर दोषी व्यक्ति को चिन्हित करने के लिए दो कमेटियों के गठन के सिवा कुछ नहीं हुआ। न्यायिक आयोग ने कोशी बराज की देखभाल नेपाल के हिस्से में करने में संस्थानिक और व्यवस्थागत असफलता को कारण माना था। लेकिन दोषी व्यक्ति को चिन्हित करने का काम छोड दिया था। इस प्रकार आला अधिकारियों को क्लीन चिट मिल गई। सरकार ने इस रिर्पोट को विधानसभा में रखा जरूर, पर मानसून सत्र के अन्तिम दिन पटल पर रखा। उपरोक्त कमटियों के गठन का हवाला देकर अपनी पीठ खुद थपथपाने लगी और वर्तमान विपक्ष घटना के समय सत्ताधारी गठबंधन में सरकार चला रहा था और राजनैतिक बयानबाजियों तक रह गया, और उस समय का विपक्ष सत्ता में मस्त है।

कोशी की इस राष्ट्रीय आपदा के लिए केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच चले तकरार के कारण केन्द्र सरकार ने पुनर्वास के लिए कोई राशि नही दी। जिसके बाद राज्य सरकार ने विश्व बैंक से कर्ज लिया। इस कार्य के लिए सरकार ने बिहार आपदा पुर्नवास एवं पुनर्निर्माण सोसाईटी नाम से एक अलग संस्था बनायी, जिसका अध्यक्ष सरकार के विकास आयुक्त बनाए गए। इसकी कार्यकारिणी में 12 विभागों के प्रधान सचिव, 3 प्रवंध निदेशक व 1 निदेशक कृषि, सदस्य है। एक वरिष्ठ अधिकारी को परियोजना निदेशक बनाया गया। इस के अलावा अन्य संबंधित 5 विभागों के प्रधान सचिव, संबंधित प्रमण्डल के आयुक्त, सभी संबंधित जिलों के जिला पदाधिकारी, राज्य सरकार द्वारा नामित सिंचाई विशेषज्ञ, इंिजनियरिंग कालेज के विशेषज्ञ, राज्य आपदा प्राधिकरण का सदस्य सचिव, स्वयं सेवी संस्थाओं के दो प्रतिनिधि इसमें रखे गए है। जिला व प्रखण्ड स्तर पर परियोजना प्रवंधन ईकाईयां हैं।

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योजना एवं विकास विभाग ने पुनर्वास की नीति निरूपित करते हुए पुर्नवास एवं पुनर्निर्माण की व्यापक योजना बनायी। उस योजना के अनुसार पुर्नवास के घरों को 31 जनवरी 2010 से शुरू कर छः-छः माह के चार चरणों में 31 दिसम्बर 2011 तक पुरा करने का समय रखा। कोशी आपदा आकलन रिपोर्ट के अनुसार सरकार उन ध्वस्त हुए 2,36632 घरों में से 1,57428 घर बनानें की योजना बनी। विश्व बैंक को प्रेषित अपने ऋण परिपत्र में सरकार ने उसे भी घटाते हुए मात्र एक लाख लोगों के घरों को बनाने की योजना बनायी। जबकि उसी परिपत्र में इस त्रासदी में क्षतिग्रस्त मकानों की संख्या 3,30000 बताई गयी है।

विश्व बैंक ने 220 मिलियन अमेरीकी डालर का कर्ज स्वीकृत करते हुए परियोजना को 15 सितम्बर 2010 से शुरू कर 14 सितम्बर 2014 तक पुरा करने का लक्ष्य रखा। इसके तहत एक लाख लोगों के घर बनना था। साथ ही 290 किमी ग्रामीण सड़के 90 पुल पुलिया, 8 किमी कोशी नहर का तटबन्ध व 50,000 गरीब परिवारों को आजीवीका संबर्धन कार्यक्रमों से जोड़ने का कार्य था। पुनर्वास की धीमी गति को देखते हुए विष्व बैंक ने इस परियोजना की अबधि सितम्बर 2016 तक विस्तारित करते हुए निर्मित होने वाले मकानों के लक्ष्य को एक लाख से घटा कर 66,203 घर कर दिया। लेकिन अब तक कुल 31,000 घरों ही निर्मित होने की सूचना मिल रही हैं। इस बीच कोशी आपदा पुनर्वास एवं पुननिर्माण के लिए विश्व बैंक से दोबारा कर्ज लिया गया है। यह कर्ज 250 मिलियन डालर का है।

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