सबके बेटवा कलक्टर बनी, ओसे माधोपट्टी के का…

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आलोक रंजन

हमरो बबुआ कलक्टर बनी..ये सपना भारत विशेष रूप से उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, और झारखंड के अनेक घरों के लिए सामान्य सी बात है। यदि सपना पूरा हुआ तो पूरे गांव में खुशी की लहर,उज्जवल भविष्य के सपने। लेकिन उस गांव का क्या जहां घर-घर अधिकारी हैं। जी हाँ, आपने अब तक जितने कैडेट सुने होंगे उनमें एक और जोड़ लीजिये, ये है माधोपट्टी कैडेट , ये कोई राज्य नहीं बल्कि एक उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का एक गाँव है जिसमें सिर्फ अफसर जन्म लेते हैं, और इस गाँव का नाम है माधोपट्टी अर्थात माधवपट्टी । माधोपट्टी एक ऐसा गांव है जहां से देश को कई आईएएस और ऑफिसर मिलते हैं। कहने को इस गांव में केवल 75 घर हैं, लेकिन सिर्फ वर्तमान की बात की जाए तो यहां के 47 आईएएस अधिकारी विभिन्‍न विभागों में सेवा दे रहे हैं, यदि PCS और आईपीएस की बात की जाए तो ये लिस्ट न जाने कहाँ पहुंचे । इस गाँव का योगदान सिर्फ यहीं खत्म नहीं होता , माधोपट्टी की धरती पर जन्मे सपूत इसरो, भाभा, काई मनीला और विश्‍व बैंक तक में अधिकारी बनते हैं। यह गाँव सिरकोनी विकास खण्ड का एक छोटा सा हिस्सा है ; मगर देश के प्रशासनिक खंड में यह गाँव एक बड़ा हिस्सा कवर करता है। इस गांव के अजनमेय सिंह विश्‍व बैंक मनीला में, डॉक्‍टर निरू सिंह, लालेन्द्र प्रताप सिंह वैज्ञानिक के रूप भाभा इंस्टीट्यूट तो ज्ञानू मिश्रा इसरो में सेवाएं दे रहे हैं। यहीं के रहने वाले देवनाथ सिंह गुजरात में सूचना निदेशक के पद पर तैनात हैं.

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कहाँ से शुरू हुई ये होड़ :

कहते हैं 1952 में इस गाँव के इन्दू प्रकाश सिंह का आईएएस परीक्षा में दूसरी रैंक के साथ सलेक्शन क्या हुआ मानो यहां के युवाओं में अधिकारी बनने की होड़ लग गई । क्या लड़के क्या लडकियां , ये गाँव बस अधिकारी निकालता ही चला गया ।

आईएएस बनने के बाद इन्दू प्रकाश सिंह फ्रांस सहित कई देशों में भारत के राजदूत रहे। सिंह के बाद इस गांव के चार सगे भाइयों ने आईएएस बनकर एक इतिहास रच दिया जो भारत में अब तक अविजित कीर्तिमान है। इन चारों सगे भाइयों में सबसे बड़े भाई विनय कुमार का चयन 1955 में आईएएस की परीक्षा में 13वीं रैंक के साथ हुआ । विनय सिंह बिहार के मुख्यसचिव पद तक पहुंचे ।

सन् 1964 में उनके दो सगे भाई क्षत्रपाल सिंह और अजय कुमार सिंह एक साथ आईएएस अधिकारी बने। क्षत्रपाल सिंह तमिलनाड् के प्रमुख सचिव रहे। वहीं चौथे भाई शशिकांत सिंह 1968 बीच के आईएएस अधिकारी बने। सिर्फ बेटे ही नहीं इस गाँव की बेटियां गरिमा सिंह आईपीएस और सोनल सिंह का चयन आइआरस में हुआ। इसके अलावा इस गांव की आशा सिंह 1980, उषा सिंह 1982, कुवंर चद्रमौल सिंह 1983 और उनकी पत्नी इन्दू सिंह 1983, अमिताभ बेटे इन्दू प्रकाश सिंह 1994 आईपीएएस उनकी पत्नी सरिता सिंह 1994 में चयनित होकर इस श्रृंखला को आगे बढ़ाया ।

इसी गाँव के श्री प्रकाश सिंह ,वर्तमान में उ.प्र.के नगर विकास सचिव हैं । 2002 में शशिकांत के बेटे यशस्वी न केवल आईएएस बने बल्‍कि इस प्रतिष्ठित परीक्षा में 31वीं रैंक हासिल की।

अगर आईएएस आईपीएस से थोड़ा पीछे आएं और बात करें पीसीएस सेवा की तो पीसीएस अधिकारियों की यहां एक लम्बी फौज है। इस गांव के राममूर्ति सिंह ,विद्याप्रकाश सिंह , प्रेमचंद्र सिंह , महेन्द्र प्रताप सिंह ,जय सिंह ,प्रवीण सिंह व उनकी पत्नी पारूल सिंह ,रीतू सिंह पचास अधिकारी हैं इनके अलावा अशोक कुमार प्रजापति, प्रकाश सिंह ,राजीव सिंह ,संजीव सिंह ,आनंद सिंह ,विशाल सिंह व उनके भाई विकास सिंह ,वेदप्रकाश सिंह ,नीरज सिंह भी पीसीएस अधिकारी बने चुके हैं। अभी हाल ही 2013 के आए परीक्षा परिणाम इस गांव की बहू शिवानी सिंह ने पीसीएस परीक्षा पास करके इस परम्परा को जीवित रखा है ।

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लेकिन इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। बबुआ अधिकारी बने और गाँव को भूला दे, तो गाँव की पीड़ा की बस कल्पना ही की जा सकती । गाँव विकास, गाँव की समृधी के सपने और उसके खोखलेपन को सिर्फ मह्सूस ही किया जा सकता है। 75 घर और 47 आईएएस एवं अनगिनत अधिकारी पैदा करने वाला माधोपट्टी जब शोचालय जैसे बुनियादी सुविधा से वंचित हो तो अधिकारी बनने वाले बबुआ और बबुनी को मिले इस सफलता पर फक्र करने के साथ ही उनकी एकाकी सोच पर आंसू बहाने के सिवा और क्या कर सकता है। माधोपट्टी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जी अधिकारिओं का देश के नीति निर्माण में अहम योगदान होता है, वही अधिकारी यदि गाँव की किस्मत न बदल पायें, तो गाँव शर्मिंदा होने के सिवा और क्या कर सकता है? जौनपुर जिले गददीपुर ग्राम पंचायत के माधोपट्टी न तो प्राथमिक स्वास्थय केंद्र है, और न ही पंचायत भवन। और तो और गाँव की करीब एक हजार से ज्यादा महिलाओं को शौच के लिए अज भी घर से बाहर जाना पड़ता है। स्वास्थय सुविधा का आलम यह है की अमेरिका में बसी गाँव की बहू साल में एक बार आतीं हैं तो हेल्थ कैंप लगता है। संपन्न लोगों के पास गाड़ी तो है लेकिन गरीब को अस्पताल पहुँचाने के लिए मोटर साइकिल और ठेला ही उपलब्ध है एम्बुलेंस नहीं?

अखिलेश सरकार ने ली सुध

मीडिया में गाँव की खबर छपने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार को माधोपट्टी की याद आई। जो काम गाँव के अधिकारी बबुआ- बबुनिया नहीं कर पाए अब वो  सरकार ने करने का फैश्ला लिया है। गाँव को मुख्यमत्री अखिलेश यादव ने जनेश्वर मिश्र ग्राम घोषित किया है। इसके तहत गाँव को कुछ प्रमुख सुविधाएँ मिलेंगी। ये सुविधाएँ हैं…पंचायत भवन, स्वस्थ्य केंद्र, नयी सीसी रोड, पुराणी सड़कों को ठीक करना, गाँव का विदुत्तिकरण, जल निकासी के लिए नाली और दो इंडिया मार्का हैण्ड पंप शामिल है।

(स्टोरी इनपुट: नवभारत टाईम्स और दैनिक भाष्कर से साभार)

 

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