‘संवाद’ के बहाने ‘ग्राम लालपुर’ की कहानी, मित्रों की जुबानी

संतोष कुमार सिंह
सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता घनश्याम के जन्म दिन मनाने के बहाने उनके कार्यस्थली झारखंड के मधुपुर के लालपुर गांव में एकत्रित हुए उनके कॉलेज व आंदोलन के दिनों के मित्रों ने इस गांव के विकास के संबंध में जो लिखा है उसे जस का तस प्रस्तुत करते हुए जो तस्वीर बनती है, उससे भारत के गांव की वर्तमान दशा व दिशा व अलग—अलग स्तर पर किये जा रहे सरकारी,गैर सरकारी व सामदायिक स्तर पर किये जा कार्यों से जमीनी स्तर पर हो रहे बदलाव को आसानी से समझा जा सकता है। तो लिए चलते हैं अपने पाठकों को मधुपुर के लालपुर गांव के उस जलसे में जिसे आभासी दुनिया ने हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है और समझते हैं घनश्याम के साथियों के लेखनी के जरिए उस गांव की कहानी को।

पेशे से शिक्षक और साहित्यकार,कहानीकार रविशंकर सिंह लिखते हैं कि  ‘संवाद’ संस्था के द्वारा मधुपुर प्रखंड के लालपुर गांव में भूमि क्षरण को रोकने के लिए , जल संरक्षण के लिए, पारंपरिक बीज के संरक्षण के लिए सराहनीय प्रयास किए जा रहे हैं। आई. एफ. सी. आई. के सहयोग से चार लाख की लागत में यहां एक तालाब खुदवाया गया है जिसकी गहराई 16 फीट है। इस तालाब की खुदाई में ग्रामीणों ने भी श्रम करके 40 हजार रुपए का सहयोग दिया है। इस तालाब के आसपास ऐसे और आठ नौ तालाब खोदबाय गए हैं। मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए नहर नुमा लंबे लंबे गड्ढे बनाए गए हैं। पहले ढलानों पर पानी के बहाव के साथ साथ मिट्टी भी बह जाया करती थी । अब इन धारीदार गड्ढों के कारण मिट्टी का क्षरण बहुत हद तक रुक गया है । मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए यहां फलदार पेड़ लगवाए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ यह मिला है कि यहां का जल स्तर काफी ऊंचा है । इस इलाके के कुएं में भले ही सूख जाते हैं, लेकिन यहां के कुएं गर्मियों में भी नहीं सूखते हैं ।
पारंपरिक बीजों के भंडारण के लिए एक विशाल भंडार गृह बनाया गया है । बीजों के परीक्षण एवं विकास के लिए सीड बेड बनाए जा रहे हैं। स्थानीय किसानों को यहां से एक किलो बीज के एवज में डेढ़ किलो बीज वापस करने की शर्त पर बीज दिया जाएगा। बीजों में खेरी, सावां, कोदो, मक्का, धान आदि बीजों की प्रमुखता होगी। यहां की मिट्टी इन फसलों के लिए उपयुक्त है। इन फसलों के पैदावार से यहाँ के किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा । फिलहाल यहां एक सौ बाइस किस्म के धान के बीज एकत्र किए गए हैं। इन बीजों के संरक्षण के लिए देसी तरीके अपनाए जा रहे हैं। जैसे, नीम, धतूरा , निर्गुंडी आदि के पौधे की पत्तियों को उपयोग में लाया जा रहा है। इन बीजों की खासियत होगी कि इन बीजों को पुनः उपयोग में लाया जा सकेगा। इससे किसानों को खेती में कम लागत लगेगी और उन्हें अधिक मुनाफा होगा।
सिंचाई के लिए भी यहां अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्था की गई है। जल स्रोतों के जल को संरक्षित करने के लिए गहरा कुआं खोदा गया है । उस कुएं में कई नदियों के जल को जमा किया जाता है । उस जल को लिफ्ट के द्वारा ऊंचाई पर पहुंचा कर खेतों की सिंचाई की जाती है। फलस्वरूप इस अंचल में जहां पहले साल में केवल एक फसल धान की हुआ करती थी वहां अब गेहूं की भी खेती होने लगी है।


संवाद के प्रमुख कार्यकर्ता घनश्याम ने बताया के इस अंचल में जहां पहले साल में 70- 75 लोग रोजी रोजगार के लिए शहरों की ओर रुख किया करते थे वहां अब उनके पलायन की संख्या बहुत कम हो गई है। यहां लोग अपनी खेती पर निर्भर हैं। वे अपने गांव में कार्य करने की दिशा में उन्मुख हुए हैं ।अब वर्ष में दो चार लोग शौकिया बाहर जाते हैं।
वहीं बंगाल के विद्यासागर कॉलेज आफ वूमेन में हिंदी के प्रोफेसर, साहित्यकार व आलोचक डॉ आशुतोष लिखते हैं मधुपुर जब भी गया ,वहाँ से नये उड़ान की शक्ति और हौसला लेकर आया। इसबार की नाहक यात्रा से हम सभी साथी तरोताजा हो गये। कुछ बातें भी हुईं। शिक्षा और विद्यालय निर्माण करने की दिशा में ।डाॅ राधाकृष्ण सहाय समग्र प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया ।सबसे बड़ी बात निकट भविष्य में फिर से मिलने की तारीख ठीक कर ली गई ।


‘संवाद ‘ ने मधुपुर के निकट लालपुर गाँव में ग्रामीण लोगों के साथ मिलकर जल-संरक्षण और भू-क्षरण को रोकने के लिए कुछ ठोस और सार्थक पहल की है ।परंपरागत बीजों के संरक्षण के लिए भी संवाद ने प्रशंसनीय काम किया है । साथी घनश्याम इसकी मूल धूरी में रहकर अपनी और अपने साथियों की कल्पनाशीलता के साथ अथक परिश्रम कर रहे हैं।

भागलपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर डॉ योगेंद्र इस यात्रा का वर्णन इन शब्दों में पिरोते हुये इस जुटान से निकले निहितार्थ और आगे की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि दो दिनों तक मधुपुर में रहा। तरह—तरह की चर्चाओं के बीच तय हुआ कि भारतीय शिक्षा संस्थान की नींव रखी जाय और भारतीय शिक्षा सदन जैसी शैक्षणिक संस्था खोली जाय। देश के विभिन्न इलाकों में साथियों ने 23 स्कूल खोल रखे हैं। उनसे संवाद चलाया जाय।भारतीयता की अवधारणा आधारित स्कूल में देह और आत्मा की जरूरतों को केंद्र में रखा जाय।मौजूदा शिक्षा बौद्धिक जरूरतों को केंद्र में रखती है।इससे गुजर कर एक ऐसी पीढी तैयार होती रही है जो अपने गांव घर से कट जाती है।गांव से शहर, शहर से महानगर, महानगर से विदेश की यात्रा में वह खो जाती है।जो इस यात्रा में फिट नहीं बैठते, वे हताश, निराश,उदास होते हैं।यहां तक कि वे जीवन से नाराज होकर आत्महत्या तक कर रहे हैं। जिन छात्रों का कैरियर बहुत अच्छा होता है, अच्छी नौकरी होती है, वे भी अच्छा नहीं महसूसते।परिवार टूट रहा है। गांव बिखर रहा है।शहर की गलियों में कम शोर नहीं है।ऐसी दशा में धरती से जोङे रखने वाली, भारतीय दिमाग वाली और जीवन को सार्थक करनेवाली शिक्षा चाहिए। डॉ योगेंद्र ने यह भी लिखा है कि इस संदर्भ में अगली बैठक गांधी आश्रम, शोभानपुर में 4-5 अक्टूबर को होगी। उन्होंने आग्रह किया है कि साथीगण अपनी राय भी दे सकते हैं और अभियान में जुड़ भी सकते हैं।


लेखक,प्रकाशक किशन कालजयी ने लिखा है कि 1974 के आन्दोलन के प्रसिद्ध कार्यकर्ता, जनसत्ता के पूर्व पत्रकार,लेखक और प्रखर बुद्धिजीवी तथा हम सब के आत्मीय मित्र घनश्याम ने अपने जीवन के 65 वर्ष आज पूरे कर लिये। पिछले 30 वर्षों से उनकी बहुआयामी सक्रियता ने समाज को जितना समृद्ध किया है,वह अपने आप में एक उदाहरण है।अगले तीस वर्षों तक इसीतरह उनकी सक्रियता कायम रहे और वे दोस्तों पर प्यार लुटाते रहें,यही दुआ करता हूँ।
प्रेम प्रभाकर मधुपुर को याद करते हुए लिखते हैं कि मधुपुर मेरी सृजनशीलता की भूमि रही है। इसने दुलराया है, हँसाया है, काम करना सिखाया है और रुलाया भी है। यह मेरे सखा की तरह है। सुधाकर भैया, कान्ता भाभी, हेमंत जी, अरविंद भैया व भाभी जी, रामशरण जी, घनश्याम जी, विनोद, रविशंकर सिंह, आशुतोष, योगेंद्र, किशन कालजयी, रजनी जी, कुमकुम जी, गुड़िया और उर्वशी जी के साथ ‘ नाहक मिलन’ का आनंद और संग-साथ होना एक उपलब्धि है। साथी गुंशी सोरेन, भवानी भाई, श्री किसुन जी, ललिता जी, बाबूलाल जी, उत्तम पीयूष, धनंजय प्रसाद, चौरसिया जी आदि साथियों से न मिल पाने का मलाल रहा।

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