जापानी इंसेफलाईटिस

0
438

“नाम बबुआ… काम नादानीं …स्थिति गरीबी में जिंदगानी..ऐसे में हम सूअर नहीं पाले तो क्या करें बबुआ के माई ई बात खुलेआम कहती है। बबुआ को टीका तो लगवा दिया है लेकिन ई सूअर को कहां भगायें..आहार में भी शामिल है और जीविको पार्जन और जरूरत परने पर नगदी का जरीया भी। जापानी इंसेफलाईटिस का नाम तो नहीं सुने हैं लेकिन सुनियो के कर क्या सकते हैं। झोपड़ी, सूअर का खोभार और चापाकल सब एके जगह है. बबुअवा कभी चापाकल पर जाता है, तो कभी खोभार में लेेकिन सरकार तो कह रही है कि मच्छरों से बच्चों को बचाइये, जापानी इंसेफलाइटिस का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। मिशन रूपी इंद्रधनुषी टीकाकरण में ई टीका भी शामिल है। अब हर इलाके से मरीज आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि तुरंत जांच और इलाज शुरू हो जाने से अधिकांश पीडित बच्चों को बचाने में कामयाबी मिल रही है। क्या हैं लक्षण.बहुत तेज बुखार दवा से भी नहीं ठीक होता बुखार शरीर में दर्द, अकड़न मिरगी जैसे दौरे बेहोशी मुंह से झाग निकलना बचाव..वैक्सीन उपलब्ध है। पर यह बाजार में नहीं मिलता है। जिस इलाके में बीमारी फैलती है वहां सरकार वैक्सीन मुहैया कराती है। क्यूलेक्स मच्छरों के काटने से यह बीमारी लगती है। मच्छरों से पूरा बचाव करें। घर में कहीं पानी जमा नहीं होने दे। सफाई पर विशेष ध्यान दें। सरकार कहती है कि मच्छरदानी और रिप्लेंट का इस्तेमाल करे। लेकिन बबुअवा और उसकी माई और आसपास के लोग ई स्थिति से अनजान है। तभी तो गया जिले के एक गांव की इस तस्वीर में बबुअवा खुलेआम दावत दे रहा है बीमारी को। ई उसकी मजबूरी भी है और सामाजिक संरचना की हकीकत भी।

[ फोटो @Shome bashu ]”

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here