
नई दिल्ली: भारत के पारिस्थितिकी-संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण का संकट दिन-प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, इस नाजुक पर्वतीय क्षेत्र में उत्पन्न प्लास्टिक कचरे का 80 प्रतिशत हिस्सा सिंगल-यूज खाद्य और पेय पदार्थों की पैकेजिंग से आ रहा है।
सिक्किम, दार्जिलिंग और लद्दाख जैसे पहाड़ी इलाकों में कचरे की भारी मात्रा को देखते हुए, टीएचसी की रिपोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि कंपनियों की ओर से रीसाइक्लिंग का प्रचार केवल एक भ्रम है क्योंकि अधिकांश प्लास्टिक कचरे को रीसाइकल नहीं किया जा सकता।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्लास्टिक कचरे में से लगभग 70 प्रतिशत सामग्री ऐसी है जिसे न तो रीसाइकल किया जा सकता है और न ही जिसका कोई बाजार मूल्य है। ऐसे कचरे का प्रभाव न केवल पर्यावरण पर पड़ता है, बल्कि यह स्थानीय जल स्रोतों, वन्यजीवों और मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन चुका है।
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दिल्ली क्षेत्र में प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर समस्या है, जो शहर की आबादी और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा है। प्लास्टिक कचरे का अत्यधिक उपयोग, अपर्याप्त कचरा प्रबंधन प्रणाली, और खुले में प्लास्टिक जलाने की समस्या के कारण, दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक, कुल प्लास्टिक कचरे में से केवल 18.5 प्रतिशत हिस्सा PET (पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट) जैसे रीसाइकल योग्य प्लास्टिक का है, जिससे स्थायी समाधान और पुनर्चक्रण की संभावनाएं सीमित हो जाती हैं।
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पर्यावरणविदों ने जताई चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि इस दिशा में शीघ्र और ठोस कदम नहीं उठाए गए। तो हिमालय क्षेत्र में पारिस्थितिक असंतुलन और प्राकृतिक आपदाओं की आशंका और अधिक बढ़ जाएगी।
जरूरत है नीति और जनजागरूकता की
विशेषज्ञों ने सरकार और स्थानीय निकायों से आग्रह किया है कि वे सिंगल-यूज प्लास्टिक पर सख्ती से प्रतिबंध लागू करें, साथ ही टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा दें। इसके अलावा, स्थानीय समुदायों और पर्यटकों को जागरूक कर प्लास्टिक उपयोग में कमी लाने की जरूरत पर भी बल दिया गया है।


