रीगा चीनी मिल और चीनी उद्योग को बचाने का इंतजाम करे सरकार

अमरनाथ झा
पटना:बिहार में नई सरकार आने के बाद और उद्योगमंत्री के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे शाहनवाज हुसैन के पदभार संभालने के बाद नए-नए उद्योग लगाने की घोषणाएं लगातार की जा रही है, पर मौजूदा उद्योग को बचाने का कोई प्रयास नहीं दिख रहा। इस उलटबासी का ताजा शिकार चीनी उद्योग है। इस साल दो चीनी मिलें – रीगा(सीतामढी) और सासामुसा (गोपालगंज) बंद हो गई। इन पर निर्भर लगभग साठ हजार गन्ना किसान बेहाल हैं। उनके करोड़ों रुपए इन मिलों पर बकाया है। अब विभागीय मंत्री प्रमोद कुमार ने अफसरों से विचार-विमर्श कर तजबीज निकाली है कि मिलों की परिसंपत्ति बेचकर किसानों के बकाया का भुगतान कर दिया जाए। यह तो न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी वाली स्थिति है। जब मिल रहेंगी ही नहीं, तो गन्ना किसानों के बकाए का भुगतान नहीं होने का मामला ही नहीं उठेगा। लेकिन उन किसानों की आजीविका कैसे चलेगी, इसके बारे में कौन सोचेगा? क्या सरकार को इससे निर्लिप्त रहना चाहिए?

चीनी उद्योग लंबे समय से संकटग्रस्त है। गन्ना अधिनियम में गन्ना किसानों को गन्ने के मूल्य का भुगतान 14 दिन में करने का प्रावधान है, पर इस प्रावधान का पालन कभी नहीं हुआ। फिरभी दो-चार महीने में भुगतान हो जाने की उम्मीद में किसान अपना गन्ना मिलों के हाथों बेचते रहे हैं। पर सरकारी नीतियों के अनुकूल नहीं होने से यह उद्योग संकट में फंसा है। इस साल दो चीनी मिलें बंद हो गई हैं। आजादी के समय बिहार में 29 चीनी मिलें थी, अब केवल दस मिले चल रही हैं।
बिहार प्रदेश ईंख कास्तकार संघ के महासचिव नागेंद्र प्रसाद सिंह ने गन्ना उद्योग विभाग द्वारा रीगा और सासामुसा चीनी मिल को बेचकर बकाया ईंख मूल्य का भुगतान करने जैसे बेतुका निर्णय का विरोध किया है और मुख्यमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। मुख्यमंत्री को भेजें ईमेल संदेश में श्री सिंह ने कहा है कि अखबारों में छपी खबर के मुताबिक विभागीय मंत्री प्रमोद कुमार की अध्यक्षता में अधिकारियों की बैठक में सासामुसा और रीगा चीनी मिल की संपत्ति का मूल्यांकन कर उन्हें नीलाम करने के लिए आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया जिससे किसानों के बकाया ईंख मूल्य का भुगतान किया जा सके।
श्री सिंह ने लिखा है कि यह निर्णय राज्य के इन दोनों चीनी मिल से जुड़े 50-60 हजार किसानों के हितों पर सीधा कुठाराघात है। मिल को नीलाम कर उससे बकाया गन्ना-मूल्य का भुगतान करने की बात किसानों को गफलत में रखने वाला है क्योंकि नीलामी की प्रक्रिया इतनी जल्दी नहीं पूरी नहीं होती। इन मिलों के मालिकान सुप्रीम कोर्ट तक जाकर अपनी परिसंपत्ति बचाने का प्रयास करेंगे। विभागीय मंत्री अगर यह जानकारी देते कि गन्ना अधिनियम में प्रावधान होने के बावजूद सासामुसा, रीगा सहित बिहार का कोई चीनी मिल 14 दिनों के अंदर किसानों का भुगतान नहीं करता है तो विभाग कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं कर पाता?

बिहार सरकार एक तरफ निवेशकों को आमंत्रित कर रही है, उन्हें जमीन और दूसरी सुविधाए देने की बात हो रही है। अभी ईथेनौल का उत्पादन करने के लिए नए निवेश प्रस्ताव आने की घोषणा राज्य के उद्योग मंत्री कर रहे हैं, लेकिन जिन चीनी मिलों में चीनी के सह-उत्पाद मोलासेज से ईथेनौल के उत्पादन की विधि सबसे प्रचलित है, उन्हें बंद होने से बचाने का प्रयास नहीं किया जाना आश्चर्यजनक है। एक समय बंद पड़े चीनी मिल के क्षेत्र में खांडसारी उद्योग लगाने की चर्चा भी हुई, पर धरातल पर कुछ नहीं हुआ। रीगा चीनी मिल को ईथेनौल उत्पादन की अनुमति और सुविधा देकर भी बंद होने से बचाने का उपाय किया जा सकता है।
गन्ना किसानों की ओर से सिंह ने मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि सासामुसा तथा रीगा चीनी मिल क्षेत्र के हजारों किसानों और सैकड़ों मिल मजदूरों के हित में दोनों मिलों को जिंदा रखने के लिए समुचित कार्रवाई की जाए। अगर सभी प्रयास विफल हो जाते हैं, तो राज्य सरकार इन मिलों को स्वयं या फिर राज्य या केंद्र सरकार के किसी उपक्रम के हवाले कर दे, जैसा लौरिया और सुगौली चीनी मिल के साथ हुआ है और इन मिलों को चलाने की व्यवस्था करे। उन दोनों चीनी मिलों को एचपीसीएल नामक केन्द्र सरकार का उपक्रम चला रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ता रणजीव कुमार कहते हैं कि बिहार में नदियों की बाढ़ से सिंचित जमीन में गन्ने की खेती टिकाऊ व लाभदायक रही है। इसीलिए यहां चीनी, गुड़, खंडसारी उद्योगों का विकास हुआ था। देश की आजादी के बाद यहां 29 चीनी मील थी। देश की कुल चीनी उत्पादन में बिहार की चीनी मिलों के उत्पादन का कुल योगदान 25 प्रतिशत था। पर आजादी के बाद विकास-नीति व बिहार की उपेक्षा नीति ने राज्य की चीनी मिलों को मृत्यु के राह पर धकेल दिया और राष्ट्रीय उत्पादन में बिहारी चीनी मिलों का योगदान सिर्फ डेढ़ से ढ़ाई प्रतिशत रह गया है। बिहार में 19 चीनी मिलें एक-एक कर बंद होती गई हैं। कारण बुनियादी तौर पर यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के चीनी मिल मालिक और गन्ना किसान राजनीतिक रूप से मजबूत हैं और वहां की राज्य सरकारें अपने उद्योग को प्रोत्साहन देती हैं।

रीगा चीनी मिल के मालिक कलकत्ता के उद्योगपति ओ. पी. धानुका ने अचानक मिल की बन्दी की घोषणा कर दी, जिससे इलाके के किसानों व मिल मजदूरों में घोर निराशा है। अचानक मिल बन्दी के कारण खेतों में खड़ी करोड़ों की फसल बर्बादी के कगार पर चली गई। उस गन्ना को दूसरे मिलों में भेजने की व्यवस्था कुछ किसानों ने कर ली, पर छोटे किसानों और मजदूरों के सामने बेरोजगारी का संकट खड़ा है।

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