मिट्टी परीक्षण के बाद करें बुआई..लहलहायेगी फसल

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पंचायत खबर टोली

गाजीपुर: रबी की तैयारी जोरों पर है। किसान अपने खेतों को तैयार कर रहे हैं। बीज जुटाये जा रहे हैं। खाद और दवा की तलाश में हमारे किसान भाई बीच—बीच में बाजार का चक्कर भी लगा रहे हैं ताकि पुख्ते इंतजाम के साथ खेत में बीज डालें, ताकि फसल लहलहाये।

gahannnnnnnइस बीच पीजी कॉलेज गाजीपुर स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र, के मृदा वैज्ञानिक डॉ डी के सिंह ने केंद्र में किसान भाईयों को गेहूं की बुआई से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए ‘‘गेंहूॅ की फसल में एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन‘ विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया जिसमें जनपद के 21 किसानों ने भाग लिया। मृदा वैज्ञानिक डाॅ डी के सिंह ने कहा कि गेंहूॅ की बुवाई के लिए दोमट एवं बलुई दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। गेंहूॅ की फसल अच्छी लगे और उत्पादन बेहतर बेहतर हो इसके लिए किसानों को मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों के प्रयोग करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि गेंहूॅ की फसल की बुवाई के पूर्व 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज या 1 ग्राम कार्बेण्डाजीम के बीज शोधन उपरान्त उपयोग करने की सलाह भी दी। उन्होंने कहा कि यदि मिट्टी के अन्दर जीवांश की मात्रा का स्तर न्यून है तो ऐसी स्थिति में गेंहूॅ की फसल में 12 से 15 टन गोबर की सड़ी हुई खाद या नेडेप से तैयार कम्पोस्ट खाद का प्रयोग अवश्य करना चाहिए। जिन किसान भाईयों के पास यदि केंचुए की तैयार खाद हो तो 5 से 6 टन प्रति हेक्टेयर केंचुए की खाद प्रयोग करने की सलाह दी।

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जिन किसान भाईयों ने मिट्टी परीक्षण न कराये हों तो ऐसी स्थिति में 150 ग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फाॅस्फोरस, 60 किलोग्राम पोटाश, 30 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर प्रयोग करने सलाह दी। नाइट्रोजन की 1/3 या 1/2 हिस्सा बुवाई के समय एवं नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा गेंहूॅ की सिंचाई 21 से 25 दिन के बाद करने पर बची हुई यूरिया का प्रयोग करना चाहिए। फाॅस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बेसल अप्लीकेशन के रूप में बुवाई के समय प्रयोग करने की सलाह दी, क्योंकि फाॅस्फोरस एवं पोटाश दोनों ऐसे तत्व हैं जो मृदा के अन्दर अगतिशील अवस्था में पाये जाते हैं, यदि इसका प्रयोग किसान भाई छिटकवा विधि से करते हैं तो उस दशा में फाॅस्फोरस एवं पोटाश का प्रयोग पौधे बहुत कम मात्रा में उपयोग कर पाते हैं।

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डी के सिंह ने कहा कि गेंहूॅ की फसल में सल्फर का प्रयोग अवश्य करना चाहिए क्योंकि मिट्टी परीक्षण के आधार पर देखा गया है कि जनपद के विभिन्न ब्लाॅकों में सल्फर का स्तर न्यून एवं मध्यम पाया गया है। गेंहूॅ की बुवाई से पूर्व एजोटोवैक्टर कल्चर एवं पीएसबी कल्चर का प्रयोग मृदा के अन्दर किसान भाई बुवाई के पहले अपने खेतों में कर सकते हैं, जिससे फाॅस्फोरस एवं नाइट्रोजन की उपलब्धता मृदा के अन्दर इस कल्चर के प्रयोग करने से बढ़ जाती है। पी0एस0बी0 कल्चर का प्रयोग मृदा के अन्दर 5 से 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रयोग करने से मृदा के अन्दर अनुपलब्ध अवस्था में पड़ा हुआ फास्फोरस उपलब्ध अवस्था में परिवर्तित हो जाता है जिससे फास्फोरस की उपलब्धता 30 से 35 प्रतिशत केवल फास्फेटिका कल्चर के प्रयेाग से बढ़ जाती है, जिससे पौधों के जड़ों का विकास बहुत ही गति से होता है, जिससे पौधे अधिक से अधिक मात्रा में पोषक तत्व पौधे जमीन से प्राप्त कर सकते हैं। पौधों के अन्दर जड़ों के विकास होने से पौधे की वानस्पतिक वृद्धि बढ़ जाती है और उत्पादन में 10 से 20 प्रतिशत की वृद्धि होती है। किसान भाई अपने खेतों में पोटैशियम का प्रयोग अवश्य करें, क्योंकि पोटैशियम कमी के लक्षण न दिखने के बाद भी पोटैशियम की कमी से गेंहूॅ की फसल में 30 से 35 प्रतिशत तक उत्पादन कम हो जाता है। इस तत्व के प्रयोग करने से दाने चमकीले होते हैं एवं रोग एवं कीड़ों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता पैदा होती है।

प्रशिक्षण के पूर्व केन्द्र के वरिष्ट वैज्ञानिक एवं प्रमुख डाॅ दिनेश सिंह ने किसानों को मिट्टी परीक्षण की उपयोगिता पर बल देते हुए कहा कि समय रहते किसानों को मिट्टी का परीक्षण अवश्य करायें। इस संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकारी व किसान भाई केन्द्र के मृदा वैज्ञानिक से सम्पर्क कर सकते हैं।

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