नयी दिल्ली: बचपन का वो समय। सावन का महिना। गांवों में गूंजती सावन की मल्हार। शादी के बाद पहली बार मायके लौटी बेटी व आम के पेड़ पर लगाये गये झूले। बेटियां सखियों संग झूलते जातीं और कजरी या सावन के दौरान मन को भाने वाले अन्य गीत गाते जातीं। जिस नवविवाहिता के पति गांव छोड़ परदेश बसते थे उनकी याद में गूंजते विरह के गीत या आप ये भी कह सकते हैं कि इन्हीं गीतों और परंपराओं में लोक जीवंत होता था और अपने साथ लोकगीतों को भी जीवंत बनाता था।
सावन आज भी है। बिहार और उत्तर प्रदेश के इलाके में सावन का पूरा माह बड़े ही धूमधाम से और धार्मिक पंरपराओं और रीतियों का पालन करते हुए सादगी पूर्ण तरीके से मनाया जाता है। आज भी यह मास लोगों में उर्जा भरता है। बाग बगीचे सजीव हो उठते हैं। खेत खलियान की हरियाली आंख के रास्ते कलेजे को ठंडक पहुचाती है।
लेकिन समय के साथ थोड़ा बदलाव भी हुआ है। हालाकि आप कह सकते हैं कि परंपरायें कायम है लेकिन आधुनिकता का बोध लिये। सावन के महीने में आप अभी भी उत्तर भारत में लटके पेड़ों में झूले देख सकते हैं। मंदिरों में जन्माष्टमी पर सावन मास की एकादशी पर भगवान को झूला झुलाने की परंपरा आज भी देखने को मिलती है।
हिंदी फिल्मों में सावन
सावन के लोकगीत के साथ-साथ हिंदी फिल्म जगत ने सावन के गीतों को लोगों के दिलो में जिंदा रखने में अहम भूमिका निभाई है। हिंदी फिल्मों के कई सारे गाने सावन पर गाए गए हैं। पुराने गानों में तो लोक गीतों को हूबहू शामिल किया जाता था। जिसको सुनने के बाद हम उसी कल्पना लोक में पहुंच जाते हैं।
मसलन – “सावन का महीना पवन करे शोर” मुकेश कुमार का यह गाना आपको सीधे 1950 के दशक में ले जाता है। ऐसे ही “मेंरे नैना सावन भादो” जिसे मुकेश खन्ना पर फिल्माया गया था, लता मंगेशकर की आवाज में यह गाना बहुत ही लोकप्रिय हुआ था।
हिंदी फिल्मों के परिपक्वता के दौर में भी ऐसे बहुत सारे गाने सुनने को मिल जायेंगे जो सावन पर आधारित हैं। संभव है ऐसा इसलिए भी हो क्योंकि हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता उत्तर भारत में अधिक है और उसी भौगोलिक परिदृश्य में फिल्मों के कथानक रचे बुने जाते रहे हों।
लोकगीतों में सावन
उत्तर प्रदेश तथा बिहार का प्रसिद्ध लोकगीत है कजरी। ऐसा माना जाता है कि कजरी की उत्पति मिर्जापुर में हुई। यह लोकगीत वर्षा ऋतु (सावन) में गाया जाता है।
कजरी शब्द काजल से बना है, जो शायद नायिका के आंखों को समर्पित है।
कजरी मानसून का गीत है जो उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रमुखता से गाया जाता है। इस क्षेत्र में पद्म विभूषण चन्नूलाल मिश्रा, पद्म भूषण शारदा सिन्हा, देवी और अन्य अनेक लोगों ने नाम कमाया है। कजरी गीत में श्रृंगार सौंदर्य और प्रियतम प्रेयसी के मिलने और बिछड़ने जैसे प्रसंग शामिल किए जाते हैं। कजरी सुनकर लोग झूम उठते हैं
“कहे तोसे सजना ये तोहरी सजनिया पग पग लिए जाऊं तोहरी बलाईंया”
फिल्म “मैंने प्यार किया” का यह गीत शायद आपने सुना हो.
बिहार की लोकप्रिय लोक गायिका शारदा सिन्हा की आवाज में यह गीत गाया था। यह गीत की एक कजरी विधा है।
धूमधाम से मनाया जाता है कजरी का त्योहार
कजरी पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में नाग पंचमी के ठीक 12 दिन बाद मनाया जाने वाला एक त्योहार भी है। खरीफ की फसल अच्छी होने की कामना के लिए घर की बेटियां तालाब की मिट्टी के छोटे पिंड बनाकर उसमें जौ के दाने चुभा कर एक जगह रख देती हैं। ऐसा माना जाता है कि अगर उसकी उपज अच्छी होती है तो बारिश अच्छी होगी और फसल भी अच्छी होगी।
फिर कुछ दिन बाद इस पिंड को लेकर लड़कियां तालाब किनारे इकट्ठा होती हैं और वहां एक टोले की लड़कियों का दूसरे टोले की लड़कियों से गीतों की एक लंबी प्रतियोगिता होती है और जो पक्ष जीत जाता है उसे पहले तालाब में अपने पिंड विसर्जित करने का मौका मिलता है।
यह परंपरा उत्तर प्रदेश के जौनपुर, मिर्जापुर, प्रयागराज, बनारस तथा भदोही के कुछ स्थानों में मनाया जाने वाला त्योहार है।
प्राचीन काल से ही उत्तर प्रदेश का मिर्जापुर जनपद माँ विंध्यवासिनी के शक्तिपीठ के रूप में आस्था का केन्द्र रहा है। अधिसंख्य प्राचीन कजरियों में शक्तिस्वरूपा देवी का ही गुणगान मिलता है।
बदलता समय…बदलता सावन
हरेक वर्ष की भांति इस वर्ष भी सावन का महीना आ गया है। लेकिन अब सावन शुरू होने का एहसास शहर तो दूर गांव में भी नही होता है।
अब न वो विशाल पेड़ रहे ना वो झूले-पटोहे। वर्तमान पीढ़ी सावन की संजीदगी महसूस नहीं कर पाएगी। जहां कही आज बड़े पेड़ और बगीचे हैं भी वहां हर्ष और उल्लास के झूले की जगह वीडियो गेम ने लिया है और गांव सावन से दूर जाता दिख रहा है।
समय के साथ गांव की जमीन तो बची लेकिन उसका श्रृंगार धीरे-धीरे विलुप्त होता गया। आज की युवा पीढ़ी गांव में रहना पसंद नही करती। गांव की विरासत के प्रति युवाओं में जागरूकता का अभाव है। लड़कियों में लोकगीतों को लेकर कोई उत्साह नहीं बचा है। परंपरागत लोकगीत तीसरी पीढ़ी में अपनी अंतिम सांसे ले रहे हैं।
