कुशल कलाकार और कला गुरू के रूप में नाम कमाने वाली जयश्री नायर पाकिस्तान और अरब मुल्क के बच्चों को भी भारतीय शास्त्रीय संगीत सिखा चुकी हैं। 4 साल की उम्र से संगीत सीखने वालीं जयश्री के ऑनलाइन कोर्स में दुनिया भर के बच्चे संगीत सीखते हैं। छत्तीसगढ़ की जयश्री ने ‘रागी द गर्ल बैंड’ नाम से लड़कियों का एक बैंड बनाया है। वो यूरोप के दर्जन भर से ज्यादा देशों में परफॉर्म कर चुकी हैं। जयश्री ने आर्ट को लड़कियों की आजादी का माध्यम बनाया है। वो लड़कियों को संगीत की मुफ्त शिक्षा भी देती हैं। ये सब करने की प्रेरणा उन्हें अपनी मां से मिली, जो एक शेल्टर होम चलाती हैं।
मां लड़कियों के लिए इतना कुछ कर सकती हैं तो मैं क्यों नहीं
मेरा जन्म छत्तीसगढ़ के कोरबा में हुआ। पिताजी की मृत्यु काफी पहले हो गई थी। हम तीन बहनों की परवरिश मेरी मां ने अकेले ही की। मेरी मां रुक्मिणी नायर बिजनेस वुमन और सोशल वर्कर हैं। वो लड़कियों के लिए एक शेल्टर होम भी चलाती हैं। जब मैं छोटी थी तो शेल्टर होम में उस वक्त 70 के आसपास लड़कियां रहतीं।बचपन से मैंने अपनी मां को उन बच्चियों के लिए लड़ते देखा, उनके दुख को अपना दुख समझते और उनकी खुशियों में अपनी खुशियां ढूंढते देखा। शुरू में समझ नहीं आता था कि मां को इन सब से क्या मिलता है। लेकिन जब बड़ी हुई तो पता चला कि एक महिला का दर्द दूसरी महिला ही बेहतर समझ सकती है। और मेरी मां भी यही कर रही थीं।मां को देखकर मैंने सोचा कि वो लड़कियों के लिए दिन रात मेहनत करती हैं। मैं क्या करती हूं? फिर लगा कि नहीं, मुझे भी इनके लिए कुछ करना होगा। इसके बाद मैंने आर्ट को अपना हथियार बनाया और तब से लड़कियों के सपनों को पंख दे रही हूं।
लड़कियों को सिर्फ ब्यूटी ऑब्जेकेट समझा जाता, मैंने पूरा बैंड उन्हीं से बनाया
आर्ट और दूसरे फील्ड में भी लड़कियों की सिर्फ डेकोरेटिव वैल्यू होती है। लड़कों के ग्रुप में अलग ख़ूबसूरती के छींटे बिखेरने हों तो दो-एक लड़कियों को स्टेज पर खड़ा कर दिया जाता है। म्यूजिक में उनका कोई रोल नहीं होता। आप उन्हें स्टेज की चियर गर्ल्स कह सकते हैं। यह सब देखकर मैंने एक ऐसा बैंड बनाने का सोचा जिसमें सारी लड़कियां ही हों। जिसमें ड्रम और गिटार भी लड़कियां ही बजाएं और गाना भी गाएं। इसी सोच के साथ मैंने ‘रागी द गर्ल बैंड’ की शुरुआत की। मैंने काफी कोशिशों के बाद 8 लड़कियों की टीम बनाई। दरअसल, छत्तीसगढ़ में एक लोक कथा शैली है ‘पंडवानी’। इसमें पीछे से हुंकार भरने वाले कलाकार को ‘रागी’ कहते हैं। बैंड का यह नाम रखने के पीछे मेरी सोच थी कि यह बैंड लड़कियों की हुंकार के रूप में जाना जाए।
यूरोप और पूरे भारत में कर चुकी हूं परफॉर्म
मैं देश के अलग-अलग शहरों के अलावा यूरोपीय देशों में भी परफॉर्म कर चुकी हूं। मैंने जर्मनी, स्वीडन, बेल्जियम, नीदरलैंड जैसे देशों में अपनी प्रस्तुति दी है। यूरोप में जाकर अपनी भारतीय और छत्तीसगढ़ी संस्कृति को रिप्रजेंट करना शानदार अनुभव रहा। जब मैं विदेशों में भारतीय शास्त्रीय संगत और पंडवानी जैसी लोक कला की बात करती हूं तो मुझे अपने काम पर गर्व होता है। मैं शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोकगीतों के साथ नए गाने भी गाती हूं। मैंने पंडवानी को भी थोड़ा मॉडर्न टच दिया है, ताकि युवाओं को भी इससे जोड़ सकूं।
गरीब बच्चों को मुफ्त में देती हूं संगीत की शिक्षा
मैंने जयश्री म्यूजिक एकेडमी भी खोली है। यहां मैं छोटे बच्चे-बच्चियों को संगीत की शिक्षा देती हूं। मैंने खुद भी गुरुकुल में रहकर संगीत सीखा है। मेरी एकेडमी सभी के लिए खुली हुई है। अगर कोई गरीब घर का बच्चा मेरे पास सीखने आता है, तो मैं उसे मुफ्त में संगीत सिखाती हूं। मेरे लिए संगीत प्रोफेशन से बढ़कर साधना है। मेरी एकेडमी के बच्चे स्टेट और नेशनल लेवल पर कई बड़े शोज में हिस्सा ले चुके हैं। मेरे कई स्टूडेंट ने तो सोनू निगम जैसे बड़े कलाकार के सामने भी परफॉर्म किया है।
रात को इवेंट होता था तो लड़कियों के घर वाले चिंतित हो जाते
बैंड की परफॉर्मेस आम तौर पर रात को होती हैं, जो देर तक भी चलती हैं। ऐसे में लड़कियों के घरवालों का चिंता करना स्वाभाविक है। लेकिन मैं किसी तरह उन्हें समझाती हूं और बच्चियों की सुरक्षा का पूरा ख़याल रखती हूं। इसके अलावा कई ऐसे मौके भी आए जब किसी लड़की के घरवाले ने उसके खराब रिजल्ट का ठीकरा मेरे बैंड पर फोड़ा और कहा कि लड़की मुंहजोर हो रही है। वो शायद नहीं समझ पा रहे थे कि उनकी लड़की अपने आप को समझ पा रही है, उसका आत्मविश्वास बढ़ रहा है क्योंकि वह अपने सपनों को जी रही है।
लड़कियां ज्यादा ऊंची ना उड़ सकें, इसलिए कतरे जाते हैं पंख
कोरबा और रायपुर में मैंने देखा और समझा कि यहां थोड़ी-बहुत जागरूकता के बाद भी लड़कियों के लिए बहुत ज्यादा मौके नहीं हैं। शहर में लड़कियों को पढ़ाया तो जाता है, लेकिन इसके पीछे मकसद सिर्फ उनकी शादी के लिए अच्छा घर-परिवार ढूंढना ही होता है। लेकिन उनको सिर्फ इतनी पढ़ाई कराई जाती है, जिसमें ज्यादा जोखिम ना उठाना पड़े। मैं इस सोच को बदलने की कोशिश कर रही हूं। मैंने अपनी मां और गुरुओं से जो सीखा उसे यंग लड़कियों को सिखाने की कोशिश करती हूं। उनको बताती हूं कि उन्हें अपने सपनों के लिए पढ़ना, सीखना और आगे बढ़ना है। अगर मेरी वजह से कोई अपने सपनों को पूरा कर पाता है तो यह मेरे लिए दोहरी खुशी की बात है।
आदिवासी महिलाओं और छोटी बच्चियों संग बैंड बनाना चाहती हूं
मेरा सपना है कि मैं छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिलाओं और छोटी बच्चियों के साथ मिलकर भी एक बैंड बनाऊं। मैं बैंड परफॉर्मेंस को महिलाओं की आवाज के रूप में देखना चाहती हूं, जिसे देश-विदेश में ध्यान से सुना जाए।


