अमितेश सिंह, वरिष्ट पत्रकार
गाजीपुर: हमारा अन्नदाता हमेशा ही भगवान भरोसे होता है। कभी पानी के लिए तो कभी हवा के लिए। लेकिन जब हवा और पानी दोनो उसके दुश्मन हो जाएं तो वह किसे गुहराए। कुछ ऐसा ही हालात गाजीपुर समेत पूर्वांचल के बड़े हिस्से में किसानों का है। जब भगवान भाष्कर को अपनी रोशनी बिखेरनी चाहिए तो इंद्रदेव पानी बरसा रहे हैं और सनन..सनन हवा चल रही है। मौसम में आये इस अचानक बदलाव से हमारे किसान भाई सकते में हैं। पिछले सप्ताह अर्थात शनिवार से ही मौसम लगातार करवट बदल रहा है। रविवार को तेज हवाओं के साथ बूंदाबादी भी हुई। चक्रवाती तूफान ने सोमवार को कहर बरपा दिया। जहां बज्रपात में महिला समेत दो की मौत हो गई वहीं तेज हवा के साथ बारिश और ओला से दलहन-तेलहन की फसल चौपट हो गई। बज्रपात से मरने वालों में दुल्लहपुर थाने के मलेठी गांव की दुलारी देवी हैं। वह उस वक्त घास काट रही थीं। इधर बिरनो के कहोतरी के पास साइकिल सवार विजय राजभर(50) बज्रपात की चपेट में आए। वह नोनहरा थाने के मीरपुर गांव की रहने वाले थे। अपनी रिश्तेदारी भड़सर से घर लौट रहे थे।
पीजी कॉलेज की वेधशाला के प्रेक्षक मदन गोपाल दत्त ने बताया कि सुबह 0.8 और दोपहर में ओला के साथ 27.6 मिलीलीटर बारिश हुई। यह चक्रवाती बारिश थी। बारिश के कारण पारा भी लुढ़क गया है। एक बार फिर सिहरन बढ़ गई है। तापमान अधिकतम 25 तथा न्यूनतम 17 डिग्री पर आ गया है। जिला कृषि अधिकारी अशोक कुमार ने बताया कि बारिश और ओला से चना, मटर तथा मसूर की फसल पर असर पड़ा है। खेत के आलू पर भी इसका दुष्प्रभाव संभव है। फसल बीमा के सवाल पर जिला कृषि अधिकारी ने कहा कि इसकी स्थिति नहीं बनी है। इसके लिए कम से कम 35 फीसद फसल नष्ट होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं हुआ है।
बारिश व ओला लगातार दूसरे साल किसानों पर आपदा बनकर आयी है। गेहूं ही नहीं, दलहन-तिलहन की फसलों पर भी बेमौसम बारिश का बुरा असर पड़ा है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि लगभग 60 प्रतिशत तक फसलें चौपट हो चुकी हैं। लागत तो निकलने से रही, अब चिंता यह कि खेतों से भूसा लायक भी फसल खलिहान तक पहुंच पाएगी या नहीं। किसान सदमे में हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि अब पूरे साल का खर्चा कैसे चलेगा? क्या खाएंगे और क्या बचाएंगे, कैसे चलेगा जरूरी खर्च ?बेमौसम बारिश व ओले से गेहूं फसल जमींदोज हो गई हैं तो दलहनी-तिलहनी फसलों में माहो लगने एवं बीजों का सड़ना तय है। सबसे अधिक नुकसान गेहूं व सरसों को हुआ है। ओले पड़ने से बिखर चुकी बालियों को देख किसानों को इस बात की चिंता हैकि खाद-पानी की उधारी कैसे चुकता होगी?
भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ विज्ञानी डा. सुधाकर पाण्डेय का कहना है कि पिछैती खेती करने वाले किसानों की उत्पादकता खासा प्रभावित होगी। पौधे के टूटने से गेहूं के दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाएंगे। भगवान त कुल ले लिहलन…केवल खेती पर निर्भर किसानों के सामने टै्रक्टर, कृषि यंत्र, पंपिंगसेट, बीज, खाद एवं सिंचाई के लिए बैंकों व साहूकारों से लिए गए कर्ज को चुकता करने की चिंता मुंह बाये खड़ी हो गई है। चिरईगांव के बरियासनपुर गांव के किसान राजेन्द्र प्रसाद सब्जी की खेती करते हैं। ओला-बारिश ने खासा नुकसान पहुंचाया है। करीब डेढ़ बीघा भिंडी, नेनुआ व करैला की खेती की है। 15 दिनों में सब्जी तैयार होने वाली थी मगर बारिश ने रुला दिया। ओला पड़ने से सब्जियों में छेद हो गया है तो फूल झड़ गए। पड़ोसी सुरेश मौर्य से चिंता जाहिर की कि बीज सेखाद व मजदूरी तक 18 हजार रुपया लग गयल.. अब कईसे करजा चुकाइब?राजेन्द्र की तरह हजारों किसानों की स्थिति कुछ ऐसी ही है। आराजी लाइन के जक्खिनी गांव के किसान मंगला सिंह कहते हैं.. अब बचल का? भगवान त कुल ले लिहलन.. जरूरत रहल त पानी नहीं बरसल.. जब नाही जरूरत तब अईसन बरसलन की कुल खत्म होत देखात हौ।
चारे का खड़ा हुआ संकट
किसानों का कहना है कि फसलों के लोटने व टूटने के कारण दाना के साथ ही भूसा काभी संकट खड़ा हो जाएगा। क्योंकि जो फसलें बारिश से लोट गई हैं उनके सड़ने की आशंका है। फिर पशुओं के चारे का संकट खड़ा हो जाएगा। एक बीघा गेहूं की बुआई में लागत– 400 रुपए प्रति बीघा टै्रक्टर से कम से कम तीन बार जुताई- 1200 रुपए-डीएपी खाद- 1320 रुपए- 320 रुपए प्रति बोरी यूरिया खाद: कम से कम चार बार- लागत 1280 रुपए-डीजल पंप से प्रतिघंटा- 100 रुपए( एक बीघा में कम से कम 10 से 12 घंटे सिंचाई मंे लगता है इस लिहाज से तीन बार सिंचाई में 3600 रुपए देना पड़ता है)मजदूरी- बुआई, सिंचाई एवं कटाई तक- 5 हजार रुपए कुल लागत प्रति बीघा- 12 हजार रुपए उपज- अधिकतम 12 कुंतल प्रति बीघा । हालाँकि इस विपदा के बाद किसान भाई यही गुना भाग करने में जुटे हैं की आखिर प्रधान मंत्री जी कहे मुताबिक ५ वर्ष में आमदनी दुगुना कैसे होगा, अभी तो रोटी के लाले परते नजर आ रहा है ।



