देश के सात प्रमुख अभियान से जुड़े प्रतिनिधियों ने बजट को किसान और गरीब विरोधी बताया. हालांकि केंद्रीय वित्त मंत्री ने इसे भारत में बदलाव लाने वाला बजट बताया था.
नई दिल्ली: वित्त मंत्री अरूण जेटली ने अपने लंबे बजट भाषण देते हुए इस मद में इजाफा,उस मद में बढ़ोतरी, पांच साल में आमदनी दुगुना,आधार को संवैधानिक दर्जा, उच्च शिक्षा का विकास, कौशल पता नहीं क्या, क्या कहा? देश की जनता को लगा कि वित्त मंत्री जी सबका साथ, सबका विकास के अपने पार्टी के नारे को चरितार्थ कर रहे हैं,लेकिन जब अलग—अलग क्षेत्र में काम कर रहे विशेषज्ञ एकजुट होकर अपनी बात रख रहे हैं, तो उनका कहना है कि बजट में सामाजिक क्षेत्र के ज्यादातर उपादानों में या तो कटौती की गयी है या फिर मामूली बढ़ोतरी जो कि अपर्याप्त है। प्रेस क्लब में आयोजित एक परिचर्चा में राइट टू फूड, राइट टू एजुकेशन फोरम, पेंशन परिषद, एलायंस फॉर अर्ली चाइल्डहुड डेवलपमेंट, जन स्वास्थ्य अभियान, द पीपल्स एक्शन फॉर एम्पलायमेंट गारंटी और सफाई कर्मचारियों की भीम यात्रा जैसे प्रमुख अभियानों के कार्यकर्ताओं ने एक साथ एकत्रित होकर केंद्रीय बजट और उसके असर की व्याख्या करते हुए कहा है कि यह केंद्रीय वित्त मंत्री के दावे से बहुत दूर का बजट का है. बजट के बारे में वित्त मंत्री अरूण जेटली ने दावा किया है कि यह भारत को बदलने वाला बजट है और इससे किसानों, गरीबों और हाशिए के लोगों को फ़ायदा होगा. लेकिन इन कार्यकर्ताओं के मुताबिक बजट में इन लोगों की सबसे ज़्यादा उपेक्षा हुई है.
इस बैठक में संचालित करते हुए जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर प्रवीण कुमार झा ने कहा कि कई स्कीमों और योजनाओं का फ़ायदा बहुत लोगों को नहीं मिल रहा है, ऐसे में इस बजट की आलोचकीय विश्लेषण होना चाहिए. उन्होंने कहा, “ राष्ट्रीय फसल बीमा योजना को काफी ज़्यादा प्रचारित किया जा रहा है. लेकिन राष्ट्रीय सैंपल सर्वे से मालूम होता है कि धान एवं गेहूं की खेती करने वाले 95 फ़ीसदी किसान और कपास की खेती करने वाले 85 फ़ीसदी किसान सभी बीमा योजनाओं से बाहर हैं. ऐसे में इतने लोगों की समस्या कैसे दूर होगी. इन लोगों को योजना में शामिल करना भी काफी मुश्किल है.”
इन कार्यकर्ताओं ने बजट की आलोचना करने से पहले एकसमान स्वर से संसद में जिस तरह से आधार विधेयक को पारित किया गया, उसकी भी आलोचना की. राइट टू फूड अभियान की कविता श्रीवास्तव ने कहा, “धन विधेयक की आड़ में जिस तरह से सरकार ने आधार विधेयक को पारित किया है वह ना केवल निजता के संवैधानिक आधार का उल्लंघन है बल्कि राज्य सभा में भी इसे पास करने से आधार पर कई राज्यों के विचारों की उपेक्षा हुई है.”
इसे आगे बढ़ाते हुए निखिल डे ने कहा, “आधार से राशन की चोरी नहीं थम रही है, ना तो गोदाम से ही और ना ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों से ही, ना ही इससे भ्रष्टाचार पर रोक लग रहा है. उल्टे इससे अधिकारियों को ये ताक़त मिल जाएगी कि वे फ़ैसला करेंगे कि किसका बायोमैट्रिक्स मिल रहा और किसका नहीं. मशीनों पर अत्यधिक निर्भरता, जरूरतमंदों तक जरूरत पहुंचाने का प्रभावी माध्यम तो नहीं है.” निखिल डे ने आगे कहा कि राजस्थान में राशन दुकानों की अप्रभावी होने की दर 60 से 80 फ़ीसदी है, जबकि पेंशन के भुगतान में तो यह और भी भयावह साबित हुआ है क्योंकि आधार के तहत फिंगर प्रिंट्स जरूरी होते हैं जो बुजुर्गों के लिए ठीक से काम ही नहीं करता.
हर अभियान ने ये भी बताया कि सामाजिक क्षेत्र में बजट अनुदान में की गई कटौती का वास्तविक स्थितियों में बहुत गहरा असर पड़ेगा. अगर किसी योजना में अनुदान में कटौती होती और महंगाई दर को भी शामिल किया जाए तो संकट के बढ़ने का ख़तरा उत्पन्न हो जाता है. बुजुर्गावस्था पेंशन के सौ फ़ीसद मामलों में यह होगा. इसे स्पष्ट करते हुए पेंशन परिषद के मैथ्यू चेरियन ने कहा कि 2007-08 से ही बुजुर्गावस्था पेंशन 200 रूपये प्रतिमाह तय है. अगर बीते सालों की महंगाई दर को भी इसमें शामिल किया जाए तो इसे कम से कम प्रतिमाह 500 रुपये होना चाहिए. अगर प्रति व्यक्ति अनुदान 14 रूपया भी कम किया जाता है तो इसे 10 करोड़ सूचीबद्ध लोगों में बांटना हो तो पेंशन देने के लिए कोई संसाधन ही नहीं होगा.
सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक वेज़वादा विल्सन ने बजट के खोखलापन की ओर इशारा करते हुए कहा, “2013 में मैला ढोने वालों के पुनर्वास कार्यक्रमों के लिए पांच साल के दौरान 4656 करोड़ रूपये का वादा किया गया था, जबकि मौजूदा बजट में केवल 10 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया और कहा जा रहा है कि फंड का इस्तेमाल नहीं हो रहा है, तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है?” उन्होंने ये भी बताया कि डॉ. अंबेडकर की 150वीं जयंती के मौके पर देश भर की यात्रा पर निकले भीम यात्रा से सरकार रोड एंट्री टैक्स वसूल रही है. उन्होंने कहा, “आज तक हम लोग सरकार को 60 लाख रुपये दे चुके हैं.”
इन विसंगतियों का विस्तार से जिक्र करते हुए राइट टु फूड अभियान की कविता श्रीवास्तव ने कहा कि यह बजट किसानों के हित में नहीं हैं. उन्होंने कहा कि सरकार ने कुल अनुदान में केवल 33 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी की है लेकिन दावा 128 फ़ीसदी की कर रही है. उन्होंने कहा, “सरकार ने इस साल अप्रैल से पूरे देश में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एक्ट लागू करने की बात कही है, लेकिन दूसरी फूड पर सब्सिडरी कम कर दी है. यह 2015-16 के 1.39 लाख करोड़ रुपये से कम होकर 2016-17 के बजट अनुमान में 1.34 लाख करोड़ रुपये रह गया है. आर्थिक सर्वे और वित्त मंत्री के संबोधन में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की बात की गई लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली मौजूदा रूप में कब तक चलेगी.” उन्होंने अपने अभियान के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि लोग नकद रूपयों की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि वे अनाज मांग रहे हैं.
इस चर्चा को आगे बढ़ाते हुए दीपा सिन्हा ने कहा कि इस बजट में सर्वमान्य मातृत्व योजना के लिए कोई प्रावधान नहीं है. गर्भवती और नवजात शिशुओं को दूध पिलाने वाली माताओं के लिए इस योजना के तहत 6000 रुपये दिए जाने का प्रावधान था. आर्थिक सर्वे में मां और बच्चों के लिए एक अलग से अध्याय जरूर है लेकिन बजट आवंटन पर इसका असर नहीं है. इतना ही नहीं इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम में 2015-16 के 15,300 करोड़ के आवंटन को कम करके 14,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है.
मनरेगा के मामले में, निखिल डे ने बताया कि आधिकारिक बयानबाजी काफी भ्रम फैलाने वाला है और तथ्यों को गलत ढंग से भी पेश किया जा रहा है. उनके मुताबिक बजटीय आवंटन में राज्य सरकार द्वारा मांगी जा रही रकम का ध्यान नहीं रखा गया है. ये मांग 63 हज़ार करोड़ रूपये से ज़्यादा की है जबकि मंत्रालय ने 47 हज़ार करोड़ रूपये का प्रावधान किया है. निखिल डे ने कहा, “इसलिए इस बात में बहुत अचरज नहीं होना चाहिए कि सूखा प्रभावित आठ राज्यों में सात राज्यों का निगेटिव बैलेंस होगा और यह पहले से ही संकट का सामना कर रहे किसानों की मुश्किलों को कम करने की स्थिति में नहीं है.”
स्वास्थ्य क्षेत्र में दिए गए बजट आवंटन के बारे में जन स्वास्थ्य अभियान की वंदना प्रसाद ने कहा कि इस पहलू पर काफी कुछ लिखा गया और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा काफी आलोचना के बावजूद सरकार ने सार्वजनिक स्वास्थ्य सिस्टम के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लिए आवंटन में मामूली बढ़ोत्तरी की है. 2015-16 के आवंटन 19,135.37 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2016-17 के लिए 19,437 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. वंदना प्रसाद के मुताबिक यह महंगाई के असर और आबादी के बढ़ने की बदौलत यह बढ़ोत्तरी एक तरह से प्रति व्यक्ति 6 से 7 फ़ीसदी कमी ही है. इतना ही नहीं इस आवंटन में ही 3000 जन औषधी की दुकानें खोलने की योजना भी है और इसके लिए सरकार ने महज 35 करोड़ रुपये का आवंटन किया है.
राइट टु एजुकेशन अभियान के अंबरीश राय ने शिक्षा बजट को निराशाजनक बताया. उन्होंने कहा, “यह ना केवल निराशाजनक है बल्कि 2014 में सराकर के चुनावी वादों से भी धोखा किया गया है. सरकार ने 2016-17 के लिए शिक्षा बजट 43,554 करोड़ रुपये का रखा है जो बीते साल की तुलना में केवल 3.2 फ़ीसदी ज़्यादा है. हालांकि यह बढ़ोत्तरी इसलिए बेमानी है क्योंकि सभी सामाजिक क्षेत्र की बजट आवंटन में 2014-15 और 2015-16 में कटौती की गई थी.”
