Thai guava cultivation: किसान कमा रहे जबरदस्‍त मुनाफा, मालामाल होना है तो आप भी करें अमरूद की खेती

0
175

ठण्डी का मौसम है। इन दिनों बाजार में देसी के साथ थाई अमरूद की भरमार है। बाजार में हर जगह थाई अमरूद छाए हुए हैं। मध्य प्रदेश का रतलाम जिला थाई अमरूद की रिकॉर्ड पैदावार कर रहा है, लेकिन क्या आपको पता है थाई अमरूद की खेती होती कैसे है।

दरअसल थाई अमरूद एक विदेशी किस्म है। इसका पौधा लगाने के बाद ये बहुत जल्दी बड़ा होता है और फलने लगता है। थाई अमरूद की विशेषता यह है कि ये करीब 15 दिन तक खराब नहीं होता। लगभग 4 – 5 साल में एक पेड़ 1 क्विंटल तक फल देने लगता है।

किसान वीएनआर कंपनी से मंगवाते हैं पौधे

अमरुद की थाई किस्म की खेती का तरीका अलग है। इसमें 1 एकड़ जमीन में 500 पौधे रोपे जाते हैं। एक पौधे की कीमत 200 रुपए के आस-पास होती है। किसान पौधे को छत्तीसगढ़ की वीएनआर कंपनी से मंगवाते हैं। इस तरह एक एकड़ में पौधे रौंपने पर एक लाख रुपए खर्च होते हैं. रतलाम जिले के करीब 500 किसान 2500 एकड़ में थाई अमरूद की खेती कर रहे हैं।रतलाम जिले के किसान परंपरागत खेती से आगे बढ़कर खेती किसानी में नयी कहानी लिख रहे हैं। रतलाम के किसानों ने अंगूर-स्ट्रॉबेरी की खेती में सफलता के बाद थाई अमरूद में हाथ आजमाया और वो भी मुनाफे का सौदा बन गयी।

ऐसे ही एक किसान समरथ पाटीदार जो थाई अमरूद की खेती कर रहे हैं, वे बताते हैं कि थाई अमरूद की खेती काफी महंगी पड़ती है लेकिन मुनाफा भी फिर अधिक होता है। समरथ 11 साल से थाई अमरूद की खेती कर रहे हैं।

थाई अमरूद के पौधे रौंपने के लिए 7 फीट के अंतर से इतनी ही चौड़ी क्यारी बनायी जाती है। उसके बाद 6 बाय 6 की दूरी पर पौधे लगाते हैं। पौधे लगाते समय गड्ढे के अंदर गोबर की कंपोस्ट खाद, सुपर फास्फेट और डीएपी डाला जाता है। पौधों को ड्रिप इरीगेशन से सीचा जाता है। ड्रिप इरीगेशन विधि से सिंचाई करने पर एक एकड़ में 55000  से 65000 रुपए की लागत आती है। उसके बाद पौधे को सहारा देने के लिए साढ़े 6 फीट के बांस की खपच्चियां लगायी जाती हैं। 2 साल बाद ही पौधा पेड़ बन जाता है और फल देने लगता है।

शुगर के मरीजों के लिए लाभकारी

समरथ पाटीदार का कहते हैं कि थाई अमरूद डायबिटीज के मरीज भी खा सकते हैं क्योंकि इसकी देखभाल ऐसे की जाती है ताकि इसमें ज्यादा शुगर न हो। जब फल पेड़ पर होता है तब हर अमरूद पर अलग अलग बैगिंग की जाती है। ताकि इसमें शुगर की मात्रा कम बने और शुगर के मरीजों के लिए लाभकारी रहे। अमरूद पर तीन परत से बैगिंग की जाती है। लेयर पॉलिथिन की। उसके बाद पेपर फिर आखिरी में नेट की जाली लगायी से की जाती है।

विदेशों में भी होता है निर्यात

रतलाम का अमरूद की भारत के बड़े शहरों मुंबई दिल्ली पुणे से लेकर सिलीगुड़ी, शिलांग जयपुर, उत्तर प्रदेश, बिहार तक इसकी मांग है। यह अमरूद नेपाल, यूरोप और अमेरिका तक जाता है।

अमरूद किसान हैं परेशान

किसान समरथ पाटीदार का कहना है वर्तमान में अमरूद की सही कीमत नहीं मिल पा रही है। दाम गिरे हुए हैं और ये 35  रुपए प्रति किलो तक गिर गए हैं। इसलिए लागत भी निकाल पाना भी मुश्किल हो रहा है। किसानों का सरकार को सुझाव है कि सरकार अगर सिंचाई और एक्सपोर्ट में मदद करे तो थाई अमरूद की खेती पूरे इलाके की दशा बदल सकती है।

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here