लॉकडाउन का दिखा दूरगामी असर, देहात मे पक्षियों की संख्या बढ़ी

अमलेंदु त्रिपाठी

प्रयागराज: कोरोना महामारी के दौरान हुए लॉक डाउन से जहां आम लोगों को परेशानी हुई। न बाहरी अर्थव्यवस्था पर बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक असर हुआ। लाखों लोगों ने जान गंवाई। हजारों लोगों का रोजगार छिना। लेकिन कहते हैं किसी न नुकसान किसी का फायदा होता है। यही आलम देश व्यापी लॉक डाउन दिखा और इसका असर देश के पर्यावरण पर ​दिखा। लाक डाउन में देश के पर्यावरण में बहुत अधिक सुधार हुआ जिसके चलते जीव जन्तुओं से लेकर मानव जाति के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव दिखाई दिया। ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण का सबसे सकरात्मक असर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई दिया जिसके चलते कोरोना संक्रमण का प्रभाव काफी कम रहा। वहीं दूसरी तरफ बेहतर पर्यावरण का दूरगामी परिणाम अब दिखने लगा है इससे किसान के मित्र जीव, पशु, पक्षी आदि के स्वास्थ्य तथा प्रजनन क्षमता अच्छी हो गई है जिससे उन सभी की संख्या में अपेक्षित बढोत्तरी हुई जो किसान के शत्रु कीटों का सफाया कर फसल की सुरक्षा में मुस्तैद हो गए है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
इस संबंध में वन अनुसंधान केन्द्र प्रयागराज की वैज्ञानिक कुमुद दूबे ने बताया कि कोविड-19 महामारी ने एक तरफ हमारी अर्थ व्यवस्था को प्रभावित किया है वहीं दूसरी तरफ इसका सकारात्मक प्रभाव हमारे पर्यावरण, नदियों के जल, वायु प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण में काफी हद तक कमी आई। लॉक डाउन के दौरान पक्षियों की चहचहाहट काफी बढ़ गई थी तथा उनकी जनसंख्या में वृद्धि भी दिखाई दी। ध्वनि प्रदूषण तथा वायु प्रदूषण में कमी के चलते प्रजनन शक्ति में वृद्धि के कारण सभी प्रकार के पक्षियों की संख्या बढी है वायु प्रदूषण में कमी के कारण अनेक प्रकार के पक्षी अनुकूल पर्यावरण में बाहर निकल कर स्वछंद विचरण करते दिखाई दे रहे है।
खेती किसानी पर भी हुआ असर
इफको की सहयोगी संस्था कोऑपरेटिव रूरल डेवलपमेंट ट्रस्ट (कारडेट) के मृदा वैज्ञानिक डा. हरिश चन्द्र ने बताया कि पर्यावरण में सुधार के चलते कौवा, बगुला, सहित अन्य पक्षियों की संख्या अधिक दिखाई दे रहे है। ये हमारे किसानों के फसल का नुकसान पहुंचाने वाले कीटो का सफाया कर फसल की सुरक्षा करते हैं। लाभदायक कींटों ,पशु पक्षियो की संख्या बढ़ने से हमारे पर्यावरण व परागण में सकरात्मक वृद्धि होती दिख रही है । कॉर्डेट संस्थान के ही वरिष्ठ सूक्ष्म जीव विज्ञानी डॉक्टर हरि माधव शुक्ला कहते है कि पर्यावरण और पारिस्थितिकी के बिगड़ने का मुख्य कारण अजैविक घटक जैसे स्थल, जल , वायु, मृदा, ताप का दूषित होना है, जिससे जैविक घटक के अंतर्गत आने वाले सभी पशु, पक्षियों का जीवन प्रभावित होता है। प्रकृति में जैविक,अजैविक घटकों के बिगड़ने से परिस्थितिक तंत्र में खाद्य श्रृंखला में भारी खामी आती है इससे पक्षी भी अछूते नही होते है। पक्षियों में मनुष्य के मुकाबले श्वसन तंत्र 4 गुना तेज होता है, जिससे वायु प्रदूषण के कारण बहुत सारे पक्षियों में मृत्यु दर 40 फीसदी तक बढ़ गया है। इसी तरह ध्वनि प्रदूषण के कारण पक्षियों में प्रजनन की समस्याएं आती है, उनका हार्मोन्स असंतुलित होता है, जिससे चील, कौवो समेत अन्य पक्षियों की संख्या घटने लगी है। कौवा हमारी गंदगी साफ करता है, उल्लू चूहों की संख्या कम करता है, चिड़िया खेतो के हानिकारक कीटो के अंडा, लार्वा, प्यूपा को चट कर जाती है। विगत दिनों हुए पूर्णबन्दी का अब दूरगामी परिणाम दिखना काफी सुखद है। इससे पर्यावरण, पारिस्थितिकी बेहतर होगी।
फुलपुर (प्रयागराज ) के मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा. अरविन्द कुमार सिंह का कहना है कि पर्यावरण स्वस्थ्य होने से मवेशियों को पौष्टिक हरे चारे के साथ उनकों मिलने वाली शुद्ध हवा से स्वास्थ्य अच्छा रहा। जिसके चलते उनके मलमूत्र से बनने वाले जैविक खाद में खेतों के लिये सूक्ष्म जीवांश अधिक मात्रा में होने के कारण किसानो के खेतो की मिटटी व उत्पादकता पर अच्छा प्रभाव पडेगा।
इस प्रकार छह माह के लाक डाउन के दौरान लोगो को जहां प्रदूषण रहित स्वस्थ्य वातावरण मिला वही अच्छे वातावरण के चलते मानव स्वास्थ्य भी अच्छा रहा तथा फसल उत्पादन भी बेहतर रहा।
समाजसेवी पिंटू दुबे ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में पक्षियों का चहकना तथा भोर में कौओं का कांव-कांव करना सुनाई देने लगा है। इसके पूर्व में इन पक्षियों की आवाज बहुत कम ही सुनाई देती थी। इसके अतिरिक्त चील, उल्लू, गिद्ध, गौरैया आदि छोटे-छोटे पक्षी भी अधिक संख्या में दिखाई देने लगे हैं।

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