संतोष कुमार सिंह
कल कलावती चर्चा में थी आज दाना मांझी की चर्चा है। ऐसा नहीं है कि इन्हें चर्चा में रहने की आदत हो। वो तो गुरबत है जो इन्हें चर्चा में ला देती है। कलावाती उस समय सुर्खियों में आईं जब 2008 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी उसके घर पहुंचे और बाद में संसद में किसानों की आत्महत्या से जूझ रहे इलाके में गरीब किसान विधवाओं के लिए प्रतीक के तौर पर कलावती का उल्लेख किया।
इस उल्लेख ने उसे ‘पोस्टर वुमन’ बना दिया। झड़ी लग गयी मदद की।
अब दाना मांझी की चर्चा है। कल से पोलिटिकल पिकनिक टूरिज्म शुरू हो जाएगा। वायरल होना तो शुरू हो ही गया है। राहत राशि की घोषणा भी शुरू हो गयी है। कल तक जो सड़क पर चलते विवश आदमी को देख मुंह फेर कर चल देते हैं वो लोग भी आज व्यवस्था पर ताना कस रहे हैं, एक दूसरे के अंतरात्मा के मर जाने की दुहाई दे रहे हैं।
क्या है मामला
ओडिशा के कालाहांडी ज़िले के भवानीपटना में दाना मांझी अपनी पत्नी के शव को कंधे पर रखकर 12 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. दाना मांझी का कहना है कि पत्नी की मौत मंगलवार रात को हुई। अस्पताल के कर्मचारियों ने उनसे बार-बार शव हटाने के लिए कहा। इसके बाद बुधवार को वो शव लेकर चल पड़ा. उसने कहा, “मैं अस्पताल के कर्मचारियों से अपनी पत्नी का शव ले जाने के लिए वाहन की गुजारिश करता रहा लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। मैं गरीब आदमी हूं इसलिए किराए पर वाहन नहीं ले सकता। मेरे पास शव को कंधे पर ले जाने के अलावा कोई और चारा नहीं था।” बारह किलोमीटर की पदयात्रा के बाद उस व्यक्ति को एंबुलेंस तब मिली जब कुछ लोगों ने मामले में दख़ल दिया। दाना के मुताबिक उनका गांव वहां से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर है। वो ग़रीब है और उसके पास वाहन का किराया देने के लिए पैसे नहीं थे। अस्पताल ने कथित तौर पर उसकी मदद नहीं की। हालांकि अस्पताल ने इन आरोपों को गलत बताया है। अस्पताल के एक वरिष्ठ अधिकारी बी ब्रह्मा ने कहा, “महिला को मंगलवार को अस्पताल में दाखिल कराया गया था। उसी रात उसकी मौत हो गई। उसके पति अस्पताल के किसी कर्मचारी को जानकारी दिए बिना उसका शव ले गए।” अब जिला प्रशासन ने उन्हें मुआवजे के तौर पर 12 हज़ार रुपये देने की बात कही है।
शुरू हो गयी है खानापूर्ति
मांझी का मामला सामने आने के बाद मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने गुरुवार को मदद की योजना को औपचारिक तौर पर शुरू किया फरवरी में राज्य सरकार ने गरीबों के शवों को अस्पताल से उनके घर तक ले जाने के लिए वाहन उपलब्ध कराने की योजना शुरु की। वहीँ ओडिशा के शहरी विकास मंत्री पुशपेंद्र सिंघदेव ने कालाहांडी की कलेक्टर ने इस बात की जांच का आदेश दिया है कि क्या आदिवासी दाना मांझी को एंबुलेंस मुहैया कराने से इनकार किया गया था? कलेक्टर बृंदा डी ने बताया कि जैसे ही उन्हें इस मामले की जानकारी हुई उन्होंने अमांग के शव को लेकर जाने के लिए वाहन की व्यवस्था कराई। उन्होंने बताया, “मैंने स्थानीय अधिकारियों से उस परिवार को एक योजना के तहत 2 हज़ार रुपये मुहैया कराने को कहा. इसके अलावा परिवार को 10 हज़ार रुपये रेड क्रॉस की तरफ से भी मिलेंगे।”
अब जब दाना मांझी का मामला सामने आ ही गया है तो फेसबुक पर भी इस घटना को लेकर सरकार और व्यवस्था की मजम्मत करने में फेसबुकिया लिक्खार कैसे पीछे हटते। तो अपने दाना मांझी भी पोस्टर ब्वॉय बन चुके हैं।
क्या कहते हैं लिक्खार
आज जो लोग ओड़िशा की घटना पर शाक्ड हुए जा रहे हैं, वे शायद ऐसे लोग हैं जिन्होंने सालों से भारतीय गांवों को देखना समझना छोड़ दिया है। आप यह समझ लीजिये कि इस देश में 1 फीसदी मामलों में ही शवों को उनके घर पहुँचाने के लिए सरकारी एम्बुलेंस उपलब्ध होती है। वह भी उन लोगों के लिए जिनका पौवा होता है।
बांकी लोग या तो खुद किराये पर एम्बुलेंस जुगाड़ते हैं। या फिर जीप, टेम्पो या ठेला पर अपने परिजनों का शव अस्पताल से घर ले जाते हैं। अस्पताल में कोई मरा नहीं कि उसकी लाश वार्ड बॉय उठाकर बाहर रख देते हैं। घर वाले समझें। सरकारी एम्बुलेंस भी हो सकता है, मगर पैसा खर्च करना पड़ता है। मैंने तो बाइक और रिक्शे पर लोगों को शव ले जाते देखा है। वह बेचारा अकेला व्यक्ति होगा। वरना समाज के लोग इस स्थिति में इन्सान को अकेला नहीं छोड़ते। कम से कम फट फटी वाला ठेला तो जुगाड़ ही देते हैं। कुछ शहरों में संस्थाओं के शव वाहन होते हैं मगर उसके लिए भी या तो पैरवी चाहिए होती है या पैसा।
अपनी पत्नी के लाश को 10 किलोमीटर तक कंधे पे लेकर चलना कोई महान पत्नी प्रेमी ही कर सकता है,,,,,,,,,वही जो अपनी पत्नी से भरपूर मुहब्बत करता होगा,,,,,,,,,,,,,कहते हैं कि वो गरीब था,,,,,,,,,,,पर मैं नहीं मानता,,,,,,,,,,,,,,,, दूसरा कोई होता तो उसी आस पास अंतिम संस्कार कर पीछा छुड़ा लेता,,,,,,,,,,,,,,,,,, लेकिन वो तो संस्कारों वाला व्यक्ति था,,,,,,,,,,,,,,,, कहते हैं कि बेटी की डोली ,,,,,,,,,,,,,,,,,,और घर की लक्ष्मी की अर्थी घर से ही निकालनी चाहिये,,,,,,,,,,,,,, शायद वो यही करना चाहता होगा,,,,,,,,,,,,,,,,,, कहते हैं कि डॉक्टर भगवान होते हैं,,,,,,,,,,,,,, आप इस कथन पे विश्वास करते हैं क्या???? वो भी मांझी ही था,,,,,,,, जिसने वर्षों तक पहाड़ को तोड़ के रास्ता बनाया था,,,,,,,ये भी तो माँझी ही थे,,,,,,,,,,,,,दाना मांझी हाँ जी हाँ दाना माँझी यही तो नाम है उसका,,,,,
आप इस शख्स को ध्यान से देखिए। कैसे यह विकसित होते भारत को बदनाम कर रहा है। मरी हुई बीवी को कंधे पर लाद के ले जा रहा है। वह भी 10 किलोमीटर। इसे गौर से पहचान लीजिए। यह उसी कालाहांडी का है जहां भूख से मरने वालों ने देश की समृद्धि पर दाग लगाई थी, हमारी सभ्यता को दागदार किया था। हो सके तो इसे देश निकाला देने के लिए अभियान चलाइए। और यकीन कीजिए यह मोदी या नवीन पटनायक की तरह चार घंटे नहीं सोता होगा। न ही अंबानी, अडानी या टाटा की तरह हाड़तोड़ मेहनत करता होगा। मेहनत करने वाले कहीं ऐसे मरते हैं। यह दुर्गति तो मुफ्त में रोटियां तोड़ने वालों की ही होती है। अन्यथा इसकी पत्नी सरकारी अस्पताल में भगवान भरोसे क्यों मरती। अगर मर भी जाति तो सरकार की हजारों एंबुलेंस क्या इसे घर तक छोड़ के नहीं आतीं। जरूर इसने मदद नहीं मांगी होगी। किसी नेता से फोन भी नहीं कराया होगा। पक्का बदमिजाज होगा। मरे हमें क्या!
आज फेसबुक पर एक लिंकः वायरल है जो उड़ीसा से सम्बंधित है,लिंक में बताया गया है कि
एक ब्यक्ति रूपये के अभाव में अपनी मृत पत्नी का शव स्वयं के कंधे पर उठाकर अपनी बच्ची के साथ लगभग 12 किलोमीटर पैदल चला,ये बहुत ही मार्मिक खबर है ,सभ्य समाज के लिए सोचनीय है,शर्मनाक है।
आज भगवान् कृष्ण का जन्मदिन है इसलिए कोई राजनित की बात नही लिखूंगा।मैं आज ईश्वर से यही कामना करता हूँ की हे भगवान् किसी को भी ये दिन न दिखाये,भारत की आर्थिक विसंगतियों को दूर करने में आप सहयोग करे हे जगतपालक
@ मुझे माफ करना दाना मांझी, चौला मांझी…कालाहांडी के डिप्टी कलेक्टर से लेकर कलेक्टर, एसपी..और फिर उड़ीसा के सीएम से लेकर चीफ सेकेट्ररी तक, सबको फोन किया, लेकिन ये सिस्टम सड़ चुका है @
हिन्दुस्थान के उड़ीसा राज्य के कालाहांडी जिले के भवानीपटना प्रखंड के एक गांव के मेरे आदिवासी दोस्त दाना मांझी, मुझे माफ करना। तुम्हारे और तुम्हारी 12 साल की बिटिया के साथ जो हुआ, उसके लिए कहीं ना कहीं हम भी गुनाहगार है।
मंगलवार, 23 अगस्त, 2016 के दिन तुम अपनी पत्नी को लेकर स्थानीय सरकारी अस्पताल में गए। और मंगलवार की रात ही तुम्हारी पत्नी की टीबी से मौत हो गई। तुम्हारे पास अस्पताल की एंबुलेंस के किराए के पैसे नहीं थे। कोशिशों के बाद भी तुम इतने पैसे नहीं जुटा पाए कि अपनी पत्नी के पॉर्थिव शरीर को ससम्मान घर ले जा पाते।….एक मजबूर पति जो कर सकता था, तुमने किया…दाना मांझी, तुमने उससे शादी के समय जो सात फेरे लिए थे ना, शायद उस अग्नि को साक्षी मानकर लिए सात वचनों को निभाया, और अपनी पत्नी के शव को कपड़े में लपेटकर पैदल ही वापस घर लौट चले…12 किलोमीटर का वो सफर कैसा होगा, ये सोचकर मेरे रोंगटें खड़े हो रहे हैं, और आंखों में आंसू है…मुझे चिंता नहीं कि मेरे ऑफिस में सब क्या सोच रहे हैं…मैं इन तस्वीरों को देख रहा हूं और व्यथित हूं।
लेकिन मैने अपने जर्नलिस्ट होने की ड्यूटी निभाने की पूरी कोशिश की है, और कर रहा हूं, और तब तक करता रहूंगा, जब तक तुम्हें इंसाफ नहीं मिल जाता और तुम्हारी पत्नी की मृत देह को वो सम्मान, जो हर मौत के बाद इंसान को मिलना चाहिए।
दाना मांझी, मैनें कालाहांडी की कलेक्टर ब्रूंधा डी के हर फोन को खटखटाया। कालाहांडी के एसपी ब्रजेश कुमार राय, अतरिक्त कलेक्टर चंद्रमनी बदनायक, प्रोजेक्ट डॉयरेक्टर विनीत कुमार और तुम्हारे एरिया एसडीएम सुकांता कुमार त्रिपाठी के फोन खटखटाए।
जब कोई नतीजा नहीं निकला, तो मैने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से संपर्क की कोशिश की। फिर उड़ीसा के चीफ सेकेट्ररी से, फिर सीएम ऑफिस से। सब नकारे निकले। बस इतना पता चला है कि जिला कलेक्टर को कल सुबह एक रिपोर्ट देने को कहा है।
दाना मांझी, भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत और देश के कई प्रधानमंत्रियों को कवर करते करते सरकारी तंत्र में रिपोर्ट -रिपोर्ट खेलने का मतलब मैं जान गया हूं।
और कालाहांडी में करीब दो दशक पहले आए अकाल और उसके बाद की मौतों ने तो पहले ही पूरी दुनिया के सामने भारत का मुंह काला कर दिया था। लेकिन अफसोस कि हमारा सिस्टम उसके बाद भी नहीं सीखा।
दाना मांधी, मुझे माफ करना कि आजाद भारत के 70 साल बाद भी हम तुम्हें, तुम्हारी बेटी और तु्म्हारी पत्नी की मृत देह को वो सम्मान नहीं दे सके, जिसके तुम अधिकारी हो, एक भारतीय होने के नाते, एक इंसान होने के नाते।
तुम्हारा एक जर्नलिस्ट दोस्त।
वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेष ने लिखा है….
यह असभ्य, संवेदनहीन, सामंती कुंठा से बजबजाते निर्लज्जों का जमावड़ा है, इंसान दिखने वालों का समाज नहीं..! यह कोई मैराथन की दौड़ नहीं थी। यह सरकारी योजनाओं के टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के बावजूद अस्पताल में उसकी पत्नी का मर जाना था… ओड़िशा के एक आदिवासी दाना मांझी की जेब में एक पैसा भी नहीं होना था… पत्नी अमंग देई की लाश को घर ले जाने के लिए अस्पताल से लेकर आसपास के तमाम लोगों से खारिज यह गुहार थी कि कोई गाड़ी दिलवा दे…!
इसके बाद उसने चादर में पत्नी की लाश को लपेटा और कंधे पर टांग कर अपनी बेटी के साथ पैदल चल पड़ा… साठ किलोमीटर दूर अपने गांव की ओर…! बारह किलोमीटर तक वह खुद को मेले की तरह देखते हजारों लोगों के बीच चलता रहा… टीवी वाले से लेकर न जाने कितने लोग वीडियो बनाते रहे… फोटो खींचते रहे… मगर किसी ने आगे बढ़ कर उसे एक बार भी नहीं कहा कि ‘मैं हूं…!’ बारह किलोमीटर के बाद किसी लड़के ने मरी हुई सरकार के किसी अफसर को फोन किया और बेइज्जती के डर से एक गाड़ी भेजी गई।
समझ में नहीं आता कि देश और समाज पर गर्व करने की धमकी देते हुए लोगों को क्या कहूं… सत्तर साल की बूढ़ी होती आजादी को क्या कहूं… इस देश की व्यवस्था को क्या कहूं जो सिर्फ उन लोगों की तेल-मालिश के लिए है, जो पहले ही दाना मांझी जैसे लोगों का खून पीकर तृप्त और अघाए हुए हैं!
समाज की दिमागी गुलामी की हालत पर अगर कर सकिए तो गर्व कीजिए कि उसी जगह किसी कार वाले का पहिया किसी गड्ढे में फंस गया होता या किसी ‘मालिक’ छाप चेहरे वाले को धूप लग गई होती तो केवल पानी नहीं, अपना खून हाजिर करके वे लोग अपना बेड़ा पार हो गया समझते…! टीवी चैनल वाला वीडियो बनाने से पहले किसी अफसर को फोन करके उसे जवाब मांगता कि ये क्या है… क्या तुम्हारी पैदाइश सिर्फ ‘मालिक-संप्रदाय’ का थूका हुआ चाटने के लिए हुई है…! संवेदना से मर चुके लोग अगर जिंदा होते तो फोटो खींचते तो खींच लेते, लेकिन तुरंत उसकी ओर हाथ बढ़ा देते…!
लेकिन यही व्यवस्था है… इसी में बना-पला-बढ़ा गर्व की दुहाई परोसता समाज है… गर्व कर सकें तो कीजिए…!
दाना मांझी की तस्वीर में गौर कीजिये. सड़क देखिये. ऐसी शानदार सड़क आपको दिल्ली के सबसे पुराने मुहल्ले मेहरौली या सबसे बड़े मुहल्ले नजफगढ़ में भी नहीं मिलेगी. कालाहांडी जैसे महा गरीब इलाके में यह शानदार सड़क किसके लिए बनी है? किसकी गाड़ियां दौड़ती हैं? कालाहांडी में भूख से लोग मरते हैं, बीमारी से मरते हैं, मरने के बाद कफन के पैसे भी नहीं होते. पर यह भी जान लीजिये, कालाहांडी फूड सरप्लस जिला है और उसका चावल बहुत उम्दा होता है. आपको जो अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता है और जो अर्थनीति बतायी जाती है, उसमें झोल है.
लग रहा है अब लाश दाना मांझी के नहीं, हमारे कंधे पर हैः
बातचीत से लौटने के बाद दोपहर के बचे-खुचे खाने को डिनर की शक्ल देने लगा..लेकिन ब्रेड का टुकड़ा अभी ठीक से मुंह में जाता कि उबकाई आने लग गई. पेट की भूख बदहजमी में जाकर विलीन हो गई. लगा दानी मांझी की पत्नी की लाश उसके सिर से उतरकर मेरे सिर पर आ गई है.
दस किलोमीटर तक दाना मांझी अपनी अपनी बिलखती बेटी के साथ पत्नी की जिस लाश को लेकर चलते रहे वो हमारे समाज, हमारे भीतर के काफी कुछ मर जाने का संकेत बनकर हमें धिक्कारते रहेंगे. हम सब सांकेतिक हत्यारे हैं. मैं कई बार अपनी आलोचना सुन-पढ़कर हताश होने लग जाता हूं. मेरी नजर के सामने एक वायनरी बनकर चीजें होती हैं लेकिन दूसरा हिस्सा कई बार गायब हो जाता है. वो हिस्सा जिसमे मैं अपने को दोषी नहीं पाता. लेकिन
ऐसे दहला देनेवाले नजारे से जब-जब गुजरता हूं, मुझे अपनी शक्ल किसी हत्यारे सी नजर आती है. लगता है हम उसी शहर-कस्बे के कोजी जोन में तमाम सुविधाओं से लैस चैन की नींद सो रहे होते हैं जहां कई-कई दाना मांझी पैसे के अभाव में अपनी पत्नी के लिए दवाई तक नहीं खरीद सकते.
आज रात मुझे अपना चेहरा बेहद क्रूर, घिनौना नजर आ रहा है. हमारी सुविधा और तरक्की के बीच कई स्तर की सांकेतिक हत्याएं शामिल है. मुझे नहीं पता कि जो अच्छे दिनों की खबरें दिखाते हैं, वो अपने भीतर कुछ भी मरा हुआ महसूस कर पाते हैं कि नहीं..लेकिन ऐसे मौके पर हम किस्तों की मौत के एक हिस्से गुजर रहे होते हैं. ये रात मुझे बहुत भारी कर दे रही है.




