प्रकाश के रे
खेती-किसानी पर खास नजर रखनेवाले देविंदर शर्मा ने अपने एक साक्षात्कार में बड़ी दिलचस्प बात कही थी. उन्होंने बताया था कि 1970 के दशक में मध्य में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 400 ग्राम दलहन का बीज दिया था. अगले एक दशक में ऑस्ट्रेलिया में 90 लाख हेक्टेयर जमीन पर दलहन की खेती होने लगी थी, और वह अफ्रीका को दाल निर्यात करने लगा था. अब भारत भी उससे दाल खरीदता है. इतना ही नहीं, भारत अब अफ्रीका से भी दाल खरीदता है.
हालांकि, मैं कोई कृषि या खाद्यान्न विशेषज्ञ नहीं हूँ, पर यह बात दावे से कहा सकता हूँ कि आजादी से अब तक किसी भी सरकार ने इस संबंध में समग्र और संतुलित नीति नहीं अपनायी है. यह बात बार-बार रेखांकित की गयी है कि पैदावार बढ़ाने के प्रयासों में दाल कहीं पीछे छूटता गया और आम जन के लिए प्रोटीन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का सस्ता स्रोत दूभर होता गया. अगर आंकड़ों के आईने में दलहन को देखें, तो बड़ी चिंताजनक तस्वीर सामने आती है.
वर्ष 2015-16 के वित्त वर्ष में 25,691 करोड़ रुपये मूल्य का दाल आयात किया गया था. कीमतों के स्तर पर 2014-15 की तुलना में यह 50 फीसदी की बढ़ोतरी है. बीते वित्त वर्ष में कुल 58 लाख टन दाल आयातित हुआ था. वर्ष 2015-16 के फसल वर्ष में दलहन का उत्पादन 1.7 करोड़ टन से कुछ अधिक हुआ था, जबकि दाल की मांग 2.35 करोड़ टन थी. बीते अगस्त में संसद को सरकार द्वारा दी गयी इन सूचनाओं के साथ यह भी बताया गया था कि पिछले पांच-छह सालों से दाल की खेती 2.3 से 2.6 करोड़ हेक्टेयर जमीन में हो रही है. यह भी उल्लेखनीय है कि देश के दाल उत्पादन में 41 फीसदी हिस्सा चने का और पैदावार में अरहर की हिस्सेदारी करीब 16 फीसदी है. शेष भाग में मूंग, उड़द आदि हैं.
जून में दाल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी को देखते हुए सरकार ने 6.5 लाख टन दाल के आयात का आदेश दिया था जो कि अब तक का ऐसा सबसे बड़ी मात्रा है. बहरहाल, अब भी दाल की कीमतें चढ़ी हुई हैं.
अब इन तथ्यों को इस बात के साथ रख कर देखें कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक है. न तो उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया और न ही उत्पादन करने पर. नगदी फसल और आत्मनिर्भरता के नाम पर नीतियां बनीं और बनती जा रही हैं. लेकिन ऊपज और कमाई के लिहाज से संपन्न क्षेत्र आज कई तरह की सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणिक समस्याओं का सामना भी कर रहे हैं. सरकार जिन नीतियों पर चल रही है, उससे यह संकट गंभीर ही होगा. जाहिर है, दाल ऊपजाने और खानेवाले परेशान होंगे, पर दाल का धंधा करनेवाले मौज करेंगे.
यह भी समझना होगा कि दलहन की पैदावार बढ़ाने के उपाय खेती, स्वास्थ्य और शोध की व्यापक नीतियों से अलग कर नहीं किये जा सकते हैं. इन नीतियों को अगर सकारात्मक तरीके से आगे ले जाने की कोशिश नहीं की गयी, तो मेक इन इंडिया और कैशलेस की भी हवा निकल जायेगी. मैं यह भी कहना चाहूंगा कि नीति बनाने में और आयात का निर्धारण करने में तथा दिशा तय करने में सरकार अपनी तथा संसद की भूमिका को प्राथमिकता दे. इन मसलों को कॉर्पोरेट और बड़ी संस्थाओं के वेतनभोगी विशेषज्ञों के भरोसे छोड़ना आत्मघाती होगा. पर, कोई उम्मीद नहीं दिखती. मोदी सरकार उबड़-खाबड़ रास्तों पर हाई स्पीड में रेस लगाने पर आमादा है. इस जिद्द का असर तो दिख ही रहा है.
आखिरी बात यह कि बीते चार दशकों में दाल की पैदावार में 40 फीसदी से कम बढ़त हुई है, और ऊपर से 1950 के दशक के 50 ग्राम प्रति व्यक्ति दाल की रोजाना उपलब्धता पिछले दशक आते-आते 35 ग्राम रह गयी है. आर्थिक संकट और महंगाई के इस दौर में यह कम ही होती जायेगी. सरकार आंकड़ों की कलाबाजी दिखा सकती है, पर कमजोर होता देश हवाबाजी के भरोसे ज्यादा दिन तक भुलावे में नहीं रह सकता.
