जिला संवारते जिलाधिकारियों की कहानी…

vivek umrao_nजिला में जिलाधिकारी..गांव में पटवारी इनकी ​हुकुमत के तो कहने ही क्या..जुम्मन शेख से चौधरी दिलावर तक सब लोग खौफ खावे हैं। वैसे तो कलक्टर साहब की लालबत्ती वाली गाड़ी की सायरन सुनकर और उसके पीछे पूरे महकमें की ​गाड़ियों का काफीला देखा पूरा जिला सतर्क हो जाता है। आम लोग उनकी ओर उम्मीद से देखते हैं,लेकिन उम्मीद पूरी होगी की नहीं इसके विषय में वे कुछ कह नहीं सकते। लेकिन यह साहब भी अपने पद पर रहते हुए एक अधिकारी की भूमिका में होता है, लगे हाथों एक सामान्य इंसान भी जिसके अंदर मानवीय जज्बात होते हैं,और वही जज्बात जब आम लोग के भले के लिए उमड़ता है,तो दिल से वाहवाही निकलती है। सुकमा और कोंडागांव, छत्तिसगढ के ऐसे ही​ जिलाधिकारियों के कुछ मानवीय पहलूओं को समेट लाये है ग्रांउड रिपोर्ट आफ इंडिया के संपादक विवेक उमराव..पेश है रिपोर्ट:

शिखा राजपूत तिवारी, जिलाधिकारी – कोंडागांव, छत्तीसगढ़ :

ब्यूरोक्रेटिक अकाउंटिबिलिटी ::

कल रात में कोंडागांव पहुंचा। आज सुबह लगभग एक घंटे जिलाधिकारी आवास में रहा, सामाजिक चर्चाएँ हुईं। जिलाधिकारी महोदया ने आवास के अंदर आंगनबाड़ी का एक केंद्र बना रखा है, जिसमें 20-25 बच्चे पढ़ने आते हैं।

kondagaon_nइस आंगनबाड़ी केंद्र की स्थापना के पीछे एक अच्छा विचार है। जिलाधिकारी महोदया के बच्चे हैं। अपने बच्चों के लिए वे एक ऐसा कक्ष रखना चाहतीँ थीं जिसमें बच्चे खेल सकें, पढ़ सकें और अच्छा आचार व्यवहार सीख सकें। उनको लगा कि केवल उनके ही बच्चे ऐसी सुविधा क्यों पाएं, इसलिए उन्होंने आसपास के 20 – 25 गरीब परिवारों के बच्चों को भी अपने बच्चों के साथ खेलने, पढ़ने आदि के लिए आमंत्रित किया। अपने बच्चों के देखने की टीवी भी इसी आंगनबाड़ी में रख दी जिससे सभी बच्चे टीवी में बच्चों के कार्यक्रम देखकर सीख सकें, आनंद ले सकें। इस आंगनबाड़ी में बच्चों को यातायात के नियम, जूते सहेज कर रखना, साफ सफाई आदि की बातें माडलों का वास्तव में प्रयोग करते हुए सीखने के लिए प्रेरित किया जाता है। सबसे बड़ी बात यह कि जिलाधिकारी महोदया व उनके पति अपने बच्चों को आमजन के बच्चों के साथ ही शिक्षा देते हैं। ऐसा करना दंपति की संवेदनशीलता साबित करता है, साथ ही ऐसा करने से उनके बच्चे भी संवेदनशील मनुष्य के रूप में विकसित होगें।

फोटो जिलाधिकारी आवास के अंदर बने आंगनबाड़ी की है, मेरे साथ मेरे मित्र अजय मंडावी जी हैं जो कांकेर जिले के हैं और प्रतिष्ठित आदिवासी शिल्प कलाकार हैं।

नीरज बनसोड़, IAS, कलेक्टर – सुकमा, छत्तीसगढ़ :

ब्यूरोक्रेटिक अकाउंटिबिलिटी -2

नीरज बनसोड़  युवा IAS हैं और वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य के सुकमा जिले के जिलाधिकारी हैं। काम अधिक करते हैं, काम का प्रचार कम करते हैं। आजकल सुकमा में हूं और नीरज के द्वारा किए गए शिक्षा के कामों को देख रहा हूँ। नीरज का सोचना है कि भारतीय समाज के बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकसित होना बहुत जरूरी है। नीरज जी कहते हैं कि विज्ञान को पाठ्य पुस्तक को रटकर नहीं जाना व समझा जा सकता है। विज्ञान को करते हुए सीखा समझा जा सकता है। नीरज जी ने सुकमा जिले के आदिवासी बच्चों के लिए बहुत अच्छा विज्ञान केंद्र व विज्ञान पार्क बनवाया है।

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विज्ञान पार्क में गति, प्रकाश, ध्वनि, तारामंडल, बल, घर्षण, बल, भार, परावर्तन आदि के अनेकों माडल हैं जिनसे खेलते हुए बच्चा विज्ञान के नियमों को जीवंत रूप में सीखता है। विज्ञान केंद्र में कई कई सप्ताह की विज्ञान कार्यशाला आयोजित होती है। विज्ञान केंद्र में बहुत अच्छे तारामंडल का भी निर्माण कराया जा रहा है। मोबाइल तारामंडलों को गांव गांव में बच्चों के लिए पहुंचाया जाता है जिससे बच्चे तारामंडल के बारे में जान व समझ सकें। सुकमा का विज्ञान केंद्र छत्तीसगढ़ राज्य का पहला जिला स्तरीय विज्ञान केंद्र है और गुणवत्ता में राज्य स्तरीय विज्ञान केंद्र के समकक्ष है।

जिलाधिकारी सुकमा, नीरज बनसोड़ ने आदिवासी बच्चों के लिए ‘समर कैंप’ का आयोजन शुरू किया। बच्चों की मनचाही रचनात्मक क्रियाशीलता को पल्लवित करने का नाम है सुकमा का समर कैंप। संगीत, कला, गायन, नृत्य, शिल्प आदि बहुत प्रकार की क्रियाशीलता बच्चे सीखते हैं।बच्चे स्वयं तय करते हैं कि वे क्या करें। बच्चों का रहना, खाना पीना, स्थानीय यातायात आदि सबकुछ बिलकुल मुफ्त है।

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यह सुकमा जिला छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी गांवों के 10 से 15 वर्षीय आदिवासी बच्चों द्वारा ‘समर कैंप सुकमा’ में बनाया गया है। ये बच्चे उन गांवों के हैं जहां के लोगों ने विकास क्या है, शिक्षा क्या है, कभी नहीं देखा। बच्चों ने समर कैंप में कुछ दिनों में यह बनाना सीखा और हाथों से इतना सुंदर खिलौना बना दिया। वास्तविक योग्यता व प्रतिभा इसे कहते हैं। बेहतरीन व महंगे स्कूलों में पढ़ने व परीक्षाओं में किताबें रटकर अंक पाने को योग्यता प्रतिभा कहना मूर्खता है। लेकिन हमारी शिक्षा प्रणाली का ढांचा इसी मूर्खता पर आधारित है।

जब समर कैंप का समय नहीं होता है तब नीरज जी जब गांव जाते हैं तो बच्चे उनसे पूछते हैं कि समर कैंप कब होगा। मै समर कैंप में लगभग 300 बच्चों से मिला और उनकी खिलखिलाहटें देखी। यह फोटो छोटे बच्चों की क्रियाशीलता का एक नमूना है।

सुकमा जिलाधिकारी नीरज बनसोड़ जी ने सुकमा के पास एक जलाशय को पर्यावरण से छेड़छाड़ किए बिना लोगों के मनोरंजन का स्थल बना दिया। फूस की झोपड़ियों व पेड़ के तनों से बनी बेंचों आदि स्थानीय वस्तुओं से बना यह स्थल स्थानीय गावों के युवा समिति द्वारा प्रबंधित व संचालित है। मोटरबोट व कई पैरचालित बोटों का किराया बहुत कम होने के बावजूद ग्रामीण युवा समिति महीने का कम ज्यादा 50,000 रुपए अर्जित कर लेती है।

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