हाथों की कारीगरी को बाजार का संबल मिले तो बहुरेंगे कारीगरों के दिन

अंजली मिश्रा नयी दिल्ली: कां है मेला बला खिलौना, कलाकंद, लड्डू का दोना। चूं चूं गाने वाली चिलिया, चीं चीं करने वाली गुलिया। चावल खाने वाली चुहिया, चुनिया-मुनिया, मुन्ना भइया। लेकिन बदलते हुए दौर में तकनीक ने बच्चों के खेल का पूरा परिदृश्य बदल लिया है। अब वह टीवी से चिपका रहता है। उसे डोरेमौन …

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