अनिन्दो बनर्जी
(निदेशक, कार्यक्रम प्रभाग, प्रैक्सिस)
पिछले वर्ष के बजट में शिक्षा, स्वास्थ्य तथा कल्याण जैसे सामाजिक क्षेत्र के महत्वपूर्ण मदों में जिसतरह की भारी कटौतियाँ की गई थी, वर्ष 2016-17 के बजट में तकरीबन उसी रुझान को बरकरार रखा गया है। सामाजिक क्षेत्र में पिछले वर्ष की कटौतियाँ इतनी ज़्यादा थीं कि इस वर्ष के आवंटनों की पर्याप्तता के आकलन के लिए पिछले बजट को तुलना का आधार बनाना भ्रामक होगा, क्योंकि ऐसा करने पर ज़्यादातर मामलो में पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष के आवंटन अधिक ही दिखेंगे। फिर भी गौरतलब बात यह है कि सामाजिक क्षेत्र के इस वर्ष के बजट में कई ऐसे मद हैं जिनमें आवंटन पिछले वर्ष के मुकाबले भी कम हैं, या जिनमें मामूली इज़ाफा हुआ है।
विद्यालयी शिक्षा व साक्षरता विभाग का उदाहरण लिया जाये। इस विभाग के लिए प्रस्तावित कुल वार्षिक अनुदानों(रू0 63827 करोड़) की मांग में पिछले वर्ष की तुलना में 9 प्रतिशत की कमी आई है,भले ही सर्वशिक्षा अभियान के बजट में पिछले साल की भारी कटौती वाले स्तर की तुलना में 2 प्रतिशत की मामूली वृद्धि की गई है। यह आवंटन दो साल पहले के स्तर के लगभग पाँचवे हिस्से के बराबर है। यह अभियान न सिर्फ देश के करोड़ों बच्चों के लिए बुनियादी शिक्षा के अवसरों का आधार स्तम्भ है, बल्कि शिक्षा अधिकार कानून के ध्येयों को हासिल करने का एकमात्र ज़रिया है। एक समाजवादी देश में नागरिकों के सशक्तीकरण और विकास की विषमताओं को पाटने के लिए उच्चकोटि की प्राथमिक शिक्षा से बेहतर कोई साधन नहीं हो सकता। इस लिहाज से समकालीन सरकारों से अपेक्षा बनती है कि वह सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम छह फीसदी हिस्सा शिक्षा प्रक्षेत्र में निवेशित करे; लेकिन वर्तमान में इस निवेश का एक फीसदी से भी कम होना चिन्ता का विषय है।
लगभग यही स्थिति राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन व मध्याह्न भोजन योजना की है, जिसमें पिछले साल दर्ज़ किये गए रु0 18000 करोड़ व रु0 8900 करोड़ के निम्न स्तरों की तुलना में इस साल क्रमशः 6फीसदी व 9 फीसदी अतिरिक्त राशि का ही आवंटन किया गया है, जो यथास्थिति बरकरार रखने के बराबर है। यद्यपि प्रधानमंत्री/राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं के नामपर लगभग 3950 करोड़ के अतिरिक्त आवंटन का भी प्रस्ताव है, इनसे जुड़ी सम्भावनाओं का पता भविष्य में ही चल पायेगा।आवासन व शहरी गरीबी उपशमन मंत्रालय के कुलवार्षिक अनुदानों की मांग में भी लगभग 4 प्रतिशत की कमी दर्ज़ हुईहै।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के बजट में पिछले साल लगभग 52 प्रतिशत की कटौती की गई थी। इस वर्ष पिछले बजट के संशोधित संस्करण से 30 फीसदी अधिक अनुदानों की पेशकश की गई है। अच्छी बात यह है कि समेकित बाल विकास सेवाओं के आवंटन में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 81 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी प्रस्तावित है, जिससे हाल के समय में कई राज्यों में आंगनबाड़ियों के ज़रिये किये जाने वाले पोषाहार वितरण में की गई कटौतियों की भरपाई की उम्मीद बँधती है। इसी प्रकार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारन्टी योजना के आवंटन में 3801 करोड़ की बढ़ोत्तरी एक स्वागत योग्य कदम है, जिससे हाल के वर्षों में मज़दूरी के भुगतान से वंचित मज़दूरों की बड़ी संख्या के लिए उम्मीद बँधता है।एक ओर जहाँ मनरेगा के आवंटन में वृद्धि हुई है, वहीं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के आवंटन में मामूली कटौती की गई है।
कृषि व कृषक कल्याण विभाग के बजट में इस वर्ष पिछले वर्ष के बजट की तुलनामें 77फीसदी का खासा इज़ाफा किया गया है, जिसमें मुख्यतः बीमा, ई-मार्केटिंग, कर्ज़ व सिंचाई से सम्बन्धित प्रावधान शामिल हैं।किसानों में फैले व्यापक कर्ज़ग्रस्तता का समाधान कर्ज़ की नई योजनाओं से किस हदतक हो पायेगा, या कृषि उत्पादों की खरीद की समस्याओं से निपटने में ई-मार्केटिंग जैसी व्यवस्थायें कितनी कारगर हो पायेंगी, यह तो वक्त ही बताएगा, मगर सिंचाई सुविधाओं के विस्तार से जुडे प्रावधान मत्वपूर्ण हैं। यदि किसानों के साथ साथ बटाइदारों और खेतिहर मज़दूरों के लिए भी बजट में स्पष्ट और ठोस प्रावधान होते तो कृषि विभाग का बजट काफी ज़्यादा सार्थक होता। पाँच साल में किसानों की आय को दुगुणा करने का लक्ष्य नाकाफी लगता है; चूँकिकई अध्ययनों में उनकी औसत आय सालाना लगभग 20000 रु0 के आसपास ही आँकी गई है।किसानों की ज़िन्दगी में सार्थक बेहतरी के हित में इस लक्ष्य का थोड़ा और महत्वाकांक्षी होना ज़रूरी था। पंचायत राज संस्थाओं के सन्दर्भमें क्षमता वर्द्धन के लिए 655 करोड़ का आवंटन स्वागत योग्य है, जो विभाग के योजनापरिव्यय का लगभग 87.3 फीसदी है।
इस बजट में मई 2018 तक सभी गाँवों में बिजली पहुँचाने की प्रतिबद्धता ज़ाहिर की गई है, लेकिन ग्रामज्योति योजना जैसी व्यवस्थाओं के आवंटन में पिछले साल की तुलना में लगभग 33फीसदी की कटौती की गई है। अन्य महत्पूर्ण कटौतियों में अनुसूचित जाति उपयोजना व जनजातीय उपयोजना शामिल हैं, जिनमें क्रमशः कुल योजना परिव्यय का सिर्फ 7फीसदी व 4.4फीसदी हिस्सा आवंटित है, जो जनसांख्यिक अनुपात के आधार पर निर्धारित उनके हिस्से से लगभग 75764 करोड़ रु0 कम हैं। इसी प्रकार अल्पसंख्यक विद्यार्थियों को दिये जाने वाले पूर्व-प्रवेशिका व प्रवेशिकोत्तर छात्रवृत्तियों मेंलगभग 9.4फीसदी की कमी की गई है। निर्भया कोष में भी पूरे 50फीसदी की कटौती की गईहै।
इस साल के बजट में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों की वजह से राजस्व पर पड़ने वाला प्रभाव अभूत पूर्व है। यदि सिर्फ काॅरपोरेट कर दाताओं को दी जाने वाली रियायतों का आकलन किया जाये तो वर्तमान बजट में रु0 68711 करोड़ के राजस्व हानि का अनुमान लगाया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 6312 करोड़ अधिक है।वर्तमान बजट के मुताबिक विभिन्न प्रकार के कर रियायतों का कुल राजस्व प्रभाव लगभग रु0 6,11,128 करोड़ है!
कुल मिलाकर देखा जाये तो इस वर्ष सामाजिक क्षेत्र का बजट पिछले साल की तुलना में तो बेहतर है, मगर सामाजिक क्षेत्र के व्यापक ज़रूरतों के पैमाने पर स्पष्ट रूप से नाकाफी प्रतीत होता है।


