बजट में कृषि को मिल सकती है प्राथमिकता, बहुरेंगे किसानो के दिन

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विगत कई दिनों से हो रही बजट चर्चा में यह संकेत लगातार मिल रहे हैं की सरकार कृषि को खास महत्व देगी । सरकार सूखे को लेकर चिंतित है और हर खेत को पानी पहुंचाकर खेती में इन्द्रधनुषी क्रांति की तैयारी हो रही है । केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री अरुण जेटली द्वारा संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा 2015-16 में निरंतर 2 सूखे वर्षों के कारण कृषि में ह्रासकारी वृद्धि और उत्‍पादन में प्रमुख फसलों के बुवाई क्षेत्र में गिरावट को रेखांकित किया गया है । किसानों के लिए स्‍थाई आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि क्षेत्र में व्‍यापक बदलाव की जरूरत महसूस की गयी है। कृषि में कायाकल्‍प के लिए कृषि में उत्‍पादकता बढ़ाकर, सक्षम सिंचाई प्रौद्योगिकियों में निवेश और सभी इनपुटों के कुशल प्रयोग की जरूरत है। आर्थिक समीक्षा 2015-16 में भारत में कृषि में उत्‍पादकता बढ़ाने के लिए निम्‍नलिखित रास्ते बढ़ना चाहती  है।

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 सिंचाई

 भारत में कृषि की उत्‍पादकता को बढ़ाने के लिए कृषि योग्‍य जमीन पर सिंचाई की व्‍यवस्था को बढ़ाने और पानी के दक्ष उपयोग और युक्ति संगत कीमत निर्धारण (प्राइसिंग) के उपयुक्‍त प्रौद्योगिकियों को अपनाए जाने की जरूरत है। सबसे पहले ऐसे परिदृश्‍य में जहां प्रवाहित सिंचाई के कारण पानी की अत्‍यधिक बर्बादी होती है, सिंचाई की उन प्रौद्योगिकियों को अपनाया जाना अत्‍यावश्‍यक है, जिनसे पानी के दक्ष उपयोग में सुधार लाया जा सके।

दूसरा, जलवायु परिर्वतन कारकों के कारण पानी की उपलब्‍धता में तेजी से होने वाली कमी और कृषि एवं अन्‍य उपयोगों में पानी की अंधाधुंध बर्बादी को देखते हुए दक्ष सिंचाई प्रौद्योगिकियों पर ध्‍यान केन्द्रित करना बहुत जरूरी हो गया है। कारगर सिंचाई प्रौद्योगिकियों के माध्‍यम से ‘हर जलकण दे अपार अन्‍न‘ का लक्ष्‍य निर्धारित करके कृषि उत्‍पादकता में सुधार लाया जाना चाहिए, जिससे भविष्‍य के लिए ही खाद्य और जल सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकेगा।

 भारत की कुल फसल में उत्‍पादन क्षेत्र में निवल सिंचित क्षेत्र

सिंचाई संबंधी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012-13 में पूरे भारत की कुल फसल उत्‍पादन क्षेत्र में निवल सिंचित क्षेत्र का प्रतिशतता विवरण 33.9 प्रतिशत था। कुल फसल उत्‍पादन क्षेत्र के निवल सिंचित क्षेत्र की दृष्टि से पंजाब, तमिलनाडु और उत्‍तर प्रदेश राज्‍यों में 50 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रीय असमानता देखने को मिलती है और शेष राज्‍यों में यह 50 प्रतिशत से कम होने की रिपोर्ट मिली है। कृषि में उत्‍पादकता को बढ़ाने के लिए पूरे देश में सिंचित इलाकों को बढाया जाना जरुरी है। मनरेगा, रोजगार उत्‍पन्‍न करने वाली अन्‍य योजनाओं के अंतर्गत निधियों का उपयोग सामुदायिक परिसम्‍पत्तियों के सृजन और अनुरक्षण के लिए किया जाना चाहिए, जिसमें सिंचाई के लिए इस्‍तेमाल किये जाने वाले जलाशयों तथा अन्‍य जल स्रोतों से गाद हटाना और उनकी मरम्‍मत करना भी शामिल है।

कृषि प्रणालियों की दक्षता कृषि उत्‍पादकता को बढ़ाने में निर्णायक भूमिका निभाएगी। कृषि संबंधी कार्यबल (नीति आयोग 2015) के अनुसार पानी की लगातार बढ़़ती कमी, अति सिंचाई के कारण पानी की बर्बादी और मिट्टी की लवणता की समस्‍या को चलते भारत के कई भागों में सिंचाई की पुरानी प्रणालियां अव्‍यवहार्य हो गई है। ऐसी दक्षतापूर्ण सिंचाई प्रौद्योगिकियों के उपयोग से जो ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई की तरह आर्थिक एवं तकनीकी दोनों दृष्टियों से दक्ष हों, पानी की दक्षतापूर्ण उपयोग में सुधार किया जा सकता है, श्रम लागतों और बिजली की खपत को कम करके उत्‍पादन की लागत घटाई जा सकती है।

 जल उत्‍पादकता

 अखिल भारतीय स्‍तर पर पानी की उत्‍पादकता बहुत कम है, इसे टैपिंग, कटाई और रिसाइक्लिंग पानी के उपयोग, खेती में दक्षतापूर्ण जल प्रबंधन पद्धतियों को अपनाकर, लघु सिंचाई और अपशिष्‍ट जल एवं संसाधन संरक्षण प्रौद्योगिकियों के उपयोग के जरिये बढ़ाया जाना चाहिए। भारत में प्रमुख और मध्‍यम सिंचाई परियोजनाओं की समग्र सिंचाई दक्षता 38 फीसदी के आसपास रहने का अनुमान है। सतह सिंचाई प्रणाली की दक्षता को 35-40 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग 60 प्रतिशत तक तथा भूमिगत जल की दक्षता को 65-70 प्रतिशत से बढ़ाकर लगभग 75 प्रतिशत तक सुधारा जा सकता है।

 बीज, कृषि में उत्‍पादकता को बढ़ाने की दृष्टि से बुनियादी इन्‍पुट है। अनुमान है कि 20 से 25 प्रतिशत उत्‍पादकता बीज की गुणवत्‍ता पर निर्भर करती है (डीएसी एंड एफडब्‍ल्‍यू 2015)। बीज क्षेत्र से संबंधित जिन मुद्दों पर तत्‍काल ध्‍यान दिया जाना चाहिए वे हैं :

  बीज खरीदने की क्षमता

 मुक्‍त परागण किस्‍मों वाले बीजों को किसान अपनी ही फसलों से तैयार कर सकते है। हालांकि अधिक उपज देने वाली संकर किस्‍मों के लिए किसानों को प्रत्‍येक फसल के लिए बाजार पर निर्भर रहना होगा।बाजार में बीजों के लिए अधिकाधिक प्रतियोगियों (निजी और सरकारी) और प्रतिस्‍पर्धा को सुगम बनाया जाए, जिसके जरिये कम प्रतिस्‍पर्धी कीमतों पर गुणवत्‍तापूर्ण बीजों की उपलब्‍धता में सुधार का मार्ग खुल सकेगा।

    बीजों के विकास के लिए अनुसंधान और प्रौद्योगिकी

पर्याप्‍त अनुसंधान और आनुवांशिक इंजीनियरी के अभाव के कारण पिछले कुछ दशकों में भारत में प्रमुख फसलों के बीजों/बीज प्रौद्योगिकियों के विकास में बाधा उत्‍पन्‍न हो रही है। हरित क्रांति के दूसरे चरण को प्रारंभ करने के लिए निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में बीजों/बीज प्रौद्योगिकियों के विकास को प्रोत्‍साहित करने की जरूरत है। इस विकास में कृषि के सभी पहलुओं/फसलों अर्थात् अनाज, मोटे अनाज, फल सब्जियों, दालों, तिलहन, पशुपालन तथा मछली पालन को एक साथ शामिल किया जाना चाहिए।

 जीएम फसलें और बीज

 संकर और जीएम (आनुवांशिक रूप से परिष्‍कृत) बीजों के महंगा होने के कारण, जीएम फसलों की खेती से जुड़े पर्यावरणीय और नैतिक मुद्दों के कारण, खाद्य श्रृंखला को संभावित जोखिम, बीमारी फैलने की संभावना, पार-परागण आदि जैसे कारणों के चलते इनका उपयोग प्रारंभ नहीं हो पा रहा है। इन मुद्दों पर बहस, प‍रीक्षण और मूल्‍यांकन किये जाने की जरूरत है, ताकि अगले छह माह में संकर बीजों का उपयोग शुरू किया जा सके। बीजों की संकर और अधिक उपज देने वाली किस्‍मों का उपयोग करना ही वह सुनिश्चित मार्ग है, जिससे भारतीय कृषि में उत्‍पादकता को बढ़ाया जा सकता है।

 उर्वरक

कृषि उत्‍पादन को बढ़ाने के लिए उर्वरक एक महत्‍वपूर्ण और महंगा साधन है। उत्‍पादकता बढ़ाने के लिए उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ावा देने और उसे सुसाध्‍य बनाने के लिए सरकार किसानों को उर्वरक सब्सिडी देती आ रही है। 2013-14 में उर्वरक सब्सिडी कुल कृषिगत सकल घरेलू उत्‍पाद की लगभग 10 प्रतिशत रही है।

 सूक्ष्‍म पोषक तत्‍व और जैविक उर्वरक

 देश के अधिकतर भागों में भारतीय मृदा में बोरोन, जिंक, तांबा, लोहा आदि जैसे सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों की कमी दिखाई देती है। जिससे फसल की उपज और उत्‍पादकता सीमित हो जाती है। आईसीएआर द्वारा किये गये शस्‍य विज्ञान संबंधी परीक्षणों के अनुसार, सूक्ष्‍म पोषण तत्‍वों की अनुपूर्ति करने वाले उर्वरक 0.3 से 0.6 टन प्रति हेक्‍टेयर तक अनाज में अतिरिक्‍त उपज बढ़ा सकते है। यदि जैविक उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ाया जाए, तो सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों की कमी पर काबू पाया जा सकता है। इसके अलावा, जैविक कम्‍पोस्‍ट और खाद्य अपनाना और इस्‍तेमाल करना छोटे किसानों के लिए सस्‍ता होगा। इससे मृदा की उर्वरकता को बनाये रखना और उसमें सुधार लाना संभव होगा। चूंकि भारतीय मृदा का 67 प्रतिशत हिस्‍सा कम जैविक कार्बन से युक्‍त है, इसलिए जैविक उर्वरकों के प्रयोग को बढ़ाने की अच्‍छी खासी गुंजाइश है। मृदा का स्‍वास्‍थ्‍य और उत्‍पादकता बनाये रखने के लिए रसायनिक उर्वरको, जैव उर्वरकों तथा स्‍थानीय रूप से उपलब्‍ध जैविक खाद्य जैसे कि खेतों की खाद कम्‍पोस्‍ट, वर्मी कम्‍पोस्‍ट और मृदा परीक्षण पर आधारित हरी खाद का उचित उपयोग किया जाना जरूरी है।

 कीटनाशक

खर-पतवारों, बीमारियों और कीटनाशकों के चलते भारत में किसान की फसल उपज कमियां 15 से 25 प्रतिशत है। तथापि भारत में उचित दिशा-निर्देशों का अनुपालन किये बगैर कीटनाशकों का उपयोग मानक स्‍तरों से कम कीटनाशकों का उपयोग और कीटनाशक उपयोग के बारे में जागरूकता की कमी प्रमुख कारक है। ये कारक भारत में खाद्य उत्‍पादकों में पाये जा रहे कीटनाशक अवशेष को बढ़ाते है, जो कि पर्यावरण और मानव दोनों के लिए डर पैदा करता है।

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मशीनीकरण

खेती के प्रत्‍येक कार्य के लिए बेहतर उपकरणों की उपलब्‍धता की दृष्टि से भारत में कृषि मशीनीकरण के स्‍तर पर और अधिक कार्य किये जाने की जरूरत है, क्‍योंकि इसके जरिये ही कृषि में कठोर परिश्रम से बचा जा सकेगा, समय और श्रम की बचत से दक्षता बढ़ायी जा सकेगी, उत्‍पादकता में सुधार होगा, अव्‍यय को कम किया जा सकेगा तथा प्रत्‍येक कृषि कार्य में श्रम की लागत को कम किया जा सकेगा। गांवों से शहरों की ओर पलायन, कृषि कार्यों की बजाय अन्‍य सेवाओं की ओर आकर्षण और कृषि इतर कार्यों में श्रम की बढ़ती मांग जैसे कारणों से कृषि कार्यों के लिए श्रम की उपलब्‍धता में कम आने से यह जरूरी हो गया है कि कृषि कार्यों के लिए उपलब्‍ध श्रम का उपयोग बहुत ही विवेकपूर्ण तरीके से किया जाए तथा इस स्थिति में कृषि के मशीनीकरण के मुद्दे और भी प्रासंगिक बना दिया है। भारत में अधिकांश कृषि कार्यो के लिए मशीनीकरण का स्‍तर 50 फीसदी से कम है। जोतों के बंटवारे में वृद्धि होने और छोटे किसानों द्वारा ट्रेक्‍टरों के उपयोग की निम्‍न दर के कारण निजी भागीदारी वाले ऐसे बाजार की आवश्‍यकता महसूस होती है, जहां ट्रेक्‍टर किराये पर उपलब्‍ध हो सके। ठीक वैसे ही जैसे कि कारें और सड़क निर्माण संबंधी उपस्‍कर आदि उपलब्‍ध कराये जाते है। उत्‍पादकता को बढ़ाने के लिए मझौले और सीमांत किसानों को घरेलू/अनुकूलित प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके तैयार किये गये ऐसे उपयुक्‍त कृषि उपकरण उपलब्‍ध कराये जाने चाहिए, जो टिकाऊ, हल्‍के, सस्‍ते हो तथा फसल और कार्य विशेष को ध्‍यान में रखकर तैयार किये गये हो।

 

 

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