कमलेश कुमार सिंह,वरिष्ट पत्रकार
बिहार में पंचायत चुनाव जारी है. शुरुआती कुछ चरणों में तापमान भी सियासी गर्मी के अनुसार शिखर पर था, लेकिन पिछले दो दिनों से कुछ राहत दे रहा है. इससे चुनावकर्मी काफी राहत महसूस कर रहे हैं. अब आप लोग सोच रहे होंगे कि केवल चुनाव कर्मियों को मिली राहत की बात क्यों कर रहा हूं, जबकि इससे तो उम्मीदवारों और मतदाताओं को भी राहत मिल रही है. उम्मीदवारों और मतदाताओं के बारे में खबरें आम हैं. चुनावकर्मियों के बारे में कम. इसलिए मेरे जेहन में उनके बारे में कुछ लिखने का विचार उत्पन्न हुआ दरअसल, वैशाली जिले के एक मतदानकर्मी, जो शिक्षक हैं, उनकी आपबीती सुनकर ही ऐसा विचार उत्पन्न हुआ। अभी तक उन्होंने तीन चरणों में सफल मतदान में अपना योगदान दिया है. हर बार वे लगभग एक ही जैसा किस्सा सुनाते हैं. उन्हें मतदान की तारीख के पूर्व संध्या में ही मतदान केंद्र पहुंचना पडता है. रात का खाना घर से ही पकवा कर ले जाते हैं. लिहाजा रात का खाना तो सही से हो जाता है. पानी भी साथ ले जाते हैं, दो लिटर। इसके बाद शुरु होती है परेशानियों का दौर. मतदान स्थल प्राइमरी स्कूल। माफ किजिएगा, सुशासनबाबू अधिकतर स्कूलों को बिजली की आपूर्ती नहीं होती। लिहाजा इलेक्ट्रिक पंखा की बात कौन करे? मच्छरों के कारण रात भर नींद नहीं आती. कछुआ छाप या इस जैसे मच्छर मार अगरबत्ती भी काम नहीं करता। इस कारण साथ में आये सुरक्षाकर्मी आसपास के थाने में आराम की नींद लेने चले जाते हैं.
किसी भी तरह रात गुजारने के बाद शुरु होती है, अहले सुबह शौचालय की खोज। चार बजे सुबह आसपास के खेत में ही निपटना होता है. ऐसे में पढने वाले बच्चों की परेशानियों के बारे में सोचिए।। साथ में लाया पीने का पानी सुबह में खत्म हो जाता है. आयोग चाहे जितनी सुविधाओं की बात कहे, ग्रामीण दूर दराज के इलाकों में काफी असुविधाएं हैं. पानी के जुगाड में काफी माथापच्ची करना पडता है. कई बार तो दिन भर बगैर पानी के रहना पड जाता है. सुबह पाच बजे से मतदान कार्य के लिए तैयारी शुरु हो जाती है. सात बजे से लोग कतार में लग जाते हैं. मतदान प्रतिशत साठ फिसदी से अधिक होने के कारण रात के आठ बजना तो तय सा ही हो गया है. यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है. लेकिन मतदानकर्मियों को कई बार दोपहर में खाने का समय भी नहीं मिल पाता। हां, सुबह में घर से लाया सत्तू घोल के पी लेते हैं.
आयोग द्वारा नाश्ते या खाने का पैकेट मुहैया नहीं कराया जाता। जैसा दिल्ली में देखा जा सकता है. हां इसके ऐवज में 150 रुपया मिलता है. हिसाब लगाइये कि तीन टाइम का खाना दो बार नाश्ते और पानी के लिए इतना रकम कितना सही है. अब इसमें गरीबी रेखा के मानदंड जैसा हिसाब किताब ना लगाया जाये तो बेहतर होगा। बक्सा जमा कराने में कई बार रात के दो बज जाते हैं. सुबह के चार बजे या छह बजे ही अपने आवास पर लौट पाते हैं. यानी बक्सा, बैलेट पेपर और अन्य चुनावी सामग्रियों के लिए मतदान से एक दिन पहले दोपहर से शुरु हुई कवायद लगभग 40-48 घंटों में खत्म होता है. इन सबके लिए इन कमर्यिों को प्रशिक्षण के लिए 150से 350 और मतदान कार्य के लिए भी इतने ही लाभ मिलने का प्रावधान है. इन सब के बीच मतदाताओं, पोलिंग एजेंटो, आॅबजर्वर व अन्य अधिकारियों की बदजुबानी तो आम है. हां एक दिन सुस्ताने की फुरसत जरुर मिल जाता है, लेकिन साथ ही उन्हें बच्चों की प्रभावित होती पढाई का मलाल भी है. उन्होंने अपना नाम सार्वजनिक न करने की हिदायत दी. वहीं एक दूसरे गरुजी ने लगभग एक जैेसा ही हाल सुनाया। लेकिन एक बात अलग बताई। मतदान के दिन शाम 4 बजे के बाद अगर मतदाताओं की भीड़ जमी हो और उन्हें अहसास हो जाये कि रात के आठ बज जाएगा, तो चितकबरा (सैफ या बीएमपी के जवानों) से सांठगांठ कर उन्हें भगवाने का भी काम करते हैं. या मतदान स्थल पर तैनात दबंगों को 30-40 वोट छापने की खुली छूट देते हैं. इससे उन्हें घर में रात बिताने का मौका मिल जाता है. ऐसे में महिला शिक्षकों जिन्होंने चुनाव में योगदान दिया होगा, उनके हाल का अंदाज सहज ही लगाया जा सकता है. मैं तलाश रहा हूं, अगर मिली तो उनकी आपबीती साझा करूंगा। अगर आप तलाश करने में सफल हों, तो आप भी साझा करें।।।।।।।।।।।।।

