जलवायु परिवर्तन के मामले में नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार फिसड्डी, राज्य सरकार अपने मुंह मियां मिट्ठू

अमरनाथ झा
पटना: जलवायु परिवर्तन से बुरी तरह प्रभावित बिहार में इसे लेकर कोई जागरुकता नहीं है। हाल ही में नीति आयोग ने सतत विकास लक्ष्य के लिहाज से राज्यों की स्थिति के बारे में एक रिपोर्ट जारी की है।
इस रिपोर्ट में बिहार को कई मामलों में सबसे निचले पायदान पर रखा गया है। विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के लिहाज से प्रदेश की स्थिति दयनीय है, और राज्य को महज 16 प्वाइंट मिले है। इससे पहले आईआईटी गुवाहाटी और भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलोर ने जलवायु परिवर्तन के संकट के बारे में एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें बिहार के 14 जिलों को इस संकट का मुकाबला करने में सबसे अक्षम जिलों की सूची में रखा गया है।
हालांकि सरकार ने नीति आयोग द्वारा जारी किये गये रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया। इस बाबत बिहार सरकार के मंत्री विजय कुमार चौधरी ने तो नीति आयोग की रिपोर्ट को ही बकवास करार दिया और जलवायु संकट का मुकाबला करने के की तैयारियों का गिनाने लगे। पर तमाम दावों के बावजूद बिहार सरकार की तैयारी जमीन पर उतरती नजर नहीं आ रही।
इन्हीं सब सवालों पर मीडिया कलेक्टिव फॉर क्लाइमेंट इन बिहार ने पिछले दिनों एक ऑनलाइन बातचीत का आयोजन किया जिसमें नदी, पानी और पर्यावरण के विभिन्न पहलूओं पर चर्चा हुई। इस दौरान कई विद्वानों में मसलन गंगा मुक्ति आंदोलन के अनिल प्रकाश, जब नदी बंधी पुस्तक के लेखक रणजीव कुमार, मेघ पाइन अभियान के एकलव्य प्रसाद, भागलपुर विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका रुचिश्री और असर संस्था की प्रिया पिल्लई वक्ता के तौर पर शामिल हुए। बातचीत में तीन दर्जन से अधिक जागरुक नागरिकों की भागीदारी रही।                            …जलवायु परिवर्तन

गंगा मुक्ति आंदोलन समेत पर्यावरण से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर करीब 40 साल से लगातार सक्रिय अनिल प्रकाश ने कहा कि 1995 में जापान की पुरानी राजधानी क्योटों में संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में 11 दिनों का सम्मेलन हुआ था जिसमें कार्बन उत्सर्जन कम करने का सामुहिक फैसला हुआ। पर बाद में अमेरीका इसे मामने से पीछे हट गया। हालांकि कोयला और पेट्रौलियम का सबसे अधिक इस्तेमाल अमेरीका और दूसरे अमीर देशों में ही होता है। अपने बिहार में बाबू लोगों को कागजी काम करने की आदत है। यहां कोयला से बिजली बनाने वाले संयंत्रों से हर तरह का प्रदूषण बेतहाशा होता है। कहलगांव में तो कहीं से पुरानी मशीने लाकर बिजलीघर बना दिया गया। अब उसके प्रदूषण से आसपास की खेती बर्बाद हो गई। नदी का पानी खराब हुआ और अब भूजल भी प्रदूषित हो रहा है। उन्होंने कहा कि अब सौर्य उर्जा सस्ता हो गया है और कोयला संयंत्रों की तरह प्रदूषणकारी नहीं है तो ताप बिजलीघरों की जगह सौर्य प्रकल्पों को क्यों नहीं बढ़ाया जा रहा। सरकारी और गैर सरकारी इमारतों की छत पर सोलर प्लेट लगाकर भी बिजली की आपूर्ति की जा सकती है। इसीतरह सरकारी परिसरों में बड़ी संख्या में पेड़ लगाने, तालाब इत्यादि को पुनर्जीवित करने का काम किया जाना चाहिए। इस सबके लिए केवल सरकार से कुछ नहीं होगा, समाज को भी जागरुक होना होगा। मुजफ्फरपुर से अनेक मुहल्ले तालाबों के नाम पर हैं, पर अब वे तालाब विलुप्त हो गए हैं। लोगों ने उन्हें पाटकर घर बना लिए हैं। ऐसी स्थिति में पर्यावरण की सुरक्षा कैसे हो सकती है।
जब नदी बंधी पुस्तक के लेखक और नदी,पानी, खेती की स्थिति पर लगातार अध्ययनरत रणजीव कुमार ने कहा कि बिहार में जलवायु परिवर्तन की वजह से उत्पन्न संकट अब भयानक हो गया है। पिछले साल हर महीने में दो-चार दिन वर्षा होती रही। इस बेमौसम वर्षा से हर मौसम की फसलों का नुकसान हुआ। इस साल भी चार दिन जोरदार गर्मी पड़ रही है तो दो दिन वर्षा हो जा रही है। मतलब मौसम का कोई ठीक नहीं रह गया है। वर्षा की कुल मात्रा कम हुई है, लेकिन अचानक क्लाउड ब्रस्ट की तरह वर्षा होने से बाढ़ की स्थिति बन जा रही है। बिहार वैसे भी आपदाग्रस्त क्षेत्र रहा है। यहां बाढ़, सूखा, वज्रपात, आगजनी आदि सभी तरह की आपदाएं आती रही हैं। इन सबके बीच नदियों से आई मिट्टी और अच्छी वर्षा की वजह से तरह-तरह की फसल होती रही है। पर अब जलवायु का रंग-ढंग बदलने से भयानक संकट खडा हो गया है।                                                                                                                                                            ..जलवायु परिवर्तन

असर संस्था से जुड़ी प्रिया पिल्लई ने जलवायु परिवर्तन और सामाजिक न्याय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि नीति आयोग की रिपोर्ट और आईआईटी की रिपोर्ट पर चर्चा को व्यापक फलक और विशेष संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आज प्राकृतिक संसाधनों के साथ जन-समुदाय के संबंधों को जोड़कर देखने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि जंगल को कटने से बचाना होगा। खदानों के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, बदले में पूंजीपति कैंपा फंड में कुछ अंश देता है, जिससे पेड़ लगाए जाते हैं। पर पेड़ लगाने से पर्यावरण नहीं बचने वाला। पिछले कुछ वर्षों से पर्यावरण से जुड़े सारे कानूनों को कमजोर किया जा रहा है। कोयला से बिजली बनाने वाले संयंत्रों का विरोध होता है तो पूंजीपति वहां से पैसा निकालकर सोलर प्लांट में पैसा लगाने लगे हैं। सौर्य संयंत्रों की स्थापना ठीक है, पर इसके केन्द्र में जन समुदाय को रखना जरूरी है। नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार को सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिहाज से सबसे खराब स्थिति में पाया गया है। उन्होंने पावर प्वाइंट के जरीए दोनों रिपोर्टों के बारे में विस्तार से चर्चा की।

भागलपुर विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका रुचिश्री ने नदियों के संरक्षण खासकर छोटी नदियों के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि गंगा का पुनरुध्दार तभी संभव है जब छोटी नदियों की स्थिति ठीक रहे। इस सिलसिले में उन्होंने भागलपुर के पास की चंपा नदीं के बारे में चर्चा की। उन्होंने कहा कि हर नदी की अपनी संस्कृति होती है, नदी के मरने का मतलब उस सबका नष्ट हो जाना होता है।
इस संदर्भ में प्रसिध्द पर्यावरणविद अनुपम मिश्र की इस बात का उल्लेख भी किया कि व्यक्ति और सरकार के बीच समाज होता है, लेकिन अब समाज की भूमिका कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि नदी सरकार की संपत्ति नहीं होती। उसे समाज की साझा संपत्ति के रुप में ही रखना होगा। इसके लिए समाज को जागरुक होना होगा।                                                      ..जलवायु परिवर्तन
मेघ पाइन अभियान के एकलव्य प्रसाद ने बिहार की बाढ़ और सूखा के साथ-साथ इनसे सबसे प्रभावित होने वाली महिलाएं के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने पिछले कई वर्षों के अपने अध्ययन के आधार पर कहा कि बिहार में भूजल का स्तर घट रहा है। वर्षा अनिश्चित और हानिकारक हो गई है। बाढ़ का स्वरुप बदल गया है। सूखा नियमित घटना बन गई है। प्राकृतिक जल स्रोत लुप्त हो रहे हैं। कृषि के लिए जल की उपलब्धता अनिश्चित हो गई है। इन सारे मसलों को ध्यान में ऱकते हुए जलवायु परिवर्तन के लिहाज के उपयोगी उपायों के बारे में भी उन्होंने चर्चा की।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए पुष्यमित्र ने कहा कि हम जलवायु परिवर्तन का सीधा नुकसान झेलते हैं क्योंकि इसका मुकाबला करने के लिए तैयार नहीं है। वैसे बिहार शायद इकलौता राज्य है जिसने अपने एक विभाग के नाम में जलवायु परिवर्तन जोड़ा है। वन एवं पर्यावरण विभाग अब वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग हो गया है, पर इस संकट के बारे में सरकारी स्तर पर साफ समझ नहीं है। सरकार ने साढ़े तीन करोड़ पौधे लगाने का दावा किया है जिससे बिहार का हरित आवरण 9 प्रतिशत से बढ़कर 16 प्रतिशत हो गया है। जल-जीवन-हरियाली कार्यक्रम के अंतर्गत भी कुओं और तालाबों की सफाई, वृक्षारोपण आदि कराया जा रहा है। पर इन कामों का जलवायु के लिहाज से उपयोगिता को नीति आयोग स्वीकार नहीं करता।                        ..जलवायु परिवर्तन

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