उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ट पत्रकार
1942 में हुए भारत छोड़ो आंदोलन की की पचहत्तरवीं सालगिरह की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है…उस आंदोलन के दौरान हिंदुस्तान के जिन तीन जिलों ने अंग्रेजी गुलामी से खुद को आजाद करने का इतिहास रचा, उसमें से एक उत्तर प्रदेश का बलिया जिला भी रहा। तब से बलिया को बागी का विशेषण भी मिला हुआ..मेेरी भी नाभिनाल वहीं से जुड़ी हुई है..जब मैंने होश संभाला तो सर्वत्र घोर जातिवाद, गुंडई और रिश्वतखोरी का आलम देखा..हां, इन सबके बीच इन्सानियत भी पलती रही..लेकिन किसी इन्सान को इन्सानियत के नाते आगे बढ़ते मैं कम ही देख पाया…चाहे राजनीति में हों या नौकरी में..एक-दो को छोड़ दें तो एक नंबर के भ्रष्टाचारी, लौंडेबाज, रिश्वतखोर लोगों को ही देखा-सुना और आगे बढ़ते पाया..ठेकेदारी भी उनके ही हाथ में देखी..जो लूट सकते थे..पढ़ते वक्त बलिया के बांकपन को लेकर हर साल अगस्त में अपना भी रोम-रोम गर्व से खड़ा हो जाता था..लेकिन अगस्त की खुमारी बीतते ही सोचने लगता कि आखिर बलिया 1942 में आजाद कैसे हो गया था..आजाद हो भी गया तो गांधी के आदर्शों पर चलने की कोई परंपरा क्यों नहीं बनीं..
पिछले तेइस साल से राजधानी दिल्ली में हूं..एक बार फिर यह सोच इन दिनों अपने जेहन में फिर तारी हो गई है..तारी होने की वजह है गंगा की प्रचंड लहरों के बीच दूबे छपरा गांव के पास रिंग बांध का टूट जाना। इस बांध के टूटने से तीन गांवों, उदयी छपरा, दूबे छपरा और रिकनी छपरा के करीब 35 हजार निवासियों को सीधे-सीधे दुश्वारियां झेलनी पड़ रही हैं। अपनी बसी-बसाई गृहस्थी छोड़कर बांध के किनारे सड़कों पर तिरपाल, बोरा-चट्टी आदि से आशियाना बनाकर दिन की गरमी और रात के अंधेरों का डर झेलना पड़ रहा है…यहां से छपने वाले अखबारों में इस दर्द की कहानी कम है..वैसे भी पत्रकारिता को अब दर्द की कहानियां नहीं लुभातीं.. वाराणसी से प्रकाशित होने वाले तमाम अखबारों में रोजाना एक खबर जरूर छपती है..राहत की कमान एसपी और डीएम ने संभाल ली है..भाई, वे नहीं संभालेंगे तो कौन संभालेगा..खबर की परिभाषा के मुताबिक समाचार तभी बनता, जब देश की सर्वोत्तम प्रतिभाओं से चुनी गई ये दोनों शख्सियतें कमान नहीं संभालतीं। बैरिया के एसडीएम की सिर पर बालू की एक बोरी लिए तस्वीर भी स्थानीय अखबारों की सुर्खियां बनते-बनते दिल्ली की कुछ सनसनी परोसने वाली वेबसाइटों पर भी साया होने लगी हैं.. हो सकता है कि एसडीएम साहब ने एक बोरी बालू अपने सिर पर उठा लिया हो..हम लोग भी मीडिया के कैमरों को देख अपनी सहजता में अच्छाई का बेहतरीन नाटक करते हैं..कुछ ऐसा ही वहां भी हुआ..हो सकता है कि फोटो लेने वाले पत्रकार-फोटोग्राफर को साहब से कुछ फायदा भी मिला हो..बहरहाल हकीकत यह है कि बाढ़ नियंत्रण के बलिया के प्रभारी महोदय और उनके दल ने पहले ही मान लिया था कि बांध टूटेगा और तीन दिन पहले ही वहां से भाग खड़े हुए थे..उनके भागने के बाद गांव वालों ने अपनी संपत्ति, अपनी इज्जत को बचाने के लिए बांध को रोकने का मोर्चा खुद ही संभाला..लेकिन वे नाकाम रहे..
अब सवाल यह उठता है कि जब डीएम और एसपी साहब ने जब कमान संभाल ही ली है तो बांध को टूटता छोड़ भागने वाले इंजीनियर और उनकी टीम के खिलाफ उन्होंने क्या किया..अफसरी और कर्तव्यपरायणता तो कहती है कि इंजीनियर और उनकी टीम को आखिर तक वहां रूकना चाहिए…आखिरी दम तक बांध टूटने से बचाने का जतन करना चाहिए था..यहीं पर बलिया के बागीपन के इतिहास पर शक होने लगता है..जिस जिले में ऐसे संवेदनहीन अफसर हों, राजनीति भी सिर्फ फोटो छपाने में भरोसा करती हो..वहां के लोगों में गुस्सा क्यों नहीं है..क्या उनकी नियति पददलित रहने में ही है..अगर दूसरी जगह कहीं बांध टूटा होता तो दिल्ली तक मीडिया दहल उठता..फोनो, लाइव से लेकर रिपोर्टर के वाकथ्रू तक हंगामा खड़ा हो गया होता..आखिर करीब दस गांवों की दो लाख के करीब की आबादी पर भी असर पड़ना ही है इसका..लेकिन सब शांत हैं..करीब नौ सौ किलोमीटर दूर बैठकर इस आफत और उसके जिम्मेदार लोगों को लेकर गुस्से में हूं..लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा हूं..आखिर में अपने पास की बोर्ड ही है..उसे पीटकर अपना दर्द और क्षोभ जता रहा हूं..लेकिन यह क्षोभ कामयाब तब माना जाएगा, जब बलिया के लोग खुद उठ खड़े होंगे इस अनाचार, कर्तव्यहीनता के खिलाफ…सवाल उठाएंगे..ठीक उसी तरह, जैसे 1942 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उठाया था..तभी जाकर बलिया का भाग्य बदलेगा..अन्यथा बाढ़ आती रहेगी और अपनी जेब भरने वाले लोगों को उनके हाल पर जीने या यूं कहें मरने के लिए छोड़ते रहेंगे (बागी बलिया के बाढ़ पीड़ितों का आवाज बनता फेसबुक पोस्ट)



