अब मैदानी क्षेत्रों में भी हो सकती सेब की खेती, आईये जानते कैसे

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वर्षा वर्मा

शिमला: अगर आपसे पूछा जाए कि भारत में सेब की खेती कहाँ होती हैं। तो आप का जवाब होगा हिमाचल प्रदेश और कश्मीर लेकिन अब ये बात पुरानी हो गई है। दरअसल देश में सेब की खेती जम्मू-कश्मीर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे ठंडे प्रदेशों में होती है। लेकिन अब इसकी खेती गर्म मैदानी इलाकों में भी होने लगी है।

हिमाचल प्रदेश के एक किसान ने सेब की एक ऐसी किस्म विकसित की है। जिसमें फूल आने और फल लगने के लिए लंबी अवधि तक ठंड की जरूरत नहीं पड़ती है। सेब की नई किस्म से देश के कई राज्यों में इसकी खेती संभव हो गई है।

भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान ने सेब की फसल को मैदानी क्षेत्रों में लोकप्रिय बनाने के लिए काफी काम किया है। इसके तहत सेब की कम शीतलन आवश्यकता वाली प्रजातियों जिनमें फूल आने के लिए 250- 300 सर्दी की ज़रूरत होती है। इस किस्म का परीक्षण उपोष्ण जलवायु में किया गया है।

इस अध्ययन से मिले रिजल्ट में यह भ्रम दूर हो गया कि सेब की बागवानी उपोष्ण जलवायु क्षेत्रों में ही संभव है। यह अध्ययन उपोष्ण क्षेत्रों में कृषि और बागवानी के विविधीकरण में नया विकल्प प्रदान करने की क्षमता रखता है।

कम शीतलन की ज़रूरत वाली प्रजातियों में अन्ना,डॉर्सेट गोल्डन,एचआर एमएन-99 इन शेमर, माइकल, बेबर्ली हिल्स, पार्लिन्स ब्यूटी, ट्रापिकल ब्यूटी, पेटेगिल, तम्मा शामिल हैं। इन संस्थान में अन्ना, डार्सेट गोल्डन और माइकल प्रजाति के पौधे पर 4 वर्षों के अध्ययन से प्राप्त अनुभव के आधार पर किया गया है।

यह सेब की दोहरी उद्देश्य वाली प्रजाति है जो गर्म जलवायु में अच्छी तरह से विकसित होती है और बहुत जल्दी पककर तैयार भी होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में होने वाली सेब की प्रजातियों को पुष्पन और फलन के लिए कम से कम 450- 500 घंटे ठंड की ज़रूरत होती है। इस प्रजाति के फल जून माह में परिपक्व हो जाता है। फलों के परिपक्व होने पर रंग का विकास पीली सतह पर लाल आभा के साथ होता है।

बागवानी करने वाले किसान को यह सलाह दी जाती है कि सेब की बागवानी के लिए आदर्श पी-एच मान 6- 7 है, मृदा में जलजमाव नहीं होना चाहिए साथ ही उचित जल निकास वाली मिट्टी खेती के लिए सबसे उपयुक्त होती है। इन्हें सूर्य के प्रकाश की कम से कम 6 घंटे की आवश्यकता होती है। प्रति पौधा 15 किग्रा सड़ी गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जा सकता है। सेब की प्रजातियों की चयनित प्रजातियों को वर्गाकार 5X5 या 6X6 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए। पौध रोपण के समय यह ध्यान रखना जरुरी रहता है कि मूलवृंत और साकुर के जोड़ के स्थान जोकि एक गांठ के रूप में आसानी से दिखाई देता है। कभी भी भूमि में दबना नहीं चाहिए।

नवम्बर से जनवरी तक पौधों की लगभग 60 प्रतिशत पत्तियाँ गिर जाती हैं। पत्तियों के गिरने पर किसान भाइयों को चिंता नहीं करनी चाहिए। यह इन पौधों को ठंड के मौसम में न्यूनतम तापमान को सहने और अगले मौसम में फूल लगने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

हानिकारक कीटों में मुख्य रूप से अगस्त- सितम्बर में हेयर कैटर पिलर का प्रकोप होता है। इसके बचाव लिए डाइमेथोएट- 2 मिली लीटर की दर से तुरन्त छिड़काव करनी चाहिए। जुलाई के समय बरसात के साथ कुछ फलों में सड़न की समस्या दिखाई पड़ती है जिसके उपचार के लिए किसी भी सुरक्षित फफूंदीनाशक कार्वेन्डाजिम या थियोफेनेट मिथाइल का 0.1 प्रतिशत की दर से छिड़काव करके किया जा सकता है। बेहतर तो यही होता है। कि बरसात के पहले ही फलों को तोड़ लिया जाए। ​ताकि बरसात के समय फसल खरब ना हो। किसान उन सेब की फसल से अच्छी कमाई कर सकता है।

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