गाँव की ताकत जन-भागीदारी

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अन्ना हजारे (मशहूर समाजसेवी)

हमारे देश में ग्राम स्तर पर जो भी योजनाए अथवा विकास कार्यक्रम लागू होने हैं उनका नियोजन एवं अमल दिल्ली से होता है। यही कारण है कि 62 साल भी सत्ता का लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण नही हो पाया, क्यो कि नियोजन एवं अमल में जन सहभाग नही है। ग्राम पंचायत तो कार्यकारी बाडी है, जब कि ग्रामसभा गाँव के सभी वोटरो की इकाई होती है।इसलिए ग्रामसभा का महत्व बहुत अधिक है। लेकिन यह महत्व अब तक स्थापित नही हो पाया है।

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महाराष्ट्र में हमने राज्य सरकार से लड़कर ग्रामसभा को सशक्त करने के लिए एक कानून बनवाया है। इस कानून के मुताबिक विकास फंड सीधे ग्राम पंचायत के पास जाता है और पंचायत ग्रामसभा को विश्वास में लेकर काम नही करती तो सरपंच, उपसरपंच एवं ग्रामसभा के सदस्यों के पास होती है। भारत सरकार पूरे देश के लिए जनप्रतिनिधि जनता से पूछकर कार्य करें। इससे पारदर्शिता आएगी। आज ग्रामीण विकास मंत्रालय गाँव के विकास के नाम पर हजारो करोड़ रूपये बिना जनसहभागिता के ही खर्च कर रहा है। गाँव के विकास में तब तक गति नही आयेगी जब तक सत्ता का पर्याप्त विकेंद्रीकरण ग्राम पंचायतों तक नही किया जाता। ग्राम पंचायत में विकास राशि आये और ग्रामसभा की सहमति से विकास कार्यो में उसका उपयोग हो, यही आदर्श स्थित है। 73 वां संविधान संशोधन पास हो गया, लेकिन इसका उपयोग नही हो पाया है। इसी तरह 74 वें संविधान संशोधन में वार्ड सभा एवं नगरपालिका को भी शक्तियां दी गई है। लेकिन राज्य इसके लिए तैयार नही है, क्योकि एैसा करने से उनके हाथ से पावर निकलकर सीधे जनता के हाथ में आ जाएगी।

शायद यही कारण है कि सरकार भी सत्ता विकेंद्रीकरण के मसले पर चुप्पी साधे हुए है। रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं के माध्यम से काफी पैसा के विकास के लिए जा रहा है, लेकिन उसका उपयोग किस कार्य के लिए कैसे किया जाये इस बात की तकनीकी जानकारी ग्रामसेवक को नही होती। समस्या इसलिए भी पैदा हो रही है। ग्राम स्तर पर लीडरशिप विकसित नही हो पा रही है। ग्राम स्तर पर लीडरशिप को विकसित करना पड़ेगा। इसके लिए गैर सरकारी संस्थाओं एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से 12 वीं पास युवाओं  को प्रशिक्षण देकर उनका उपयोग किया जा सकता है।

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पैसा तो दे दिया जाता है, लेकिन इससे काम नही चलेगा। केंद्र एवं राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों में कर्मचारियो के प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है और इसके लिए प्रशिक्षण केंद्र भी होते है, लेकिन ग्राम स्तर पर लीडरशिप के विकास के लिए कोई प्रशिक्षण  केंद्र नही होता। जब तक सही लीडरशिप नही होगी गाँव का विकास नही हो सकता। एक साल के भीतर कम से कम 4 ग्रामसभाएं होनी चाहिए। एैसी व्यवस्था 73 वे संविधान संशोधन में की गई है। महाराष्ट्र में तो हम लोग 6 ग्रामसभाए आयोजित कर रहे है। केंद्र सरकार को ग्राम पंचायतों के सशक्तिकरण के लिए एक एैसा कानून बनाने की जरूरत है जिससें कि सरपंच, उपसरपंच और ग्रामसेवक के दुराचरण पर उनको हटाये जाने की ताकत ग्रामसभा के सभी सदस्यों के पास हो। जब मतदाताओं के पास ताकत होगी तभी सच्चे लोकतंत्र की स्थापना संभव है।

साभार- अमर उजाला (चौपाल) उमाशंकर मिश्र से बातचीत पर आधारित    

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