- सब अकेले जाते हैं, अकेला भी अकेले गये लेकिन वे समूह के मानस में हमेशा रहेंगे
बात तब की है,जब बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का ताजा—ताजी उभार हो रहा था. अपने खास अंदाज की वजह से मशहूर हो चुके थे. लालू प्रसाद के उभार के वक्त एक गाना बहुत मशहूर हुआ था— धन फुलवरिया, धन माई मरछिया, लालू हवे जिनके ललनवा कि जानेला जहनवा ए भइया… जबर्दस्त किस्म का गीत था. गीतों में और गीतों के समानांतर ही कलाकारों में रुचि बचपने से रही तो इस गीत के गायक के बारे में पता करना शुरू किया. मालूम हुआ कि अजीत अकेला का गीत है. पहली दफा पटना आया. पुनाईचक में रहने लगा. पटना पुनाईचक के चौराहे पर एक आयोजन हो रहा था. अजीत अकेला उसमें गाने आये थे. वे गाये— झामलाल बुढ़़वा पीटे कपार, हमरा करमवा में जोरू नहीं.
मैं तब इंटर की पढ़ाई करने पहली दफा पटना गया था. आयोजन देखने गया तो देखते—देखते स्टेज के पास गया. अजीत अकेला को एक चुटका भिजवा दिया. यह लिखकर कि आपसे आग्रह है कि लालूजी वाला गीत सुना दीजिए. अजीत अकेला मेरा नाम पूछे. स्टेज पर वे गाना गा चुके थे. फिर से माईक पकड़कर आये. मेरे नाम को बोलकर गीत सुनाये. अब आप समझ सकते हैं कि उस वक्त मेरी स्थिति कैसी होगी! पटना पहली बार गया था और नये—नये साथियों के साथ प्रोग्राम देखने गया था.स्टेज से अजीत अकेला जैसे कलाकार ने नाम लेकर कहा कि यह राजनीतिक मंच नहीं है फिर भी इस गीत को मैं गा रहा हूं कि क्योंकि मेरे बहुत ही प्रिय निरालाबाबू की फरमाइश है यह. एक तो स्टेज से मेरा नाम लिया उन्होंने तो समझिए कि हमारे साथी कैसे देख रहे होंगे मुझे और मुझमे गर्ववाली कैसी केसी फिलिंग आ रही होगी. सब साथी तो हमारी तरह ही थे. पहली बार पटना पहुंचे हुए. खैर! यह तो दूसरी बात थी. असल बात दूसरी थी, जो करेजे में जाकर बैठ गयी. वह बात थी अकेला भइया की अदा. वे जब बोले कि मेरे बहुत ही प्रिय तो लगा ओह रे ओह, इतना बड़ा कलाकार मुझे अपना बहुत प्रिय बोल रहा है. अकेलाजी का फैन बना रहा. बाद में जब पत्रकारिता की ट्रेनिंग का भी शहर पटना ही बना तो उन्हें खोजकर मिलने गया. बोले कि बताइये कैसे आना हुआ? बोले कि कोई काम नहीं, बहुत साल पहले आपने कहा था कि मेरे बहुत प्रिय तो सोचे कि अब हम कहें कि आप मेरे बहुत प्रिय हैं… उस बात—मुलाकात के बाद जो रिश्ता बना, वह बना रहा. मुलाकात अरसे बाद होती थी, साल भी गुजर जाते थे लेकिन रिश्ते की गरमाहट बढ़ती ही जा रही थी. आज जब यह खबर मिली कि अकेला भइया अब नहीं रहे, उनसे मुलाकात नहीं होगी, उनसे बात नहीं होगी तो मन कैसा कैसा तो हो रहा है. आखिरी बार बात तब हुई थी जब लालू प्रसाद यादव का एक प्रोफाइल लेख लिखते हुए उनके गाने—धन फुलवरिया को उद्धृत कर रहा था. उन्हें फोन मिलाया. बोला कि सुनाइयेगा भइया. उनका जवाब था. गाना सुनोगे तुम फोन पर! तुमसे तो बतियायेंगे भी नहीं अब. अनजान नंबर से किया है तो फोन उठा भी लिये अउर बतिया भी रहे हैं नहीं तो पुरनका नंबर से करता तो उठाते भी नहीं. एतना एतना दिन पर याद करोगे तो हम पहचाने से मना कर देंगे अउर देखेंगे तो मुंह फेर लेंगेे, न पहचानेंगे, न बोलेंगे—बतियायेंगे. यही सब सुनाते—सुनाते 20 मिनट बतिया लिये. हाल चाल से लेकर जितनी जरूरी बातें थी, सब हो गयी लेकिन एक ही वाक्य दुहराते रहे, तुम रे बाबू, गलती से तुम्हरा नंबर उठाये हैं, आओ तो बताते हैं तुमको. सामने रहोगे तो तिकवेंगे नहीं तोरा ओर. शिकायत भी इतने प्यार और अधिकार से करते थे कि बता नहीं सकता. सुबह से उनकी बहुत याद आ रही है. ठीक है भइया, जाइये, जहां भी गये होंगे आप वहां की दुनिया में भी आपके जाने भर से ही माहौल खुशनुमान हो जाएगा. अब तो क्या सामने और क्या फोन पर, बोलने—बतियाने, शिकायत करने… सबका रिश्ता ही टूट गया. अकेला भइया को प्रणाम है.अलविदा है.ईद के दिन गुजरे हैं, उन्हें जन्नत ही मिलेगी. लोककलाकारों को जीते जी उतनी ख्याति नहीं मिलती, जितनी ख्याति उनके चले जाने के बाद मिलती है. जब आकलन का दौर शुरू होता है. लोककलाकारों की विडंबना पर भिखारी ठाकुर ने लिखा था— अबहीं नाम भइल बा थोरा, जब ई छुट जाई तन मोरा. सेकरा बाद नाम होई जईहन. कव सज्जन मिल के गुण गईहन. यह बात भिखारी ठाकुर ने अपने लिए लिखी थी, यह बात बाद के भी कई कलाकारों पर लागू होती है. बिहार में बिहारीपन के गीत—संगीत को एक मुकाम दिलाने, स्थापित करवाने में जब कलाकारों की बात निकलेगी तो अकेला भइया का नाम उपरवाली सूची में होगा. वे जीवन भर बिहार को ही जीते रहे, बिहारीपन को ही फैलाते रहे. अपने सहज अंदाज में, ठेठ और मौलिक आवाज में.
सब अकेले जाते हैं, अकेला भी अकेले गये लेकिन वे समूह के मानस में हमेशा रहेंगे.

