जरूरी है मां का दूध बच्चे के लिए कहीं भी,कभी भी..

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स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए MAA प्रोग्राम का लांच किया है। सामने आया बेबी फूड कंपनियों के नापाक ईरादे ।

संतोष कुमार सिंह

नई दिल्ली : पिछले दिनों सोशल मीडिया पर बच्चों को स्तनपान कराती कुछ तस्वीरें वायरल हो रही थीं। एक तस्वीर में एक महिला जिसे बाईक से दुर्घटना के बाद बुरी तरह से पांव टूट जाने के बाद भी अपने बच्चे को स्तनपान कराते हुए ​देखा गया। वही सांसद विक्टोरिया डोंडा पेरेज अर्जेंटाइन नेशनल कांग्रेस की बैठक के दौरान अपने आठ महीने की बच्ची को स्तनपान करा रही थीं। ब्राज़ील के नेशनल एसेम्बली में बहस में भाग लेते हुए वहां की महिला सांसद अपने बच्चे को स्तनपान करा रहीं थी। इस घटनाओं ने इन्हें महिलाओं के बीच रोल मॉडल बना दिया है तथा घटना ने अपने बच्चे को पूरा वक्त देने वाली महिला के रूप को भी दिखाया है, जो अपने काम, अपनी पीड़ा छुपाकर भी बच्चे को स्तन पान करा रही थीं। आपने भी गाहे—बगाहे ट्रेन में बस में सफर करते महिलाओं को स्तनपान कराते देखा होगा। मां बिना इस बात की परवाह किये हुए कि उसे कोई देख रहा है, अपने बच्चों का भूख मिटाती है, बल्कि उसे बीमारियों से जीवन पर्यन्त लड़ने की क्षमता देती है।

blur iमां के दूध का बच्चों का ​इतना फायदा होने के बावजूद भारत में जन्म के एक घंटे के भीतर और छह माह तक स्तनपान करानेवाली महिलाओं की संख्या करीब आधी ही है. स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार सरकारी अस्पतालों में 80 प्रतिशत प्रसव के बावजूद मात्र 45 फीसदी ही महिलाएं अपने नवजातों को स्तनपान कराती हैं। देश में हर साल मरने वाले 13 फीसदी बच्चों की मौत का कारण स्तनपान नहीं कराना है। अगर महिलाएं शुरुआती 6 महीने तक बच्चों को स्तनपान कराएं तो देश में सालाना 1.56 लाख बच्चों को मरने से बचाया जा सकता है। अस्पताल में जन्म लेने वाले मात्र 45 फीसदी बच्चों को जन्म के पहले घंटे में विशिष्ट स्तनपान कराया जाता हो तो इस आंकड़े को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है।

इस स्थिति के सामाजिक-सांस्कृतिक कारण भी हैं और हमारी स्वास्थ्य प्रणाली में भी कुछ समस्याएं हैं। सामाजिक संदर्भ में, रिश्तेदारों की सलाह और कुछ रीति-रिवाज स्तनपान के मातृ आत्मविश्वास या चिकित्सकीय लाभों को किनारे कर देते हैं। नतीजा, माताएं देखभाल के निर्देशों का पालन नहीं करती हैं।  भारत सहित दुनिया के कई देशों में माताओं में बच्चों को स्तन पान न कराने के फायदे और समाज में फैली भ्रांतियों एव बाजार में उपलब्ध मां के दूध के बदले डिब्बा बंद आहार का प्रचार—प्रसार की वजह से भी ऐसे आंकड़े सामने आ रहे हैं।

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केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर एक प्रमख कार्यक्रम MAA (मदर्स एब्ज़ोल्यूट अफेक्शन) का लांच किया गया है। इस कार्यक्रम के अंर्तगत न सिर्फ माताओं को विशिष्ट स्तनपान के फायदे और इसके परिणाम स्वरूप बीमारियों से बचाव के विषय में जानकारी दी जाएगी बल्कि साथ ही साथ उन्हें प्रोत्साहित भी किया जाएगा। इनको प्रोत्साहित करने के लिए आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता न सिर्फ माताओं को स्तनपान के लिए प्रोत्साहित करेंगी द्वारा परिवारों और समुदायों को भी इस विषय पर प्रमुखता से जागरूक किया जायेगा ।

इस कार्यक्रम के अंर्तगत न सिर्फ माताओं को विशिष्ट स्तनपान के फायदे और इसके परिणाम स्वरूप बीमारियों से बचाव के विषय में जानकारी दी जाएगी बल्कि साथ ही साथ उन्हें प्रोत्साहित भी किया जाएगा।

अभी तक इस बात को लेकर भी भ्रम की स्थिति है कि एक तरफ हम यह तो मानते हैं कि देश में कुपोषण का फैलाव है लेकिन जैसे ही बच्चों को खान पान और पोषण को एक दूसरे के साथ जोड़ कर देखने की बात आती है, हम आमराय नहीं बना पाते। बच्चों के खान-पान के मसलों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य का पूरा ध्यान होना चाहिए, क्योंकि इससे रोगों के प्रतिरोध, शिशु मृत्यु दर रोकने तथा बच्चे के विकास में मदद मिल सकती है। इस कार्यक्रम के अंर्तगत इन बातों को भी शामिल किया जाएगा।

मातृअवकाश की अवधी बढ़ी

कई बार यह भी तथ्य सामने आये हैं कि वैसी मातायें जो कामकाजी है वे अपने नवजात शिशु को विशिष्ट स्तनपान नहीं करा पाती थीं। नवजात शिशु की माता को समुचित मातृ अवकाश नहीं मिलता था। महिला बाल विकास मंत्रालय ने नवजातों को सिर्फ मां का दूध उपलब्ध कराने को प्रोत्साहन देने के लिए मौजूदा 3 महीने की मेटरनल लीव को बढ़ाकर 6 महीने कर दिया है। अब तक कामकाजी महिलाओं को गर्भवती होने पर मात्र तीन महीने (12 हफ्तों) की ही मेटरनल लीव मिल पाती थी। संसद के मानसून सत्र में यह बिल पारित कर दिया गया। महिलाओं को प्रसव के लिए 26 हफ्ते की छुट्टी मिलेगी।

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बेबी फूड कंपनियों के नापाक ईरादे

एक दैनिक अखबार में छपी खबर के मुताबिक कंपनियों द्वारा “मां” कार्यक्रम को विफल करने का प्रयास शुरू कर दिए गए हैं। ऐसी ही एक प्रमुख कंपनी ने देशभर के अस्पतालों में सीधे जच्चा-बच्चा वार्ड में पैठ बनाने का अभियान शुरू किया है। इसके तहत इसने अस्पतालों को पत्र लिख कर मुफ्त में स्तनपान कक्ष बनाने की पेशकश की है। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने इस अभियान को ना सिर्फ अनैतिक बल्कि गैर कानूनी भी करार दिया है। अखबार का दावा है कि उसके पास कंपनी द्वारा अस्पतालों को लिखे गये पत्र की कॉपी मौजूद है।

स्तनपान प्रोत्साहन कार्यकर्ता एवं बीपीएनआई के संस्थापक डॉ अरूण गुप्ता के मुताबिक,” सामान्य विवेक से भी समझा जा सकता है कि बेबी फूड कंपनी अस्पताल में क्यों दाखिल होना चाहती है। अस्पतालों की तरफ से यह प्रस्ताव स्वीकार करना न सिर्फ अनैतिक होगा बल्कि गैर कानूनी भी।

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