अपराजिता संतोष
रांची/अनगड़ा: चुनाव में अच्छे दिन की शोर और स्वच्छता के नारे व दावे के साथ आई सरकार के बावजूद जमीन पर कुछ उतरता नहीं दिख रहा। यदि ऐसा होता तो आज भी दो गांवो के लोगों को चुआं माने छोटे से कुएं से पानी निकाल कर गुजर बसर नहीं करना परता। आजादी के 68 साल बाद भी रांची के अनगड़ा ब्लॉक में बीसा पंचायत के बेंती चट्टान टोली और करम टोली के 60 परिवार के करीब तीन सौ लोगों की पेयजल की समस्या इसी चुआं से दूर होती है। वे न सिर्फ खुद के पीने के लिए बल्कि मवेशियों के लिए पानी, घर के उपयोग के लिए, बर्तन, कपड़ा धोने और नहाने के लिए इसी चुआं का इस्तेमाल करते हैं। गौर तलब है की ये दोनों गांवों में मुंडा जनजाति के लोग रहते हैं।
झारखण्ड में पंचायत चुनाव शुरू होने वाले हैं, यहाँ तक की आगामी 15 नवंबर को झारखंड राज्य के गठन के 15 साल भी पूरे होने वाले हैं, लेकिन इस सवाल का जवाब शायद किसी के पास न हो की आखिर इन गाँव को पानी क्यों नहीं मिल रहा ।
क्या है हालात
ऐसा नहीं है की चुआं के अलावा गाँव में पेयजल के साधन नहीं हैं. गाँव में तीन चापाकल है जिसमे दो ख़राब है। वर्षों से ख़राब पडे हैं । बीसा की मुखिया सुषमा देवी कहती हैं कि कई बार गांवों के खराब चापाकलों को बनाया गया। लेकिन जलस्तर नीचे होने के कारण खराब हो जाता है।
पानी भरने के लिए नियम
ग्रामीणों ने चुआं से पानी भरने के कुछ नियम तय कर रखे हैं। पानी निकालने के लिए बाल्टी का प्रयोग नहीं किया जा सकता है। पानी सिर्फ डेगची (अल्मुनियम का बर्तन) से निकाला जाता है। डेगची को चुआं में डूबाने से पूर्व नीचे बह रहे पानी से धोया जाता है। ग्रामीण इसमें ब्लीचिंग पाउडर डालते हैं। कई बार गांवों के खराब चापाकलों को बनाया गया। लेकिन जलस्तर नीचे होने के कारण खराब हो जाता है। एक सप्ताह के अंदर चुआं के सौंदर्यीकरण का काम शुरू कर दिया जाएगा।
अन्य गाँव में भी पेयजल की समस्या
ऐसा नहीं है कि पेयजल की समस्या सिर्फ इसी गांव की है। झारखंड के जिस भी इलाके में नजर दौरायें ग्रामीण ईलाकों में पेयजल की बड़ी समस्या है। लोहरदग्गा के भंडरा पंचायत क्षेत्र के भीठा पंचायत के ग्रामीण भी पेयजल की समस्या से ग्रस्त हैं। गांव की महिलाओं को पानी की जरूरतों की पूर्ति कुएं या तालाब करनी पड़ती है। जल सहिया के माध्यम से पंचायतों में पेयजल की समस्या की कोशिश हो रही है।
विश्व बैंक भी दे रहा है मदद
इसके साथ ही विश्व बैंक ने पेयजल व स्वच्छता के लिए झारखंड को पहली बार चुना है। इसके लिए प्रदेश को 6 वर्षो के अंदर 950 करोड़ रुपये की राशि दी गयी है ।विश्व बैंक की इस योजना पर 2013 से काम शुरू हो गया है। इस योजना के अंतर्गत अधिकतर छोटे काम पंचायत स्तर पर किये जाने हैं। गांव के लिए ग्राम जल स्वच्छता समिति ही टेंडर जारी करने का अधिकार गया है ।
कई गाँव के पानी में रासायनिक तत्त्व
कई गांवों के पानी में फ्लोराइड, आर्सेनिक आदि तत्व हैं। गढ.वा व पलामू के जल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है। जबकि आर्सेनिक प्रभवित जिला साहिबगंज और पाकुड़ है. पाकुड़, पलामू और गढ.वा के लिए कई योजनाएं चल रही हैं. साहिबगंज, गढ.वा व पलामू के लिए 163 सौर ऊर्जा से संचालित योजनाएं चल रही हैं.
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फोटो व इनपुट: दैनिक भाष्कर
