हंस चुनेगा दाना, कौवा मोती खायेगा

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yogendra photo_nअनुशक्ति सिंह, युवा पत्रकार

कहते हैं भारत विषमताओं में समता का देश है… सहिये कहते हैं, देखिये ज़रा एक रस्सी को पुल बनाकर ये कैसे ये बच्चे शिक्षा के प्रति अपनी जागरूकता का एक जाबांजी भरा नमूना पेश कर रहे हैं और वहीँ हमारे बिहार में भी एक ‘रस्सी’ का खेल हो रहा है. रस्सी का नहीं, ‘रस्साकस्सी’ का कहेंगे तो ज्यादा उपयुक्त होगा. अगड़े और पिछड़े की लड़ाई का स्वयंभू प्रदर्शक बन कर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, केंद्र के पूर्व रेल मंत्री, बिहार में सामजिक चेतना के कथित अगुआ और चारा घोटाले के मुख्य आरोपियों में से एक ‘लालू प्रसाद यादव जी’ ने अपने दसवी फेल ( इसको नवीं पास पढ़ें) पुत्र को विधानसभा पहुंचाने के लिए रस्सी का एक सिरा खूब जोर से पकड़ रखा है जबकि इसका दूसरा छोड़ बाकी विरोधियो के हाथ में है जो लालू की सामाजिक चेतना, पुत्र की उच्च शिक्षा और उनके बेलगाम संवादों का बल हाथ में लेकर लालू जी को चित्त पछाड़ने में लगे पड़े हैं.

एक तरफ उड़ीसा के कंधमाल जिले के ये बच्चे हैं जो एक अदद पुल के लिए तरसते हुए, खतरों से खेलते हुए शिक्षा की सीढियां पार करना चाहते हैं. इन बच्चों को न किसी नेता के भुलावों की ज़रूरत है न ही अनुच्छेद २१ के आरटीई, २००९ जैसे अधिनियम की, जो 14 साल की उम्र तक वाले बच्चों को नि:शुल्‍क और अनिवार्य संतोषजनक और एकसमान गुणवत्‍ता वाली पूर्णकालिक प्रांरभिक शिक्षा का अधिकार देता है. शिक्षा इनके लिए एक जंग का मैदान है जिसे ये हर कीमत पर हासिल करने को तैयार हैं, भले ही वो कीमत ‘रस्सी का पुल’ हो या फिर ‘मिड-डे मील में पड़ी छिपकली. और दूसरी तरफ हमारे भूतपूर्व मुख्यमंत्री जोड़ी की संतान है जो सुविधाओं के पालने में पल कर भी नवीं से आगे नहीं बढ़ पायी… वैसे इन बच्चों का भविष्य क्या होगा ये तो पता नहीं है लेकिन हमारे यहाँ कुछ नेताओं की पौध का भविष्य उनके पिता के ताजपोशी के साथ ही तय हो जाता है. अब ये पौध आगे चल कर फलदार वृक्ष बने या एक ठूंठ, इसे सींचना जनता की बाध्यता हो जाती है.

अगर बिहार के राजनितिक परिदृश्य का सही से अवलोकन किया जाए तो बहुतेरे नेता/नेत्री पुत्र-पुत्री जंग-इ-मैदान में हैं और अपनी किस्मत (माफ कीजियेगा, ज़्यादातर मामलो में मामला किस्मत का नहीं बाहुबल और धनबल का रह जाता है) आजमाने के लिए तैयार खड़े हैं. बहुत बार जनता इन्हें नया खून मान कर इन पर यकीन भी करती है लेकिन बड़ा सवाल ये रह जाता है कि क्या बिहार एक ९वीं पास उमीदवार, जिसके पास शिक्षा के सारे संसाधन मौजूद थे, से विकास की उम्मीद लगा सकती है?

 

 

 

 

 

 

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