
एक बार फिर गांव ककनार से बड़े स्कूल जाने के लिए मेरा बक्सा,बिस्तर, चूड़ा, गुड़,लाई आदि सब कुछ तैयार कर कांवर तैयार की गई। पर आठवीं की बोर्ड परीक्षा वाली कांवर से यह काफी अलग थी। इस तैयारी से मुझे समझ में आने लगा कि मेरा अब इस प्यारे गांव से विधिवत निष्कासन हो रहा है।
गांव छोड़ने का दुख तो था ही पर एक और भय सता रहा था कि इस बार वाली कांवर काफी भारी थी, इसे ढोना मेरे लिए असंभव ही था। परीक्षा के लिए दरभा यात्रा में तो मुझे मेरे तारणहार बलराम भाई मिल गए थे पर इस बार अगर कहीं दादाजी ने तुगलकी आदेश सुना दिया कि अपना सामान खुद उठाओ और लेकर जाओ तो कैसे निभेगी। पर इस बार भी मेरे ग्रह नक्षत्र ठीक थे, दादाजी ने कांवर ढोने में मेरे सहयोग हेतु ,हमारे खेती के कार्यों में हाथ बंटाने वाले वाले भाई मंगलू को मेरे साथ कर दिया। भाई मंगलू नाटे कद के मजबूत कद काठी के थे और मुझसे लगभग 7-8 साल बड़े भी थे। भारी से भारी कांवर लेकर सरपट दौड़ने में पूरे गांव में उनकी जोड़ का कोई नहीं था।


सुबह तड़के हमेशा की तरह दादाजी ने लाठी कोंचकर जगाया, तत्काल कुर्ती से उठा क्योंकि दादाजी के लाठी कोंचने पर तत्काल ना उठने पर दूसरे चरण में तत्काल भीषणपद प्रहार झेलना पड़ता था। दादाजी खड़ाऊ पहनते थे, सो उनकी लात बड़ी घातक होती थी, सही सटीक पड़ गई तो कई दिनों तक कसकती थी। पर मैं सधे हुए घोड़े की तरह लाठी की पहली कोंच पर ही दन्न से उठ खड़ा हुआ। झटपट तैयार हुआ। उधर अम्मा चाचियों का रुदन शुरू हो गया था, मानो बेटा 25 किलोमीटर दूर स्कूल में पढ़ने नहीं जा रहा है, बल्कि देश की सीमा पर युद्ध लड़ने जा रहा हो। बिना पूरा माजरा समझे छोटी बहनें भी सुर में सुर मिला रही थीं। माहौल बेहद गमगीन था,माहौल का असर मुझ पर भी पड़ना लाजिमी था, सबको रोता देख मैं भी सुबकने लगा। विदाई की बेला आई, अम्मा ने सबकी नजर बचाकर ₹5 का नोट मेरी हथेली में सरका दिया, और मैं बुक्का फाड़कर रो उठा।
दूर खटिया पर बैठे दादाजी ने जोर से डपटा और कहा, ई सब रोने धोने का तमाशा बंद करो यह कोई लड़ाई के मैदान नहीं जा रहे पढ़ने जा रहे हैं। आगे पढ़ेंगा लिखेगा नहीं तो अपने इन्हीं आदिवासी साथियों के साथ तीर धनुही लेकर पूरी जिंदगी इन्ही जंगलों में घूमते फिरेंगा। आधा से ज्यादा आदिवासी तो यह बन ही गया है, कुछ दिन और रहे तो इसका पूरा बंटाधार होना तय समझो। सबने यह समझा या नहीं यह तो मुझे नहीं पता किंतु पर इसका तत्काल असर दिखा। सबकी रूलाई थमी तो नहीं पर रूदन स्वर सप्तम से सीधे मध्यम पर आ गया। मंगलू को दादाजी का इशारा मिला, उसने लपक कर कांवर उठाई, मेरी ओर देखा और सपाटे से घर से निकल लिया , उनके पीछे पीछे मैं भी चल पड़ा। कांवर उठाए मंगलू दुलकी चाल में, अर्थात दौड़ने और चलने की बीच की स्थिति में तेजी चल रहे थे, मैं भी उनके पीछे कदम घसीटते हुए चल पड़ा। जल्दी ही गांव पीछे छूट गया और हम बुरुंगपाल के जंगल में प्रवेश कर गए। कांवर के साथ पैदल 20 किलोमीटर का सफर के बीच जंगल में एक नाले के किनारे आधा घंटा रुक कर, हमने साथ में लाया भोजन मिल बांट कर खाया मुझे आज भी याद है मंगलू अपने घर से जंगली मशरूम की सब्जी लेकर आया था। खाना खाकर नाले के बहते कांच की तरह पारदर्शी और चमकते निर्मल जल को जी भर पीकर प्यास बुझाई और मुंह, हाथ पैर धोकर ताजा होकर हम फिर चल पड़े शहर की ओर। शहर, नये स्कूल, हास्टल तथा आने वाले दिनों को लेकर उत्सुकता और रोमांच के साथ ही एक अनजाना सा भय भी लग रहा था। मन पीछे अपने गांव की ओर भाग रहा था और कदम शहर की ओर दौड़ रहे थे। इस तरह मैं आगे पढ़ने के लिए मै अपने प्यारे गांव ककनार को वक्ती तौर पर छोड़कर जगदलपुर शहर पहुंच गया। तत्कालीन जगदलपुर के स्कूली दिनों की कहानी फिर कभी।

अभी कहानी में अल्पविराम लगाने से पहले, मैं मेरे गांव की वर्तमान स्थिति की एक झलक भी आप लोगों को दिखाना चाहूंगा। मेरा गांव लगभग 16 सालों तक तो लगभग जस का तस ही रहा। सन 82 के बाद हालात कुछ बेहतर होने शुरू हुए। राजीव गांधी के काल में हमारे गांव में कई प्रयासों के बाद सरकार ने एक बोर खुदवाया, जिस में हैंडपंप लगाया गया। हालांकि यहां भी पानी भरने के लिए पारी लगाना पड़ता था पर पहले वाले संकट के मुकाबले तकलीफ अब काफी कम हो गई। कालांतर में हमने घर में ही है नलकूप खुद वाया और गांव में भी कई सरकारी नलकूप लग गए। हमारा मिट्टी का प्राथमिक स्कूल मेरे हाई स्कूल पढ़ने के दरमियान ही पूरा गिर गया था। गांव वालों ने चंदा इकट्ठा कर ईंटों का एक छोटा सा स्कूल बनवाया, कई सालों तक जिसका पलस्तर नहीं चढ़ाया जा सका। बाद में सरकार की ओर से स्कूल तथा आदिवासी छात्रावास भी खोल दिया गया है। अब शिक्षकों के भी कुछ क्वाटर बन गए हैं। कई दशकों से रोते कलपने के बाद, आखिरकार अभी हाल में इस गांव को राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ने ववाली 7 किलोमीटर की पगडंडी अब मोटिया कर पक्की सड़क बन गई है। इधर सड़कों में भ्रष्टाचार का यह आलम है की एक ही बरसात में सड़क की हालत ऐसी उजड़ा चमन हो जाती है कि हम पुराने दिनों वाली अपनी कच्ची पगडंडियों की याद में आंसू बहाने लगते हैं। गांव में कुछेक घर पक्के भी हो गए हैं पर गांव की गलियां आज भी वैसे ही बरसात में कीचड़ से बजबजाती रहती हैं। मेरे स्कूल के दिनों में हमारे तीनों गांवों में मिलाकर 5 साइकिलें थी आज लगभग हर घर में मोटरसाइकिल है। कुछेक घरों में चौपाए वाहन भी आ गए हैं। बिजली आ गई है पर स्ट्रीट लाइट नहीं लगी है। शाम 8:00 बजे के बाद यह गांव आज भी अंधेरे की चादर ओढ़ कर सो जाता है। कुछेक घरों के भीतर में भले ही टीवी मोबाइल के चलते कुछ हलचल रहे पर अंधेरी गलियां एकदम सूनी हो जाती है। गाहे-बगाहे सड़क से कोई मोटरसाइकिल गुजर जाती है तो लगता है कि हां, गांव अभी जिंदा है। गांव के पुराने खेल बाटी, पिटरूल, कबड्डी ,खो-खो, बाराडांडी, कोड़ाबदाम शाही के बारे में यह पीढ़ी जानती ही नहीं। इन आदिवासी गांवों के सारे लड़के लड़की आधुनिकतम फैशन को अपनाए हुए हैं। अमेरिकन कट बाल कटाकर , बालों को बाकायदा सुनहला लाल रंगे हुए, जींस स्पोर्ट शूज में सजे-धजे मोटरसाइकिल पर कानों में ईयर प्लग ठूंसे मेरे गांव की गलियों में दुबले पतले कुपोषण के शिकार से दिखते आदिवासी नवयुवकों को देखकर यह कल्पना करना भी दूभर है कि अभी कुछ दशकों पूर्व ही इस गांव किन्ही गलियों में हाथों में तीर धनुष लिए तथा कंधों पर टंगिया यानी कुल्हाड़ी लटकाए पारंपरिक छोटी धोती में मजबूत युवा दिखाई देते थे।

सरकारों की वोटों की राजनीति के चलते, जो भी आदिवासी परिवार जितना जंगल काटता है, उसे उतनी वन भूमि का “वन भूमि अधिकार पट्टा” दे दिया जाता है, इस भस्मासुरी नीति के चलते हमारे गांव के चारों ओर के सारे जंगल सफाचट हो गए। जंगली जानवर अब किस्से कहानियों में ही बचे हैं। पहले गांव के लोग बीमार पड़ने पर स्थानीय परंपरागत आदिवासी सिरहा बैगा गुनिया जड़ी बूटियों के साथ ग्राम देवी का आशीर्वाद मिलाकर इलाज कर देते थे। अब ना जंगल बचे हैं ना जड़ी बूटियां बचीं हैं और ना ही इलाज करने वाले बैगा गुनिया। अब तो सर्दी जुखाम होने पर भी या तो झोलाछाप डॉक्टर से सूजी यानी की इंजेक्शन लगवाकर इलाज़ होता है, या फिर लोग अस्पताल की ओर दौड़ते हैं। गांवों के लोग जड़ी बूटी से पूरी तरह दूर हो गए हैं,अब वो जड़ी बूटियां शहरवासियों की पहली पसंद बन गई हैं। समय के रुख को पहचानने वाले बाबा रामदेव जैसों की कंपनियां नगर वासियों की नब्ज पकड़ जड़ी बूटियों के उत्पाद बेचकर कंचन चर रहे हैं।
गांव की देवी की एक कमरे वाली खपरैल वाली देवगुडी अब पक्की हो गई है। मेरी पांचवी कक्षा के बैच के बाल सखाओं में मेरे अलावा सबसे ज्यादा उन्नति करने और सबसे बड़े पद पर पहुंचने वाले मेरे परम मित्र शम्भूनाथ स्थानीय सहकारी बैंक में चपरासी हो गए थे, सारी उम्र चपरासी ही रहे । मुझसे उम्र में बड़े थे, अभी हाल में वह चपरासी ही रिटायर हो गए। जो भी पैसा कौड़ी जोड़ा था, उससे एक पक्का मकान बनवाया और उसी के साथ धान कूटने की हालर मिल लगाई है। मेरे घर के पास ही रहने वाले मेरे दूसरे मित्र नरसिंग कश्यप सरकारी आदिवासी छात्रावास में चपरासी की नौकरी में लगे थे, पर लगभग 15 साल पहले ही उनका देहांत हो गया। मेरा और एक बाल सखा मित्र समदू बघेल काफी गरीब थे, बचपन में ही पिता नहीं थे माता ने पांचवी तक पढ़ाया था। वह ईसाई हो गये हैं, और किसी तरह अपने जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। हम पांचों साथियों में सबसे चतुर साथी भक्कू राम बघेल के पिता गांव के कोटवार थे उसे पिता के मरते ही कोटवारी मिल गई, कोटवारी के साथ ही सहज शराब मिलने का जुगाड़ भी हो गया। साथ ही गांव की देवी गुड़ी की देवी माता का भाव भी उसे आने लगा। आज वह गांव के कोटवार के साथ ही गांव की देवी माता का पुजारी भी है। जब भी गांव जाता हूं और मुलाकात होती है, तो मैंने उसे हमेशा मस्त पाया है।

अब जब गांव जाता हूं तो पहले जैसा कुछ भी नहीं पाता। बस सड़क के दोनों ओर के बचे कुचे खेत आज भी हरे-भरे दिखते हैं। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि ये खेत अब पहले से भी ज्यादा हरे भरे दिखाई देते हैं, शायद दिनोंदिन खेतों में डाली जा रही है यूरिया की ज्यादा मात्रा के कारण। रोज सुबह 9-10 बजे युवाओं की फौज मोटरसाइकिल पर 20-25 किलोमीटर दूर शहर की ओर दौड़ती है जो रात को लौटते हैं। दुख की बात यह है कि इनमें से ज़्यादातर मद्यपान करना भी सीख गए हैं। राज्य सरकार की आकर्षक और आक्रामक शराब नीति भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। सरकार खुद ही शराब बेच रही है।
शराब की बिक्री महंगाई को कोसों पीछे छोड़ दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ते जा रही है। अब सरकार बेचारी भी क्या करे, समूची सरकार का खर्चा ही शराब बेच कर निकल रहा है। सरकार का कमाऊ पूत शराब है, और आज मेरे गांवों के कमाऊ पूतों का सबसे बड़ा दोस्त,,, पर असल में सबसे बड़ा दुश्मन भी शराब ही है।
अब भी लगभग हर हफ्ते अपने गांव जाता हूं, मेरे बचपन के समय के कुछेक पेड़ आज भी बचे हैं, जिनमें मुझे मेरे गांव का कुछ अक्स दिखाई देता है, पर अपने उस पुराने गांव से अब मेरी भेंट, बातचीत नहीं होती। मेरा गांव शहर बनने को व्याकुल है, और मैं शहर बनने की होड़ में लगे लाखों गांवों की भीड़ में खो गए, अपने उस एक अदद गांव “ककनार” से मिलने को व्याकुल हूं।
काश कोई मेरे बचपन के साथ मेरा वो खोया गांव मुझे लौटा देता।



