“बढ़ती हुई आबादी चिंता का विषय है और समाज का हर छोटा—सा वर्ग जो अपने परिवारों को छोटे रखता है, वह सम्मान का हकदार है। वे जो कर रहे हैं वह देशभक्ति का एक कार्य है,” जनसंख्या विस्फोट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इन शब्दों ने देश में जनसंख्या पर बहस को एकबार पुन: प्रारंभ कर दिया है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में इसका उल्लेख किया।
जबकि देखा जाए तो देश में नयी सहस्राब्दी की शुरुआत से ही प्रजनन दर में 23 प्रतिशत की कमी देखी गयी है, फिर भी कुछ राज्य जनसंख्या ऐसे है जहां प्रजनन दर में विशेष गिरावट नहीं आयी है।
नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) के नवीनतम आंकड़ों बताते है कि बिहार राज्य में सबसे अधिक रफ्तार से प्रजनन दर (टीएफआर) बढ़ी है। इसका मतलब यह है कि औसतन, बिहार की एक महिला को किसी भी अन्य राज्य में महिलाओं की तुलना में अधिक बच्चों को जन्म देने की संभावना है।
टीएफआर, सरल शब्दों में, उन बच्चों की संख्या को मापता है, जिनको एक महिला द्वारा जन्म देने की संभावना होती है। बिहार में 15-49 वर्ष की महिलाओं में टीएफआर दर 3.4 थी, जो भारत में सबसे अधिक है। भारत के संदर्भ में एनएफएचएस—4(2015-16) के अनुसार टीआरएफ दर 2.18 रही।
प्रजनन की दृष्टि से, बिहार के पीछे मेघालय (3.04), उत्तर प्रदेश (2.74), नागालैंड (2.74), मणिपुर (2.61) और झारखंड (2.55) है। अन्य सभी राज्यों में यह टीआरएफ दर 2.5 से नीचे था।
साल 1998-99 और 2015-16 के बीच, भारत में टीएफआर दर में 23 प्रतिशत की गिरावट आई, जबकि बिहार में इसी दौरान यह गिरावट 7.8 प्रतिशत रही, यह रफ्तार राष्ट्रीय औसत से तीन गुना धीमी थी।
एनएफएचएस के आंकड़ों से पता चला है कि जो महिलाएं उच्च आय वर्ग से आती है, अधिक शिक्षित हैं एवं शहरी क्षेत्रों में रहती हैं, वे परिवार नियोजन के तरीकों को अपनाती अधिक अपनाती हैं।
रिजर्व बैंक के आंकड़ों (2011-12) के अनुसार, बिहार की 33.71 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे रहती है। बिहार भी एक ऐसा राज्य है जहाँ प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है।
एनएफएचएस-4 (2015-16) के आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य की 22.8 फीसदी महिलाएं ने 10 वर्ष से ज्यादा की स्कूली शिक्षा पूरी नहीं की है। वहीं 15-49 वर्ष की लगभग आधी महिलाएं कभी भी स्कूल नहीं गईं।
ऐसे में यह स्वाभाविक है कि बिहार राज्य में परिवार नियोजन को लेकर महिलाओं में उतना उत्साह नहीं दिखता है। बिहार में ऐसी महिलाओं की संख्या में 10 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज देखी गई है, जो किसी भी परिवार नियोजन पद्धति का उपयोग नहीं कर रही थीं।
राज्य में 76 प्रतिशत से अधिक विवाहित महिलाएं (15-49 वर्ष की आयु) किसी भी परिवार नियोजन पद्धति का उपयोग नहीं कर रही थीं। साल 2005-06 में गर्भ निरोधकों का उपयोग नहीं करने वाली महिलाओं की संख्या 65.9 प्रतिशत थी।
महिलाओं की दृष्टि से परिवार नियोजन के सबसे सामान्य उपायों में नसबंदी, जिसको 23.5 प्रतिशत उत्तरदाताओं महिलाओं द्वारा अपनाया गया है। परिवार नियोजन की एक विधि के रूप में कंडोम का उपयोग करने वाले उत्तरदाताओं पुरूषों का प्रतिशत मुश्किल से 1 प्रतिशत रहा।
समग्र रुझान से पता चलता है कि भारत में किसी भी प्रकार की परिवार नियोजन पद्धति को अपनाने वाली महिलाओं की संख्या में 6.4 प्रतिशत की गिरावट आई है। मुश्किल से आठ राज्य ऐसे थे जहाँ परिवार नियोजन के तरीके को अपनाने वाली महिलाओं का प्रतिशत बढ़ा था। जिसमें पंजाब (12.5%), राजस्थान (12.5%), ओडिशा (7.2%), झारखंड (4.6%), छत्तीसगढ़ (4.5%), उत्तर प्रदेश (1.9%), आंध्र प्रदेश (1.9%) और हरियाणा (0.82%) ) शामिल है। वहीं देश के 22 राज्यों ऐसे भी रहे जहां परिवार नियोजन की किसी भी विधि को अपनाने वालों की संख्या में कमी आयी है।
