मंडी। सुंदरनगर उपमंडल की चांबी पंचायत के द्रमण गांव के 15 परिवार चीड़ की पत्तियों से धुआं रहित कोयला तैयार कर आजीविका कमा रहे हैं। इससे सीजन में हर परिवार करीब पंद्रह हजार की आमदनी कर रहा है।
सरकार ने चांबी पंचायत के लोगों को प्रशिक्षण के साथ नि:शुल्क मोल्डिंग मशीन भी दी है। स्थानीय निवासी सावित्री देवी ने बताया कि उनके गांव के पास चीड़ के जंगल हैं। गर्मियों के दौरान चीड़ की पत्तियों से जंगल जल जाते हैं। सरकार ने उन्हें पत्तियोें से धुआं रहित कोयला तैयार करने के लिए प्रेरित किया है। इससे अच्छी आमदनी के साथ वनों को भी जलने का खतरा कम हो गया है। इससे वन्य प्राणियों को भी राहत मिली है।
युवक श्रवण कुमार ने कहा कि चीड़ की पत्तियों से धुआं रहित कोयला तैयार करने के लिए सरकार की ओर से प्रशिक्षण हासिल किया है। इसके लिए अन्य ग्रामीणों को भी प्रेरित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ढाबों, रेस्तरां आदि के कारोबार से जुड़े लोग धुआं रहित कोयला उनके गांव से ही खरीद कर रहे हैं। उनके द्वारा तैयार कोयले की क्षेत्र में काफी मांग है। उनके गांव से ही एक सीजन में दो से तीन लाख का धुआं रहित कोयला तैयार हो रहा है।
इस तरह तैयार होता है धुआं रहित कोयला
चीड़ की पत्तियों से धुआं कोयला तैयार करने से पहले पत्तियों को विशेष ड्रम के अंदर कम आक्सीजन में जलाया जाता है। तारकोल जैसे रूप में परिवर्तित होने पर इसमें लगभग 10 प्रतिशत चिकनी मिट्टी के घोल से आटे की तरह गूंथा जाता है। इस मिश्रण को मोल्डिंग मशीन में डालकर कोयला बनाया जाता है।
चीड़ की पत्तियों के उपयोग से फायदे
हिमाचल में चीड़ वनों की बहुतायत है। इनका क्षेत्रफल लगातार बढ़ रहा है। गर्मियों में चीड़ की पत्तियां आग का मुख्य कारण रहे हैं। अनुमान के मुताबिक हर वर्ष सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र में चीड़ की पत्तियों के कारण जल जाता है। जमीन के नमी सोखने के कारण चीड़ के ईद-गिर्द दूसरे पेड़-पौधे नहीं उग पाते हैं। इसे पहाड़ों में पेयजल संकट के लिए भी इसे जिम्मेदार माना जाता है। चीड़ की पत्तियों से धुआं रहित कोयला तैयार होने से ग्रामीणों को आमदनी के साधन मिलता है और लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर भी नहीं पड़ता।
