धर्मेन्द्र की उम्र 21 साल भी नहीं हुई थी। 13 जनवरी से कैंसर से मारा गया। उसके कई अंगों में कैंसर फैल गया था। कैंसर का पता चलने के करीब चार महीने बाद कोलकत्ता के पीजीआई अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मां मीना देवी के सिर पर बालों के बीच करीब दो साल से एक फोड़ा हो गया है। पहले इससे कोई परेषानी नहीं थी। अब इससे खून झलक रहा है। हाथ और पैर के नाखून पीले पड़ जाते हैं, फिर गिर जाते हैं। धर्मेन्द्र के पिता अर्थात रामकुमार यादव स्वयं लगातार सरदर्द, शरीरदर्द से परेशान हैं। सिर्फ बैठे रहने का मन करता है। पर बैठे रहने से कैसे चलेगा? मजदूर आदमी हैं। पेट भरने के लिए दैनिक मजदूरी का आसरा है।
उनका गांव ‘तिलक राय का हाता’ बक्सर जिले के सिमरी प्रखंड में गंगा के तट पर है। भूजल में आर्सेनिक की वजह से बिहार के जिन गांवों में कैंसर फैल रहा है, उनमें यह गांव भी है। यहां के अधिकांश निवासियों में आर्सेनिकोसिस के लक्षण दिखते हैं। कैंसर समेत कई जानलेवा बीमारियों के मरीज पाए गए हैं। पर लोगों को जहरीले पानी के प्रकोप से बचाने का कोई इंतजाम नहीं हुआ। प्रभावित चापाकल को बंद भी नहीं किया गया। नए चापाकल और नलकूप लगाने पर रोक नहीं लगी। आर्सेनिकोसिस के शिकार गरीब लोग ठीक से इलाज भी नहीं करा पाते।
धर्मेन्द्र के बाद 25 वर्षीय मुलायम यादव की मौत हो गई। राजेष्वरी देवी, सीता देवी व कमल बसखरवार धीरे धीरे उस ओर बढ़ रहे हैं। कैंसर के कितने रोगी हैं? नहीं कहा जा सकता क्योंकि कितनों की बीमारियों की जांच ही नहीं हुई। जिन लोगों की जांच हुई है, उनके रक्त में आर्सेनिक की अत्यधिक मौजूदगी से रक्त की संरचना बदल गई है। इस वजह से दूसरी बीमारियों के अलावा प्रजनन क्षमता घटने के संकेत मिलने लगे हैं। यह गांव उस क्षेत्र है जिसके भूजल में खतरनाक मात्रा में आर्सेनिक होने की जानकारी सबसे पहले मिली।
तिलक राय का हाता का बाकायदा सर्वेक्षण हुआ है। इसकी रिपोर्ट 2015 में प्रकाशित हुई। आर्सेनिकोसिस का फैलाव देखकर अध्ययनकर्ता चोक गए। आर्सेनिकोसिस के लक्षण त्वचा, हथेली और पैर के तलवे पर पहले दिखते हैं। चमड़ी का रंग बदल जाता है। सफेद छींटे जैसे दाग हो जाते हैं। तलवों में कांटे जैसे निकल जाते हैं। हथेली में चमडे के नीचे कांटेदार स्थल बनने से तलहटी खुरदुरी हो जाती है। अंातरिक अंगों पर असर बाद में दिखता है। यह असर कैंसर की शक्ल में होता है। आंत, लीवर, फेफडे व दूसरे अंगों में कैंसर के मरीज मिले हैं। चर्म रोगों में हाईपर केराटोसिस और मेलानोसिस के रूप में दिखते हैं। 28 प्रतिशत लोगों को हाइपरकेराटोसिस और मेलोनोसिस 31 प्रतिशत लोगों में पाए गए। आंत की बीमारियों में 86 प्रतिशत लोगों को गैस्ट्रीक है, 57 प्रतिशत लोगों को लीवर संबंधी रोग, 46 प्रतिशत लोगों को पाचन और भूख की कमी जैसे रोग हैं। लोगों की प्रचनन क्षमता पर असर पड़ रहा है। नपुंसकता (एजूसपरमिया) 9 मर्दो और 6 औरतों में बांझपन दिखा। 137 महिलाओं का मासिक-चक्र बिगड़ गया है। जो दूसरी बीमारियों का संकेत है। तब कैंसर के 6 मामले मिले, चार की मौत हो गई थी। किसी का इलाज कैंसर-सेंटर में नहीं हुआ। प्राथमिक और मध्य विद्यालयों के बच्चों में भी आर्सेनिकोसिस के गंभीर लक्षण दिखे। दस प्रतिशत बच्चों की हथेली और तलुवों में हाइपर केराटोसिस के लक्षण दिखने लगे हैं। स्कूल के बच्चे उस चापाकल का पानी पीने के लिए विवष हैं जिसके पानी में आर्सेनिक की उपस्थिति 100 पीपीबी से ज्यादा है।
गांव जहरीले आर्सेनिक का प्रकोप झेल रहा है। बचाव के उपाय फौरन करना जरूरी है। अध्ययनकर्ता महाबीर कैंसर शोध केन्द्र के डाॅ अरुण कुमार ने यह सिफारिश की। अध्ययन केन्द्र सरकार के विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय की सहायता से हुआ। 28 अप्रैल 2015 को रिपोर्ट प्रकाशित हुई। पर इसकी सिफारिश की सरकार ने कोई परवाह नहीं की। हालांकि डाॅ अरुण ने पहले भी 1999 में इस गांव की स्थिति को लेकर अगाह किया था। तब वे सिमरी प्रखडं के सात गांवों में भूजल में आर्सेनिक की स्थिति के बारे में अध्ययन कर रहे था। तब यह गांव सर्वाधिक पीडित नहीं था। सर्वाधिक पीडित हलवा पटटी और दूधा पटटी था जिसके भूजल में आर्सेनिक की मात्रा 200 पीपीबी पाई गई थी। ‘तिलक का हाता’ के लोगों में आर्सेनिकोसिस के लक्षण जरूर दिख रहे थे। जब अध्ययन हुआ तो यहां के निवासियों के रक्त में आर्सेनिक की मात्रा अत्यधिक पाई गई। डाॅ अरुण ने ऐसे लोगों की सूची बनाई है। टून्नी देवी के रक्त में 462 पीपीबी, भिखारी यादव 337 पीपीबी, गोपालजी यांदव 364 पीपीबी, जगन्नाथ यादव 243 पीपीबी आर्सेनिक पाया गया जो सरकारी मानक से कई गुना अधिक है। दरअसल, गांव के 80 प्रतिषत चापाकलों से आर्सेनिकयुक्त पानी मिलता है। आर्सेनिक की मात्रा अत्यधिक (1908 पीपीबी ) है।
उल्लेखनीय है कि विष्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरीकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी ने पेयजल में 10 पीपीबी से अधिक आर्सेनिक की उपस्थिति को खतरनाक माना है। अपने यहां इसे 50 पीपीबी मान लिया गया है। पर इस मानक के लिहाज से भी समस्या भयानक ढंग से विषाल है। इस गांव में प्रचलित तरीके के फिल्टर भी नहीं लगे, उन चापाकालों को वर्जित नहीं किया गया जिनके पानी में आर्सेनिक की मात्रा बहुत अधिक पाई गई। इसका पहला कारण यही नजर आता है कि गांव के अस्सी प्रतिशत चापाकलों का पानी प्रदूषित है और प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है कि फिल्टरों के असरकारक होने की संभावना नजर नहीं आती। वैसे जिन जगहों पर सरकार की ओर से आर्सेनिक रोधी फिल्टर लगाए गए, वह भी संचालनगत कारणों से बंद हो गए हैं।

