बड़ी संख्या में असुर परिवारों का धर्म परिवर्तन, बने ईसाई

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 चंदन कुमार

किसी भी समाज का विकास करना, उन्हें मुख्य धारा में लाना ये चुनी हुई सरकार का दायित्व है। सरकार यदि ऐसा करने में असफल साबित होती है, तो लोगों की चिंताएं जायज है। समाज को भी लोगों को मुख्य धारा में लाने का प्रयास करना चाहिए। यह होता भी रहा है। लेकिन समाज के दुःख दर्द साझा करने का मतलब यह कदापि नहीं है की ऐसा कर हम लोभ लालच देकर धर्म परिवर्तन को उकसाएं। कुछ ऐसा ही घटित हुआ है झारखंड के गुमला में जहाँ सरकारी सुविधाओं से वंचित चैनपुर प्रखंड के चार गांव के 300 आदिम जनजाति असुर परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया है। असुर झारखंड के नौ आदिम आदिवासी समुदायों में से एक है जिनकी संख्या तेजी से घट रही है। धर्म परिवर्तन कर ईसाई धर्म अपनाने वाले इन परिवारों का कहना है की बदहाली और असुविधाओं के चलते मजबूरन सरना धर्म के 300 आदिम जनजाति असुर परिवारों कों ईसाई धर्म अपनाना पड़ा। इन असुर परिवारों कों किसी भी प्रकार की कोई सरकारी सुविधायें प्राप्त नही हो रही थी। इन लोगो के धर्म परिवर्तन का मुख्य कारण गांव का विकास व बच्चों की शिक्षा भी है। ये जनजाति असुर परिवार डोकापाट, लुपुंगपाट, भंडियापाट, बेसनापाट व नवाटोली गॅावों में निवास करते है। ये गॅाव पहाड़ी व घने जंगलो के बीच बसे हुये है। गांव जाने के लिए टेढ़े-मेढ़े रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। यहां कोई प्रशासनिक अधिकारी नहीं जाते। शिक्षा का स्तर सबसे खराब है।

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न पीने का पानी, न पढाई की सुविधा

गाँव वालों का कहना है कि इन गांवों के लोग आज भी आदिम युग में जी रहे हैं। लोग झेड़िया नाला (झरना)का पानी पीते हैं। इसी में नहाना- धोना भी करते हैं। गाँव में भले ही किसी के पास कोई सरकारी नौकरी न हो लेकिन गांव के 30 असुर बच्चे मैट्रिक पास व 15 इंटर पास है। यह बदलाव ईसाई धर्म अपनाने के बाद आया है। नौवीं कक्षा के छात्र अमर असुर ने कहा कि स्कूल जाते हैं. कुछ करने की तमन्ना है. इस गाँव में कोई सरकारी नौकरी में नहीं है।

आरोप…लोभ लालच देकर धर्म परिवर्तन

धर्म परिवर्तन करने वाले ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने यह फैसला अपने बच्चों की शिक्षा के लिए किया है। इलाके के गांव सड़क, बिजली, विद्यालय और स्वास्थ्य केंद्रों जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। सरकार ने हमें कुछ भी नही दिया है, हम यहॅा मर मर कर जी रहे । न तो बिजली है, न तो पीने के लिये साफ पानी औऱ न ही कोई राशन की कोई व्यवस्था । ऐसे में पूरे गांव ने ईसाई धर्म अपनाना ही ठीक समझा। जिससे कम से कम हमारे बच्चे पढ़ तो सकते है और हमारे गॅाव के विकास के भी आसार है। हालाँकि विहिप इस धरम परिवर्तन पर सवाल खरा कर रहा है। विहिप के बिहार और झारखंड के धर्म प्रसार प्रमुख प्रमोद मिश्रा ने कहा, ‘ईसाई मिशनरियों की भूमिका की जांच होनी चाहिए। पहले से ही घटती जनसंख्या के शिकार राज्य के आदिम आदिवासी समुदाय को एक सुविचारित योजना के तहत ईसाई बनाया गया है। मिशनरियों को मिलने वाले धन की भी जांच होनी चाहिए।”

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प्रशासन की नजर होगी जांच

गुमला के उपायुक्त दिनेश चंद्र मिश्रा के मुताबिक ‘बीते हफ्ते धर्म परिवर्तन के कुछ मामलों की जानकारी मिली, जबकि धर्म परिवर्तन के कुछ मामले पुराने भी हैं। हम इन दोनों की ही जांच करेंगे, ताकि सच सामने आए।’

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