प्रगतिशील और लाभकारी फसल बीमा योजना, मगर क्रांतिकारी नहीं

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पुष्यमित्र

प्रधानमंत्री कृषि बीमा योजना की घोषणा के बाद यह चौथा दिन है. लेकिन सवाल है कि सरकार ने यह जो योजना बनायी है, क्या यह कारगर होगी?  या ये भी दूसरी बीमा योजनाओं की तरह सरकारी फाइलों में बंद ही रहेगी और सरकारी योजनाओं की फेहरिस्त में एक असफल उल्लेख बन कर रह जायेगी।

दरअसल सच यह है कि हमारे सरकारी विभागों की लाल फीताशाही की वजह से अब तक फसल बीमा योजनाएं किसानों का भरोसा जीत नहीं पायी हैं। 90 क्या 99 फीसदी किसान फसल बीमा नहीं कराता। उसे लगता है कि मिलना तो कुछ है नहीं, बस सिर दर्दी है। अगर मुआवजा मिलना होता है, सरकार मेहरबान हो जाती है तो वैसे भी मिल जाता है।जैसे बिहार में चुनाव से पहले किसानों को आंधी-पानी से हुई क्षति का ठीक-ठाक मुआवजा मिला था। और नहीं मिलना होता है तो बीमा करा लो, बाद में पता चले कि राज्य सरकार ने अपनी तरफ से प्रीमियम भरा ही नहीं, या सरकार यही मानने के लिए तैयार नहीं है कि फसल की क्षति हुई है. तो फिर डूब गये आपके प्रीमियम के पैसे… ।

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मगर इसका मतलब यह नहीं है कि फसल बीमा को नकारा साबित कर गताल खाते में डाल दिया जाये. हां, इसकी व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। क्योंकि जैसा बड़े-बड़े साइंटिस्ट कहते हैं न कि मौसम बदल रहा है, ग्लोबल वार्मिग हो रहा है… तो इस बदलाव को हम आप और किसान भी जमीन पर देख रहे हैं। अब देखिये जनवरी बीत रहा है, घर से लोगों का फोन आता है, तो कहते हैं इस बार गेहूं भी मार खायेगा. ठंड पड़ा नहीं तो दाना कैसे फर्रोस होगा… अकाली में धान पहले मार खा चुका है। मतलब यह सब होता रहेगा और ऐसे में एक ढंग की बीमा योजना की हमें मतलब किसानों को सख्त जरूरत है।

ऐसी योजना जो थोड़ा पैसा ले, मगर फसल गड़बड़ाने की हालत में किसानों के नुकसान की भरपाई भी कर दे। कर दे मतलब कर दे। ये नहीं किसानों को दौड़-दौड़ कर बीडीओ के आफिस जाना पडे।. न माने तो सड़क पर धरना-प्रदर्शन करना पड़े। किसी ने कर्जा लेकर खेती की है और फसल चौपट हो गयी तो बुंदेलखंड और मराठवाड़ा के किसानों की तरह खुदकुशी की नौबत न आ जाये… यानी ऐसी इंश्योरेंस पॉलिसी हो कि खेती करना एक तनाव रहित काम हो जाये। ठीक वैसे, जैसे एक कारखानेदार का कारखाने जल जाता है तो भी वह बहुत परेशान नहीं होता, क्योंकि इंश्योरेंस का पैसा तो मिल ही जायेगी।

केंद्र सरकार का दावा है कि उसने इस बार कुछ वैसी ही बीमा योजना बनायी है। ऐसी की किसानों के सारे दुख दूर हो जायेंगे। सरकार कहती है एक तो बीमा कराने में प्रीमियम का डेढ़ से दो परसेंट ही देना पड़ेगा, दूसरा खलिहान में कटी तैयार फसल को भी नुकसान हो जाये तो बीमा कंपनी मुआवजा देगी। 25 फीसदी नुकसान में भी हर्जाना मिलेगा। कैपिंग भी हटा लिया गया है। एक और प्रावधान यह है कि प्राकृतिक आपदा की स्थिति में 25 फीसदी हर्जाना तो तत्काल लाभुकों के बैंक खाते में पहुंच जायेगा और बाकी मुआवजा आकलन होने के बाद मिलेगा। यानी अफसरों की रिपोर्ट का इंतजार नहीं होगा।

जाहिर सी बात है कि पुरानी कृषि बीमा योजनाओं के मुकाबले यह योजना काफी प्रगतिशील और लाभकारी लग रही है। पहले प्रीमियम का 15 परसेंट देना पड़ता था। अब डेढ़-दो परसेंट में काम चल जायेगा। यानी इतनी न्यूनतम राशि होगी कि हर किसान देने के लिए तैयार हो जायेगा। अगर सरकार कैंप लगाकर हर इलाके में बीमा कराये तो अब तक जो किसान इस योजना से दूर भागते थे, वे नजदीक आयेंगे। अब आपदा की जानकारी और नुकसान की सूचना स्मार्टफोन से दी जा सकेगी, जिससे बीमा राशि के भुगतान में तेजी आयेगी। कुल मिलाकर कई ऐसे प्रावधान हैं जो लाल-फीताशाही को खत्म करेंगे। और अगर राज्य और केंद्र आपसी समन्वय से काम करे और सदिच्छा दिखाये तो किसान को बड़ी राहत मिल सकती है।

मगर अभी भी कई पेंच बांकी रह गये हैं। इसलिए इसे बहुत बोल्ड स्टेप नहीं कहा जा सकता। पहला यह कि भले प्रीमियम राशि में राज्य और केंद्र भागीदारी कर रहा है, मगर यह बीमा अब भी किसानों का अपना बीमा नहीं है। प्रीमियम आखिरकार सरकार को जमा कराना है और सरकारी स्तर पर अगर कोई ढीला-ढाला रवैया अपनाया गया तो किसानों को लाभ से वंचित रहना पड़ सकता है। यह वैसा नहीं है, जैसे उद्योगों का बीमा होता है, उद्योगपति खुद बीमा कराते हैं और बीमा की राशि खुद वसूलते हैं. या जैसे आपकी गाड़ियों का बीमा होता है. यहां बीमा कंपनी से सरकार का समझौता हो रहा है किसान का नहीं। यानी जब सरकार कहेगी कि हां नुकसान हुआ है, तभी किसान को उसका लाभ मिलेगा। इसे किसानों और बीमा कंपनी के बीच होना चाहिये था। भले प्रीमियम में सरकार अपनी तरफ से सब्सिडी दे देती।

सरकार नुकसान का आकलन किसानों के स्तर पर नहीं करती, वह पंचायत, प्रखंड या जिला के स्तर पर करती है. कि यहां 50 फीसदी या 60 फीसदी या 40 फीसदी नुकसान हुआ. ऐसे में अगर किसी किसान का सौ फीसदी नुकसान हो गया तब भी उसे सौ फीसदी मुआवजा शायद ही मिले(अभी तक जो पढ़ा है, उससे तो यही लगता है कि नहीं मिलेगा). यानी कुल मिलाकर प्राकृतिक आपदा की स्थिति में होने वाली फसल क्षति का ही मुआवजा मिलेगा. अगर बीज फेल कर जाये, या किसी किसान के खेत में स्थानीय कारण से फसल चौपट हो जाये तो उसका मुआवजा नहीं मिलेगा. जबकि बीमा प़ॉलिसी तो ऐसी होनी चाहिये थी कि पैदावार की कीमत बहुत कम मिले, जैसे रेट गिर जाये तो भी मुआवजा मिले. कई दफा ऐसा होता है कि किसानों को अच्छी पैदावार को आठ आने किलो की दर से बेचना पड़ता है. उसका क्या…

दूसरी बात, लीज और बटाई पर खेती करने वालों को इस योजना का लाभ नहीं मिलने जा रहा। इसकी वजह से बड़ी संख्या में किसान इस योजना से बाहर रह जायेंगे. केंद्र सरकार कह रही है कि वह राज्य सरकारों से मिल कर इस मामले में कोई तरीका विकसित करने की कोशिश कर रही है। मगर अभी तक तो हालात यही हैं कि जिन किसानों के पास जमीन के कागजात हैं वही इसका लाभ ले पायेंगे. फिर भी, जिस दौर में किसानों के बारे में कोई सोच नहीं रहा, अगर सरकार कुछ फैसले ले रही है और कुछ बाधाओं को खत्म कर रही है तो इसे बेहतर कदम कहना ही चाहिये। खास तौर पर जो किसान बैंकों से लोन ले कर खेती करते हैं उन्हें तो हर हाल में फायदा मिलेगा। हो सकता है ठीक से लागू हो तो खुदकुशी में भी कमी आये. बहरहाल, इतनी ही कह सकते हैं, सस्ती है, सहज है, मगर क्रांतिकारी नहीं है फसल बीमा योजना।

 

 

 

 

 

 

 

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