अनुशक्ति सिंह
भोरे-भोर उठ गयी है रधिया माय… एक बार चाय पी लेती है फिर गोसाईं घर का चूल्हा जोड़ेगी। आज संझका अरग है… पूरे दिन निखट उपास। कितना सब कुछ धरा हुआ है करने बनाने को… लोल वाला पकवान, ठेकुआ, कसार…
बाकी दउरा और सूप में नारियल और टाब तो रधिया सजा देगी। पुरनका सन्दूक में से चनमा भी निकाल ली है… रधिया का भाई उसको घाट पर करची लगा के टांग देगा।
एतना काम है करने को कि सुरुज भगवान कब पच्छिम मुंह होने लगते हैं पतो नहीं चलता है।
इस बार तो रधिया का बाप भी नहीं आया है… और बार तो आ जाता था तो दउरा तो कम से कम घात तक पहुंचा देता था लेकिन कपडा मिल का दिल्ली वाला मालिक इस बार सबको छुट्टी नहीं दिया. कोनो बात नहीं, देख आएगा दिल्लिये में जमुना जी किनारे छठ का परब.
सुनते हैं इस बार केजरीवाल सरकार तो अपने से दिल्ली वाला घाट साफ़ कराये हैं.

कितना कुछ सोचती है रधिया की माय… हाथ ठेकुआ का आता गूंथने में व्यस्त है तो दिमाग में दुनियादारी चल रही है. क्या करे वो भी… मन यहाँ है तो मनवाला दूर देश में. हां देख लेगा वो भी जमुना जी का छठ लेकिन उसकी मेहरारू तो नहीं होगी न उसमे.
सोच रही थी कि छठ में घर आएगा तो ये कहेगी, वो कहेगी… इस बार के परसाद में पेड़ा भी चढाएगी लेकिन कुछो नहीं हुआ.
ये है रधिया के माई के मन की व्यथा… एक आम बिहारी स्त्री की कथा जो स्वयं तो ज़िन्दगी की कठिनाइयों से अपने प्रदेश में जूझ रही होती है लेकिन उसका घरवाला बिचारा कहीं दूर देश में नौकरी करके के घरवालों को पालने पासने के लिए दो-चार पैसे का जुगाड़ कर रहा होता है. एक छठ का ही तो मौका होता है जब बिहार से बाहर रहने वाला हर बिहारी घर का रास्ता नापता है लेकिन जब उसमे भी वो न आये तो मन तो टूटेगा ही न.
हर बार जब नेता सब भोट मांगने आता है तो सोचती है कि इस बार कुछ ऐसा होगा कि उसके घरवाले को गाम के पास ही नौकरी लग जायेगी… शायद बनमनखी के चीनी मिल में या फिर कोई नयका कारखाना खुलेगा सोनबरसा में. लेकिन कुछ नहीं होता है… इस बार तो लालू जी का लालटेन पार्टी आया है. वही लोग कुछ करेगा… और कुछो न सही कम से कम दू ठो बढ़िया भैंस भी खरीद ले तो रधिया के बाप को नहीं जाने देगी गाम छोड़ कर. बाल-बच्चा बिना बाप के टुअर लगता है.
