पशुधन की पूजा का पर्व है सोहराई

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डॉ मी​नाक्षी मुंडा

यह पर्व कार्तिक मास शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा तिथि याने दिवाली के दुसरे दिन मनाने की परम्परा है और सालों भर सुख समृधि की की कामना पशुधन से करते हैं |इस पर्व के दिन पशुपालक अपने पशुधन को स्नान कराते हैं ,उनकी तेल मालिश होती है ,सिन्दूर टीका लगाया जाता है ,उनकी पूजा होती है और सात प्रकार के अनाज से बने दाना/पकवान को पशुधन को खिलाया जाता है |उनके निवास स्थान को दिये से सजाया जाता है | ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस तिथि तक प्रथम फसल तैयार हो चूका होता है ,इन् पशुधन के सहयोग से , तो एक लाइक और आभार प्रकट करने के लिए आदिवासी बहुलक इलाकों में ये त्यौहार अच्छे से मनाया जाता है| यह पर्व झारखंड, छत्तिसगढ़, और भारत के अन्य आदिवासी इलाकों मं प्राथमिकता से मनाया जाता है। किसान सोहराई के अवसर पर अपने प​शुओं विशेष

रूप से गाय की पूजा करते है। sohnai_nश्रद्धा का आलम यह है पशु की सींग और पूंछ को हल्दी और विभिन्न रंगो से श्रद्धा पूर्वक सजाते हैं, गाय के निवास स्थान को रोशनी से सजाया जाता है। इस पर्व की विशेष खासियत यह है कि कि इस अवसर पर घरों को, दीवाल को रंग बिरंगे परंपरागत पेंटिंग से सजायी जाती है।

धूम धाम से मना सोहराई                            

विभिन्न स्थानों में मवेशियों के लिए विशेष रूप से प्रार्थना की गयी। मवेशियों को नदी में नहलाया गया। मवेशियों को गोशाला में प्रवेश कराने से पहले पैर को हड़िया पानी से धोया गया। साथ ही सींग में तेल लगा कर चावल व उड़द का भोजन मवेशियों को कराया गया.इस अवसर पर जगह-जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन हुआ। लोग मांदर की थाप पर खूब झूमे। इस अवसर पर विभिन्न स्थानों पर मिस्सा अनुष्ठान भी हुआ गृहस्थी जीवन में मवेशी हमारे साथ हैं। ईश्वर ही मनुष्य एवं मवेशियों के स्वामी हैं।

कैसे शुरू हुआ यह उत्सव

सोहराई कला एक आदिवासी कला है। इसका प्रचलन हजारीबाग जिले के बादम क्षेत्र में आज से कई वर्ष पूर्व शुरू हुआ था। इस क्षेत्र के इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के नमूने देखे जा सकते हैं। कहा जाता है कि बादम राजाओं ने इस कला को काफी प्रोत्साहित किया था। जिसकी वजह से यह कला गुफाओं की दीवारों से निकलकर घरों की दीवारों में अपना स्थान बना पाने में सफल हुई थी।

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धीरे धीरे कम होता प्रचलन

झारखंडी संस्कृति में सोहराई कला का महत्व सदियों से रहा है। राज्य के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सोहराई पर्व के दौरान देसज दुधि माटी से सजे घरों की दीवारों पर महिलाओं के हाथों के हुनर अब बमुश्किल से देखने को मिलते हैं. अब दुधि माटी की जगह चूने ने ले ली है। उस समय ऐसा कोई घर नहीं था जहां की महिलाएं इस कला से अपने घरों-दीवारों को सजाना नहीं जानती हों। आज स्थिति बदल चुकी है। अब तो इसके कलाकार और इसे जाननेवाले लोगों की संख्या गिनती में रह गयी है। ऐसे गिने-चुने नामों में से एक नाम है रूकमणी देवी का। हजारीबाग जिले के बड़कागांव प्रखंड की रहनेवाली रूकमणी कहती है कि यह कला मैंने अपनी मां से सीखी थी और मां ने अपनी मां से। वह बतलाती है कि आज इस कला को सीखना तो दूर, लोग इसे जानते तक नहीं हैं।  बकौल रूकमणी आदिवासी संस्कृति में इस कला का महत्व जीवन में उन्नति से लगाया गया था, तभी इसका उपयोग दीपावली और शादी-विवाह जैसे अवसरों पर किया जाता था। जिससे कि धन और वंश दोनों की वृद्धि हो सके. रूकमणी बताती है कि इस कला के पीछे एक इतिहास छिपा है. जिसे अधिकांश लोग जानते तक नहीं हैं। वह बताती हैं कि बादम राज में जब किसी युवराज का विवाह होता था और जिस कमरे में युवराज अपनी नवविवाहिता से पहली बार मिलता था उस कमरे की दीवारों पर यादगार के लिये कुछ चिन्ह अंकित किये जाते थे। ये चिन्ह ज्यादातर सफेद मिट्टी, लाल मिट्टी, काली मिट्टी या गोबर से बनाये जाते थे. इस कला में कुछ लिपि का भी इस्तेमाल किया जाता था जिसे वृद्धि मंत्र कहते थे।

sohnai4बाद के दिनों में इस लिपि की जगह कलाकृतियों ने ले ली। जिसमें फूल, पत्तियां एवं प्रकृति से जुड़ी चीजें शामिल होने लगीं. कालांतर में इन चिन्हों को सोहराई या कोहबर कला के रूप में जाना जाने लगा। धीरे-धीरे यह कला राजाओं के घरों से निकलकर पूरे समाज में फैल गयी. राजाओं ने भी इस वृद्धि कला को घर-घर तक पहुंचाने में काफी मदद की। पर आज मदद तो दूर इस सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिये भी कोई आगे नही आता।

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