- बिहार के बेगूसराय में ऐसी एक या दो नहीं बल्कि दर्जनों महिला किसान हैं जिन्होंने खेती के पुस्तैनी परंपरा को न सिर्फ अपनाया है बल्कि अच्छा मुनाफा भी कमा रही हैं।
बेगूसराय: उत्तम खेती मध्यम बान, नीच चाकरी भीख निदान। खेती की परंपरा के विषय में हमारे देश में ये पुरानी कहावत रही है। आज के दौर में जब महिलायें जीवन के हर क्षेत्र में पुरूषों को पीछे छोड़ रही हैं तो भला खेती से कैसे अलग रहतीं। जैसे—जैसे समय गुजर रहा है खेती किसानी पर पुरुषों का एकाधिकार खत्म हो गया है। विशेष रूप बिहार जैसे राज्य में जहां अधिकांश पुरूष रोजी रोजगार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन को मजबूर हैं। ऐसे में अब महिलाएं ने भी पूरे दमखम के साथ अपने दम पर खेती बाड़ी का काम संभाल लिया है। वैसे तो पूरे बिहार में आपको ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे लेकिन बात करते हैं बिहार के बेगूसराय में ऐसी एक या दो नहीं बल्कि दर्जनों महिला किसान हैं जिन्होंने खेती के पुस्तैनी परंपरा को न सिर्फ अपनाया है बल्कि अच्छा मुनाफा भी कमा रही हैं।
यानी रोजगार के बाकी आयामों की तरह खेती किसानी के काम से जुड़कर भी महिलाएं अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उज्जवला गैस योजना के तहत महिलाओं को रसोई के धुएं से तो मुक्ति मिली ही है साथ ही खाना पकाना भी आसान हो गया है और वक्त भी कम लगता है। ऐसे में महिलाओं ने घर की रसोई से बाहर कदम बढ़ाते हुए हाथों में खुरपी थाम लिया है जो उनके प्रगति की राह आसान बना रही है। प्रदेश के बेगूसराय जिले की महिला किसान इसमें आगे दिखाई देती हैं और बड़ी संख्या में महिलाएं खेती किसानी में दिलचस्पी ले रही हैं और सफलता भी हासिल कर रही हैं।

लीक से हटकर कर रही हैं अच्छी कमाई
बड़ी बात यह है कि इसमें कुछ महिलाएं लीक से हटकर खेती के जरिए बेहतर मुनाफा कमा रही हैं। इन्हीं महिलाओं में से एक हैं गढ़पुरा की अंजू देवी। अंजू देवी ने न सिर्फ खेती किसानी की तरफ कदम बढ़ाया बल्कि इसके जरिए इलाके में अपनी पहचान गढ़ने में कामयाब रही हैं। यानी नाम भी और दाम भी। इन्होंने अंजना नामक जीविका समूह से कर्ज लेकर खेती की शुरुआत की और अब अच्छी कमाई कर रही हैं।
बेगूसराय जिला मुख्यालय से 34 किमी दूर राज सोनमां में रहने वाली अंजू देवी बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं। इनके परिवार में कुल 4 सदस्य हैं। कृषि भूमि कम होने और कोई रोजगार नहीं होने की वजह से पूरा परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था।

खेती किसानी के इस सफर पर चर्चा करते हुए अंजू कहती हैं कि शुरूआत के दिनों में सबसे बड़ी समस्या पैसे की थी। यहां तक की कर्ज मांगने पर भी कोई देने को तैयार नहीं था। तब वे जीविका समूह से जुड़ी और इसके जरिए अंजू ने कर्ज लिया और सब्जी की खेती शुरू की। शुरुआती दिनों में परवल का उत्पादन कर बाजार तक पहुंचने में भी परेशानी हुई, लेकिन धीरे-धीरे अच्छी पकड़ बन गई। अब वो सब्जी की खेती से बेहतर मुनाफा कमा रही हैं।

पांच बिगहा में कर रही हैं सब्जी की खेती
गांव देहात में कहावत भी है कि नौकरी करो सरकारी और खेती करो तरकारी। तो अंजू को सरकारी नौकरी तो नहीं मिली लेकिन इस महिला किसान ने तरकारी की खेती यानी सब्जी की खेती करना शुरू किया और आज वह चार से पांच बीघा जमीन में सब्जी की खेती कर रही हैं। इससे अंजू को सालाना डेढ़ से 2 लाख का खर्च आता है। अंजू ज्यादातर हरी सब्जियों की खेती करती हैं मसलन भिंडी, बैगन, परवल, गोभी, मिर्च सहित सीजनल सब्जी शामिल रहता है।

कैसा रहा सफर
इस पूरे सफर के विषय में महिला किसान अंजू कहती हैं कि खेत से रोजाना सब्जी न तोड़कर 5 से 6 दिन में तोड़ती हैं और एक हफ्ते में 10 से 15 हजार की सब्जियां बिक जाती हैं। हर माह लगभग 50 हजार कमा लेती हैं। सब्जी की खेती ने ना सिर्फ परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में मदद की बल्कि अब वो बच्चों को भी अच्छे स्कूल में पढ़ा रही हैं। उनका पर्स अब कभी खाली नहीं रहता और न ही किसी से मांगने की जरूरत पड़ती है।
