पारबती बरुआ जिन्हें ‘हस्ती कन्या’ के नाम से भी जाना जाता है, भारत की पहली महिला महावत हैं। जिन्हें गणतंत्र दिवस, 2024 पर प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
कैसे हुआ हाथियों से लगाव
भारत के 75वें गणतंत्र दिवस पर 132 लोगों को राष्ट्रीय सम्मान– 5 पद्म विभूषण, 17 पद्म भूषण और 110 पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनमें से एक पारबती बरुआ जो अब लगभग साठ साल की होने के करीब हैं, को भारत की पहली महिला हाथी महावत के रूप में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्म श्री मिला।
असम में जन्मी और पली-बढ़ी पारबती को गुड़ियों से खेलना पसंद नहीं था। इसके बजाय वह वन्य जीवन तथा गतिविधि में दिलचस्पी रखती थी। और बाहर रहने का आनंद लेती थी। वह गौरीपुर के शाही परिवार के स्वर्गीय प्रकृतिश चंद्र बरुआ की नौ संतानों में से एक थीं। कहा जाता है कि गौरीपुर के राजाओं में प्रकृतिश अंतिम शासक थे।
कम उम्र में हाथियों के प्रति उनका स्नेह उनके पिता से उत्पन्न हुआ। जो हाथियों के बारे में अपनी विशेषज्ञता और ज्ञान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध थे।
‘हस्ती कन्या’ के नाम से मशहूर पारबती ने 14 साल की उम्र में कोकराझार जिले के कचुगांव जंगलों में पहली बार हाथी पकड़ा था। इस शुरुआती मुठभेड़ के बाद उन्हे कोई रोक नहीं सका। सभी रूढ़ियों को तोड़ते हुए वह 1972 में महावत बन गईं और हाथियों को बचाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया।
परबती बरुआ की दिनचर्या
उनकी दिनचर्या में हाथियों को नहलाना, उन्हें जंगल में घुमाना और उन्हें प्रशिक्षित करना आदि हाथियों के ईर्द-गिर्द की गतिविधियां शामिल है। उन्होंने अपने प्यारे हाथियों के लिए हादिया (चावल से बनने वाला एक प्रकार का व्यंजन) बनाने का भी उल्लेख करती हैं।
पारबती ने एक साक्षात्कार में कहा, “वे (हाथी) मुझसे प्यार करते हैं क्योंकि मैं उनकी भावनाओं को समझती हूं। एक बुलावे पर वे सभी मेरे पास दौड़े चले आते हैं।”
पारबती की तीन हथिनी बेटियाँ हैं- लक्ष्मीमाला, अलोका और कंचनमाला। यह तिकड़ी समर्पित सहकर्मियों की एक टीम के साथ एक असामान्य और साहसिक जीवन जीती है। वह कहती हैं, ”मेरी नौकरी में कोई रीटेक नहीं होता। जब भी मैं जंगलों में जाती हूं। मैं इसे अपनी आखिरी यात्रा मानती हूं। लेकिन एक महावत के रूप में, मैं कभी सेवानिवृत्त नहीं हो सकती।
बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्य उदंड हाथियों से निपटने ,घायल या बीमार लोगों की देखभाल में उनकी सहायता चाहते हैं। इन वर्षों में पारबती को प्रसिद्धि मिली और यहां तक कि ‘हाथियों की रानी’ नामक बीबीसी डॉक्युमेंडरी का विषय भी बनी।
पारबती जी की साहसिक कहानियां
उनकी साहसिक कहानियों में से एक पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले की है। जहां 50 हाथियों का एक झुंड अपना रास्ता भटक गया था और गावों की तरफ तेजी से बढ़ रहा था, वह गांव खतरे में था। राज्य के अधिकारियों ने पारबती की ओर रुख किया। और उसके तीन हाथियों और अन्य महावतों की एक टीम के साथ वहां पहुंचकर साहसिक कार्य किया जिसके बाद समय रहते हाथियों को जंगली मार्ग की ओर मोड़ सकी।
इस साहसिक पथ पर आगे बढ़ते हुए पारबती आज भी आधुनिक सुविधाओं से वंचित जीवन जी रही हैं। वह टूथपेस्ट के बजाय राख का उपयोग करती है। और एक तंबू के अंदर गद्दे पर सोती है। जबकि वह अपने सहायक उपकरणों- रस्सियों, जंजीरों, खुखरी (एक तेज चाकू) और रकाब से घिरी रहती है।
जब उनसे हाथियों के प्रति उनके आकर्षण के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, “प्यार को समझाया नहीं जा सकता। शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि हाथी बहुत स्थिर, वफादार, स्नेही और अनुशासित होते हैं।
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