यूनिसेफ ने इंडिया हैबिटेट सेन्टर में आयोजित की मीडिया राउंडटेबल। विशेषज्ञों ने कि बच्चों एवं किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य तथा आत्महत्या के रोकथाम के लिए जिम्मेदार रिपोर्टिंग पर चर्चा, देशभर से जुटे मीडियाकर्मी और विशेषज्ञ
नई दिल्ली: गुमसुम सा बैठा हुआ बच्चा किस मां बाप को अच्छा लगता है। ताने सुनने को मिलते हैं सो अलग। पता नहीं क्यों खोया रहता है,कहां खोया हुआ रहता है? इसका तो दिमाग ही न पढ़ाई में लग रहा है और न ही किसी काम में। पता नहीं जीवन में क्या करेगा? दूसरी तरफ बच्चा भी नहीं समझ पाता की वह कहां खोया हुआ है? क्यों खोया हुआ है, किसी काम में मन क्यों नहीं लग रहा है और जब कोई काम बेमन से किया जाये तो जाहिर है सफलता की संभावना कम ही रह जाती है। कहा भी गया है की कर लो दुनिया मुट्ठी में और आज इंटरनेट के युग ने,सोशल मीडिया ने उसकी दुनिया मुट्ठी में ही तो कर दी है। लेकिन हिंदी फिल्म के उस गाने की तरह,”भीड़ है कयामत की,फिर भी हम अकेले हैं।’ आज सब कुछ होते हुए भी हमारी भावी पीढ़ी, हमारा किशोर/किशोरी अकेलापन का शिकार है। बदलते दौर में वो तमाम तरह के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। लेकिन समाधान तो तब निकले जब समस्या की पहचान हो। सामाजिक स्वीकार्यता हो की बच्चे को मानसिक समस्या है लेकिन इसका मतलब ये नहीं की वो पागल है। क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जो आम समझ समाज में है वो सीधा—सीधा ये है की मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का मतलब पागलपन मान लिया जाता है। लेकिन बच्चा पागल तो है नहीं ऐसे में न बाप समझ पा रहे हैं और न ही किशोर/किशोरी। बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक,मानसिक बदलाव ने भी कई तरह की चुनौतियां खड़ी कर दी है। परिणाम स्वरूप बच्चों और किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं, सामाजिक भेदभाव और आत्महत्या की प्रवृति बढ़ी है और ये घटनायें सामने आ रही हैं।
ऐसे में जो खबरें दिखाई जाती हैं, जो प्रकाशित की जाती हैं उसमें मीडिया का दायित्व अहम है क्योंकि पत्रकारिता समाज का आईना है। मानसिक स्वास्थ्य की चुनौती को लेकर मां बाप और बच्चा तो अनभिज्ञ है ही साथ ही पत्रकारिता में भी सजगता कम है इसलिए चुनौतियां और बढ़ जाती है। और इन्हीं चुनौतियों के मद्देनजर मीडिया को और जिम्मेदार, संवेदनशील और सकारात्मक बनाने के उद्देश्य से इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में यूनिसेफ ने विशेष मीडिया राउंडटेबल का आयोजन किया गया। इसका मुख्य विषय रिपोर्टिंग के दौरान शब्दों के अपने मायने होते है,रखा गया। ताकि आईना जो दिखाये उसमें छवि स्पष्ट निखर के सामने आये क्योंकि कहा भी गया है की आईना झूठ नहीं बोलता। लेकिन जब आईने पर धूल पड़ी हो तो तस्वीर भी तो साफ सुथरी नहीं आती।
उसी धुंधलके को कम करने के लिए यूनिसेफ ने इस मीडिया राउंडटेबल के जरिये पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, डिजिटल मीडिया प्रतिनिधियों, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और इस क्षेत्र में अपने अनुभव साझा करने वाले लोगों को एक साझा मंच पर लाकर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज में व्याप्त भ्रांतियों और भेदभाव को दूर करने में मीडिया की भूमिका पर गंभीर चर्चा की।
राउंडटेबल में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि मीडिया केवल घटनाओं की जानकारी देने का माध्यम नहीं है, बल्कि वह समाज की सोच, दृष्टिकोण और व्यवहार को प्रभावित करने की महत्वपूर्ण शक्ति भी है। समाचारों की भाषा, शीर्षक, तस्वीरें और रिपोर्टिंग का तरीका आम लोगों की मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समझ को प्रभावित करता है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी खबरों में सनसनीखेज प्रस्तुति, अपमानजनक शब्दों और बिना चिकित्सकीय पुष्टि के किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी से ग्रसित बताने से बचना आवश्यक है।
चर्चा में आत्महत्या से संबंधित खबरों की रिपोर्टिंग को विशेष रूप से संवेदनशील विषय बताया गया। विशेषज्ञ दिशा-निर्देशों के अनुसार आत्महत्या के तरीकों, स्थानों और अन्य संवेदनशील विवरणों का बार-बार उल्लेख करने, सनसनीखेज सुर्खियां बनाने तथा किसी एक घटना को आत्महत्या का एकमात्र कारण बताने से बचना चाहिए। ऐसी खबरों में सहायता, उपचार, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन में संघर्ष से उबरने की प्रेरक कहानियों को प्रमुखता देने से सकारात्मक सामाजिक प्रभाव पड़ सकता है।
राउंडटेबल में बच्चों और किशोरों से संबंधित खबरों में उनकी पहचान, गोपनीयता और गरिमा की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया गया। किसी भी ऐसी रिपोर्टिंग से बचना चाहिए जिससे संबंधित बच्चे या उसके परिवार को दोबारा मानसिक पीड़ा, अपमान, सामाजिक बहिष्कार अथवा किसी प्रकार के प्रतिशोध का सामना करना पड़े। स्कूल, परिवार और आसपास के समुदाय की पहचान उजागर करने में भी विशेष सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई।
सत्र का उद्घाटन करते हुए यूनिसेफ के उप प्रतिनिधि (कार्यक्रम) जेस्पर मोलर ने कहा ”मानसिक स्वास्थ्य और मानसिंक सुख समृद्धि बच्चों के अधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मानसिक स्वास्थ्य इस बात पर गहरा प्रभाव डालता है कि बच्चे कैसा महसूस करते हैं, कैसे सीखते हैं, सार्थक संबंध कैसे बनाते हैं और अपने जीवन को प्रभावित करने वाले निर्णयों में कैसे भाग लेते हैं। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े स्टिग्मा के कारण कई बच्चे और किशोर सहायता लेने में संकोच करते हैं।”
उन्होंन इस बात पर बल दिया कि,”स्टिग्मा को कम करने के लिए सार्वजनिक संवाद आवश्यक है जो मानसिक स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को लेकर समझ और विश्वास बढ़ाए। इस लिहाज से मीडिया, सहयोगपूर्ण वातावरण बनाने, भेदभाव कम और उपचार तक पहुंच को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यूनिसेफ जनता में जागरूकता बढ़ाने और प्रत्येक बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य तथा मनोसामाजिक कल्याण के अधिकार को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है
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इस दौरान यूनिसेफ की कम्युनिकेशन ऑफिसर (मीडिया) सोनिया सरकार ने देश की राष्ट्रीय नीति और पत्रकारिता के दिशा-निर्देशों और भारत सरकार की राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति (National Suicide Prevention Strategy), 2022 का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक आत्महत्या से होने वाली मौतों में 10 प्रतिशत की कमी लाना है। वहीं, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता आचरण संबंधी मानदंड (2022) में भी आत्महत्या से जुड़ी खबरों में सनसनीखेज प्रस्तुति, आत्महत्या के तरीकों एवं स्थानों का विवरण और अनावश्यक तस्वीरों के प्रकाशन से बचने की सलाह दी गई है। इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के MOSAIC टूलकिट के सिद्धांतों के तहत मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर काम करने वाले लोगों के अनुभवों को सम्मान देने, संवेदनशील भाषा के इस्तेमाल और समाज में पुनर्वास एवं सकारात्मक बदलाव की कहानियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता रेखांकित की गई।
राउंड टेबल चर्चा में यह भी सामने आया कि डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, ऑनलाइन पोर्टल और शॉर्ट वीडियो के दौर में खबरों के शीर्षक, थंबनेल और छोटे वीडियो कई बार मूल संदर्भ से अलग होकर प्रसारित होते हैं। इससे गलत धारणाएं और सामाजिक कुरीतियां बढ़ सकते हैं। ऐसे में मीडिया संस्थानों के संपादकों और पत्रकारों को तथ्यपरक रिपोर्टिंग, विशेषज्ञों से परामर्श, पत्रकारों के प्रशिक्षण और सकारात्मक कहानियों को प्राथमिकता देने की दिशा में ठोस पहल करनी होगी।
राउंडटेबल में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि मानसिक स्वास्थ्य को सामाजिक कुरीतियों के बजाय एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवीय संवेदना के विषय के रूप में देखा जाना चाहिए। जिम्मेदार पत्रकारिता न केवल समाज में जागरूकता बढ़ा सकती है, बल्कि जरूरतमंद बच्चों, किशोरों और परिवारों को समय पर सहायता एवं उपचार प्राप्त करने के लिए भी प्रेरित कर सकती है।
गौरतलब है कि यह मीडिया गोलमेज बैठक आगामी 12 से 14 नवंबर 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित होने वाले वैश्विक सम्मेलन, ”टुगेदर अगेंस्ट स्टिग्मा 2026” की तैयारी के मद्देनजर आयोजित की गई। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं, मीडिया संस्थाओं और सामुदायिक हितधारकों के बीच सहभागिता को मजबूत करना है, ताकि प्रमाण आधारित जानकारी और श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों को बढ़ावा दिया जा सकें। सामाजिक स्टिग्मा को चुनौती दी जा सके और लोगों, विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को आवश्यकता देने पड़ने पर सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
